खजाने का राज
अरुण दिव्यांशआए तो थे तुम खाली खाली ,
ढूॅंढ़ रहे हो मार्ग अब जाने का ।
कहाॅं कहाॅं क्या छुपा रखे हो ,
बता दे राज तू खजाने का ।।
आए भी तुम खाली खाली ,
लेकर भी कुछ नहीं जाना है ।
क्या है कमाया क्या गॅंवाया ,
दुनिया को तो ये दिखाना है ।।
ले रहे हो अब साॅंस आखिरी ,
समय नहीं है आजमाने का ।
दोष न देना अब मेरा तुम भी ,
यह दोष तो अब जमाने का ।।
रुपया पैसा सोना चाॅंदी संग
हीरा मोती कहाॅं छिपाया है ।
कहाॅं हैं अब कागजात वे सब ,
दूसरे का जमीं लिखाया है ।।
ले जाएगा सब चोर चुराकर ,
बाद में कैसे तुझे बताने का ।
हो रहा अब समय है तुम्हारा ,
तेरे चोर का है अब आने का ।।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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