जीवन की गाड़ी चलती रहे प्यार डालिए,
रूक जाये अगर कहीं, व्यवहार डालिए।भर जाये कचरा कभी गाड़ी के दिमाग़ में,
खुली जेब आँख बंद, अर्थ का तेल डालिए।
ज़िंदगी ख़ुशी से चले, अहम् भूलिए,
मैं ही कर्ता पालनहार, बहम् भूलिए।
कर्तव्य समझ कर काम में लगे रहो,
बन्द कमरों में ज़िंदगी, सहन भूलिए।
जो कहा तुमने, वह सही था,
दिन को रात कहा, सही था।
जानता हूँ झूठ था, वह सब,
राजा ने जो भी कहा, सही था।
तस्वीर के दो पहलू, सब जानते हैं,
एक तुम्हारा, दूसरा हम पहचानते हैं।
जो दिखता सामने, क्या वही सच है?
कसौटी पर बिना कसे, हम ठानते हैं।
स्वर्ण जैसे दिखते पर स्वर्ण नही हैं,
चमकते हुये मोती, सब रत्न नही हैं।
सत्य की बुनियाद, झूठ का परचम,
सूरज ढलना, दिन का पतन नही है।
फिर भोर होगी, फिर सूरज उगेगा,
तम का चीर तब, पल भर में हटेगा।
नयी उर्जा रोशनी, फिर जीने की चाह,
पाप का दमन हटेगा, पापी भी मिटेगा।
डॉ अ कीर्ति वर्द्धन
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