आषाढ़: वैश्विक सभ्यता का आदि-स्वर
सत्येन्द्र कुमार पाठक
भारतीय मनीषा का आध्यात्मिक शिखर और लोक-संस्कृति का महासंगम में ऋतु परिवर्तन और चेतना का संधिकाल
भारतीय काल-गणना का चतुर्थ मास 'आषाढ़' (जून-जुलाई) केवल कैलेंडर की एक तिथि नहीं, बल्कि प्रकृति और पुरुष के मिलन का उत्सव है। ज्येष्ठ की प्रचंड तपन जब धरती को तपाकर उसे 'बीज' धारण करने के योग्य बना देती है, तब आषाढ़ की पहली फुहार उस तपन को सृजन में बदल देती है। यह मास 'संधिकाल' है-गर्मी और वर्षा का, बाहरी भागदौड़ और आंतरिक शांति का, तथा भौतिक श्रम और आध्यात्मिक विश्राम का। : ब्रह्मांडीय ऊर्जा का संतुलन में भारतीय ऋषियों ने आषाढ़ को ब्रह्मांडीय ऊर्जा के परिवर्तन का काल माना है। वेदों में पर्जन्य सूक्त: ऋग्वेद में आषाढ़ के मेघों को 'पर्जन्य' कहा गया है। ऋषियों ने प्रार्थना की कि "हे पर्जन्य! आप ऐसी वर्षा करें जिससे औषधियां पुष्ट हों और चराचर जगत तृप्त हो।" यह जल-संस्कृति का आदि-स्त्रोत है।जब सूर्य मिथुन राशि से कर्क में संक्रमण करता है (कर्क संक्रांति), तो उत्तरायण का अंत और दक्षिणायन का प्रारंभ होता है। चंद्रमा जब उत्तराषाढ़ा या पूर्वाषाढ़ा नक्षत्रों में स्थित होता है, तो वह पृथ्वी पर शीतलता और नमी का वह संतुलन बनाता है जो वनस्पति जगत के 'गर्भधारण' के लिए आवश्यक है।: देवशयन, चातुर्मास और गुप्त साधना के लिए आषाढ़ का आध्यात्मिक पक्ष अत्यंत गूढ़ है। यह 'मौन और एकांत' का मास है:।देवशयनी एकादशी: पौराणिक आख्यान है कि आषाढ़ शुक्ल एकादशी से भगवान विष्णु चार मास के लिए क्षीर सागर में शेषशय्या पर योग निद्रा में चले जाते हैं। यह इस बात का प्रतीक है कि सृष्टि के पालनकर्ता भी ऊर्जा संचय के लिए विश्राम करते हैं। इसी से 'चातुर्मास' का प्रारंभ होता है, जिसमें संत-महात्मा पदयात्रा रोककर एक स्थान पर 'स्वाध्याय' करते हैं। गुप्त नवरात्रि (शक्ति का अदृश्य जागरण): जहाँ चैत्र और अश्विन की नवरात्रियाँ दृश्य जगत के उत्सव हैं, वहीं आषाढ़ की 'गुप्त नवरात्रि' आंतरिक शक्तियों के जागरण का समय है। तंत्र शास्त्र के अनुसार, दस महाविद्याओं की साधना के लिए आषाढ़ की काली रातें सर्वोत्तम मानी गई हैं। यह असुर और दानव प्रवृत्तियों (अहंकार, क्रोध, लोभ) के दमन का काल है। गुरु पूर्णिमा: अज्ञान से बोध की ओर: आषाढ़ की पूर्णिमा महर्षि वेदव्यास के सम्मान में मनाई जाती है। गुरु को 'मेघ' और शिष्य को 'चातक' माना गया है। जैसे आषाढ़ की वर्षा प्यासी धरती को तृप्त करती है, वैसे ही गुरु का ज्ञान शिष्य की जिज्ञासा को शांत करता है।
