"प्रभात की जन-जागृति"
पंकज शर्माक्षितिज-रेखा पर नव अरुणिमा, अंगारों-सी हँसती है,
सत्य-दीप की कोमल ज्योति अब ज्वाला बन धधकती है।
मौन समय की शीतल छाया काँप उठी अंतरतम में,
जन-चेतन की उर-गहराई जाग उठी स्पंदन में।
मसृण मखमल के सुख-स्वप्नों में जो न्याय सुलाया था,
आज उसी के शून्य कक्ष ने पीड़ा को अपनाया था।
स्वर्ण-शिखर के गर्विल प्रासादों पर क्षीण प्रकाश है,
जन-मन के उर में संचित अब प्रतिकारक उल्लास है।
मूक रहे जो प्रज्ञ-वृंद, वे भी ग्लानि से भर आए,
अन्यायों के तीक्ष्ण शूल अब अंतर में चुभते जाएँ।
शांत नयन की भीत दृष्टि में ज्वालामुखी कंपन है,
अधरों पर अंकित होने को तत्पर सत्य-वचन है।
टूट रहा मद का आवरण, बिखर रहा अभिमान सारा,
धूलि-धूसरित हो रही अब वैभव की वह क्षणिक धारा।
नीति-भूमि के विस्तृत क्षितिज पर हुंकारें गूँज रही हैं,
काल-चक्र की तीव्र गति सब सीमाएँ तोड़ रही हैं।
शून्य सभागारों में अब प्रतिध्वनि व्याकुल रोती है,
बलिवेदी पर सत्य-रक्त की रेखा अमिट होती है।
वह शिखा प्रज्वलित हो उठी जो तम-पथ को हर लेगी,
जड़ भाग्य-रेखाओं को भी नव दिशा में कर देगी।
कुल-वैभव का गर्विल विस्तार स्वयं क्षीण हो जाता है,
स्वार्थ-निभृत वह नाम स्वयं ही काल ग्रस जाता है।
संघर्षों की धधकती ज्वाला हृदय-गर्भ में जलती है,
न्याय-द्वार पर खड़ी समय की दृष्टि प्रश्न करती है।
जब-जब उन्मत्त शक्ति चेतना को भ्रमित बनाती है,
तब-तब पौरुष की धारा में प्रतिशोध उमड़ आता है।
परिवर्तन की दुंदुभि अब दिग-दिगंत में छाई है,
अन्यायों की दीर्घ रात्रि की सीमा निकट आई है।
उठो, नवोदय के वाहक बन! आलोकित कर दो धरा,
सत्य-अंगारों से प्रज्वलित हो जन-जीवन की यह धरा।
शंख-नाद की गूँज उठे, मिटे दंभ का तम-संघार,
मानवता के नव प्रभात का हो जयघोष अपार।
. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️ "कमल की कलम से"✍️ (शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
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सत्य-दीप की कोमल ज्योति अब ज्वाला बन धधकती है।
मौन समय की शीतल छाया काँप उठी अंतरतम में,
जन-चेतन की उर-गहराई जाग उठी स्पंदन में।
मसृण मखमल के सुख-स्वप्नों में जो न्याय सुलाया था,
आज उसी के शून्य कक्ष ने पीड़ा को अपनाया था।
स्वर्ण-शिखर के गर्विल प्रासादों पर क्षीण प्रकाश है,
जन-मन के उर में संचित अब प्रतिकारक उल्लास है।
मूक रहे जो प्रज्ञ-वृंद, वे भी ग्लानि से भर आए,
अन्यायों के तीक्ष्ण शूल अब अंतर में चुभते जाएँ।
शांत नयन की भीत दृष्टि में ज्वालामुखी कंपन है,
अधरों पर अंकित होने को तत्पर सत्य-वचन है।
टूट रहा मद का आवरण, बिखर रहा अभिमान सारा,
धूलि-धूसरित हो रही अब वैभव की वह क्षणिक धारा।
नीति-भूमि के विस्तृत क्षितिज पर हुंकारें गूँज रही हैं,
काल-चक्र की तीव्र गति सब सीमाएँ तोड़ रही हैं।
शून्य सभागारों में अब प्रतिध्वनि व्याकुल रोती है,
बलिवेदी पर सत्य-रक्त की रेखा अमिट होती है।
वह शिखा प्रज्वलित हो उठी जो तम-पथ को हर लेगी,
जड़ भाग्य-रेखाओं को भी नव दिशा में कर देगी।
कुल-वैभव का गर्विल विस्तार स्वयं क्षीण हो जाता है,
स्वार्थ-निभृत वह नाम स्वयं ही काल ग्रस जाता है।
संघर्षों की धधकती ज्वाला हृदय-गर्भ में जलती है,
न्याय-द्वार पर खड़ी समय की दृष्टि प्रश्न करती है।
जब-जब उन्मत्त शक्ति चेतना को भ्रमित बनाती है,
तब-तब पौरुष की धारा में प्रतिशोध उमड़ आता है।
परिवर्तन की दुंदुभि अब दिग-दिगंत में छाई है,
अन्यायों की दीर्घ रात्रि की सीमा निकट आई है।
उठो, नवोदय के वाहक बन! आलोकित कर दो धरा,
सत्य-अंगारों से प्रज्वलित हो जन-जीवन की यह धरा।
शंख-नाद की गूँज उठे, मिटे दंभ का तम-संघार,
मानवता के नव प्रभात का हो जयघोष अपार।
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