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“स्मृति के दो किनारे”

“स्मृति के दो किनारे”

✍️ डॉ. रवि शंकर मिश्र "राकेश"
केवल दो गीत रचे हैं मैंने,
एक गीत तुम्हारी हँसी का,
एक गीत तुम्हारे विरह का,
केवल दो गीत रचे हैं मैंने॥

रातों-रातों, दिनों-दिनों में,
ख़ामोशी के हर एक क्षणों में,
जो वादे थे सब टूट गए,
कुछ सपने भी संग छूट गए।
पथ सूने थे, दीपक रोए,
नैनों ने भी मोती खोए,
साँसों में थी मधुर सरगम,
पलकों पर थी गीली सरगम,
केवल दो स्वर सजे हैं मैंने,
केवल दो स्वर सजे हैं मैंने—
एक स्वर तुम्हें जगने का,
एक स्वर तुम्हें सो जाने का॥
केवल दो गीत रचे हैं मैंने…

बादल-बादल, पवन-पवन में,
तेरे नाम की हर धड़कन में,
जो विश्वास जगे थे मन में,
वक़्त की धूल में ढल गए क्षण में।
फूल झरे थे, मौसम रोए,
मन के सारे आलम खोए,
सुगंध बसी थी साँसों में,
जैसे धारा हो प्यासों में,
केवल दो चित्र गढ़े हैं मैंने,
केवल दो चित्र गढ़े हैं मैंने—
एक चित्र तुम्हें पाने का,
एक चित्र तुम्हें खो जाने का॥
केवल दो गीत रचे हैं मैंने…

राहों-राहों, मोड़ों-मोड़ों,
तेरी यादों के छोटे जोड़ो,
चलते-चलते थक जाता हूँ,
तुझमें ही फिर खो जाता हूँ।
धूप जली तो छाँव भी रोई,
मन की हर इक ठाँव भी रोई,
तेरे स्पर्श की मधु छाया,
अब भी मन को भरमाया,
केवल दो भाव जगे हैं मैंने,
केवल दो भाव जगे हैं मैंने—
एक भाव तुम्हें चाहने का,
एक भाव तुम्हें भूल जाने का॥केवल दो गीत रचे हैं मैंने…
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