इतिहास गवाह है कि आषाढ़ ने साम्राज्यों की नीतियों को प्रभावित किया है: मौर्य काल में आषाढ़ के आगमन से पूर्व 'कोष्ठागारों' (अन्न भंडारों) का निरीक्षण किया जाता था। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में वर्षा मापन के लिए 'वर्षामान' यंत्र का उल्लेख है। मुगलकालीन कृषि और लगान: मुगलों के समय आषाढ़ 'खरीफ' फसल के लगान निर्धारण का समय था। अबुल फजल ने 'आईन-ए-अकबरी' में लिखा है कि कैसे मानसूनी वर्षा के आधार पर पूरे साम्राज्य की अर्थव्यवस्था तय होती थी। मुगलों के प्रसिद्ध 'बाग-ए-निशात' और 'शालीमार बाग' में आषाढ़ की फुहारों के बीच 'सावन-भादो' नामक फव्वारे सक्रिय किए जाते थे। ब्रिटिश काल और आधुनिक मौसम विज्ञान: अंग्रेजों के लिए भारतीय मानसून (आषाढ़) एक पहेली था। 1875 में भारतीय मौसम विभाग की स्थापना के पीछे मुख्य उद्देश्य आषाढ़ की अनिश्चितता को समझना था ताकि उनकी सेना और व्यापार (नील, कपास, अफीम) प्रभावित न हो।
आषाढ़ की महिमा केवल भारत तक सीमित नहीं है, इसके समांतर रूप पूरी दुनिया में मिलते हैं:। एशियाई बौद्ध संस्कृति: श्रीलंका में 'एसाला पोया' उत्सव में भगवान बुद्ध के पवित्र दंत अवशेष की भव्य यात्रा निकाली जाती है। थाईलैंड और वियतनाम में 'वर्षावास' (Vassa) शुरू होता है, जहाँ भिक्षु तीन महीने तक मठों में रहकर ध्यान करते हैं।
प्राचीन मिस्र और नील नदी: जून-जुलाई (आषाढ़ के समांतर) में नील नदी में बाढ़ आती थी, जिसे प्राचीन मिस्र वासी 'आइसिस' देवी के आंसू मानते थे। यह उनकी कृषि और जीवन का आधार था। रूस और पूर्वी यूरोप: यहाँ 'इवान कुपाला' उत्सव मनाया जाता है, जिसमें लोग आग और पानी की शुद्धता की पूजा करते हैं। यह भारतीय 'स्नान पर्वों' और 'अग्नि अनुष्ठानों' से अद्भुत समानता रखता है। पारसी संस्कृति: ईरान में 'तीरगान' उत्सव वर्षा के देवता 'तीर' के सम्मान में मनाया जाता है, जहाँ लोग एक-दूसरे पर जल छिड़कते हैं।
बिहार के लिए आषाढ़ 'जीजीविषा' (जीने की इच्छा) का मास है। यहाँ की संस्कृति में आषाढ़ के कई रंग हैं: श्रम का सौंदर्य (रोपनी और सोहनी): मगध और भोजपुर के खेतों में जब पहली बारिश होती है, तो पूरा परिवेश 'सोंधी मिट्टी' की खुशबू से भर जाता है। महिलाएं झुंड बनाकर खेतों में 'रोपनी के गीत' (असारू) गाती हैं। ये गीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि कठिन शारीरिक श्रम को आनंद में बदलने का माध्यम हैं। मधुश्रावणी और सांस्कृतिक धरोहर: मिथिलांचल में 'मधुश्रावणी' का पर्व आषाढ़ के उत्तरार्ध में शुरू होता है। यह नवविवाहिताओं के लिए प्रकृति, नाग और शिव की पूजा का उत्सव है। यहाँ आषाढ़ को 'प्रेम और धैर्य' का मास माना जाता है। प्राचीन जल प्रबंधन (अहर-पाइन): बिहार के किसानों ने सदियों पहले आषाढ़ के जल को सहेजने के लिए 'अहर-पाइन' तकनीक विकसित की थी। यह दुनिया की सबसे पुरानी और प्रभावी सामुदायिक सिंचाई प्रणालियों में से एक है। आषाढ़ में बिहार में 'दही-चूड़ा', 'आम का पना' और 'बड़ी-चावल' जैसे व्यंजनों का महत्व बढ़ जाता है, जो वर्षा ऋतु के अनुकूल स्वास्थ्य प्रदान करते हैं।
