“जहाँ सच डरता है”
✍️ डॉ. रवि शंकर मिश्र "राकेश"पहले सच की दीपशिखा जलती थी हर द्वार,
झूठ का डर बढ़ता था अपराध बोध का भार।
धर्म की धड़कन थी भीतर, नीति थी आधार,
पाप कर्म के भय से, बचा रहता था संसार।
अब दृश्य बदल गया है, मूल्य हुए लाचार,
सच की कीमत पूछे जग, झूठ बना व्यापार।
लोगों के होंठों पर पहरा, दिल में छुपा विचार,
सच कहने से डरते, झूठ के आगे दिखते लाचार।
पहले डर था पाप का, अब हानि का है डर,
बदल गया मानक सारा, कांपता हर इक स्वर।
झूठ बना है ढाल यहाँ, सच हो गया बेघर,
न्याय की राहें सूनी, अपराध को लगा है पर।
हिम्मत तो इतनी रखो,सच की लौ जलती रहे,
अंधेरा हो कितना भी गहरा, रौशनी पलती रहे।
नुकसान से ऊपर उठकर, सत्य का मान रहे,
अब भी मानवता की असली पहचान बनी रहे॥
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