“माटी की खुशबू”
(सत्तुआनी विशेष)✍️ डॉ. रवि शंकर मिश्र "राकेश"
इस धरा पर हमें कुछ मिले ना मिले,
माटी का ही सहारा सदा चाहिए।
सूरज तपता रहे या घटा छाई रहे,
मेहनतों का उजियारा सदा चाहिए।।
सत्तू-गुड़ की मिठासें हर घर में घुलें,
बिशुआनी संग झूमें गाँव-नगर।
रोटी चूल्हे पे सजे ना सजे भले,
सत्तू से भरा घर सदा चाहिए।।
खेत-खलिहानों से जब घर आए फसल,
मस्त पवन संग गाछें लोरी सुनाए।
साथ कोई खुशी से भले ना झूमे,
हिम्मतों का सहारा सदा चाहिए।।
कभी धूप मिली, कभी छाँव भी मिली,
जीवन-राहों में ठोकरें सौ मिलीं।
किस्मत में कुछ भी लिखा हो भले,
तेरा स्नेहिल हाथ सर पे सदा चाहिए।।
बैसाखी की रौनक, खुशी ही खुशी,
गाँव में होली-दिवाली-सी लहर।
दूरियाँ हों भले, दिल मिलें हर घड़ी,
छल-कपट से किनारा सदा चाहिए।।
जीवन-पथ पर भले कुछ हासिल न हो,
तन से माटी का रिश्ता कभी ना मिटे।
“राकेश” की ये धरती सजे ना सजे,
माँ-धरा का सहारा सदा चाहिए।।
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