आषाढ़ की पहली वर्षा का वैज्ञानिक महत्व अद्वितीय है:। आकाशीय बिजली और उर्वरता: आषाढ़ में जब बिजली कड़कती है, तो वह वायुमंडल की मुक्त नाइट्रोजन को तोड़कर उसे पानी के साथ मिलाकर 'नाइट्रेट्स' के रूप में धरती पर भेजती है। यह पौधों के लिए प्राकृतिक यूरिया का काम करता है। मृदा जीवन का पुनरुद्धार के लिए : गर्मी से सूखी मिट्टी में दबे हुए करोड़ों सूक्ष्म जीव आषाढ़ की नमी मिलते ही सक्रिय हो जाते हैं, जो मिट्टी की उपजाऊ शक्ति को कई गुना बढ़ा देते हैं।
यक्ष का विरह और आधुनिक द्वंद्व में साहित्यकारों के लिए आषाढ़ सबसे प्रेरक मास रहा है । महाकवि कालिदास: 'मेघदूतम्' की शुरुआत ही "आषाढ़स्य प्रथमदिवसे..." से होती है। यक्ष द्वारा मेघ को दूत बनाकर भेजना मानवीय कल्पना की पराकाष्ठा है। नाटक 'आषाढ़ का एक दिन' कालिदास के जीवन के माध्यम से समय की क्रूरता और सत्ता बनाम सृजन के द्वंद्व को इसी वर्षा ऋतु की पृष्ठभूमि पर चित्रित करता है। लोक साहित्य: बिहार के लोकगीतों में आषाढ़ को अक्सर 'बिरही' (पति के परदेस जाने) और 'किसानी' के संघर्ष के रूप में चित्रित किया गया है। लोक-विश्वास का ताना-बाना आषाढ़ का संबंध मानवेतर योनियों से भी जोड़ा गया है: नाग और वायु: वर्षा ऋतु के कारण जब सर्प बिलों से निकलते हैं, तो लोक-संस्कृति में उनकी पूजा (नाग पंचमी की तैयारी) शुरू होती है। गंधर्व और अप्सरा: बादलों के बीच गंधर्वों का संगीत और बिजली की चमक में अप्सराओं का नृत्य माना जाता है।
असुर और दमन: गुप्त नवरात्रि के दौरान तामसिक शक्तियों के शमन के लिए देवी के 'भीषण' रूपों की पूजा की जाती है। जल-साक्षरता और पर्यावरण संरक्षण में आषाढ़ हमें एक बहुत बड़ा संदेश दे रहा है। यदि आषाढ़ में बारिश नहीं होती, तो पूरी दुनिया की खाद्य सुरक्षा खतरे में पड़ जाती है। यह मास हमें याद दिलाता है कि हम प्रकृति के मालिक नहीं, बल्कि उसका हिस्सा आषाढ़ की पहली बूंद को बचाना ही भविष्य को बचाना है। 'कैच द रेन' (Catch the Rain) जैसे आधुनिक अभियान वास्तव में हमारी 'आषाढ़ी संस्कृति' का ही विस्तार हैं। आषाढ़ केवल बादलों के गरजने का नाम नहीं है, यह 'प्रतीक्षा' के फलने का नाम है। यह भारत की 'कृषि-ऋषि' परंपरा का वह अध्याय है जहाँ किसान अपने पसीने से और साधक अपनी तपस्या से इस धरती को धन्य करते हैं। चाहे वह रूस का किसान हो, श्रीलंका का भिक्षु हो या बिहार की रोपनी करती महिला-आषाढ़ सभी को एक ही सूत्र में पिरोता है-वह सूत्र है 'जीवन के प्रति कृतज्ञता'।आषाढ़ हमें सिखाता है कि जिस प्रकार बादल बिना भेदभाव के सब पर बरसते हैं, उसी प्रकार मनुष्य को भी अपनी करुणा और ज्ञान का दान बिना किसी भेदभाव के करना चाहिए।
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