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"ग्रीष्म की धधकती ज्वाला"

"ग्रीष्म की धधकती ज्वाला"

✍️ डॉ. रवि शंकर मिश्र "राकेश"
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क्षितिज पर नव अरुणिमा,
अंगारों-सी दमकती है,
रवि की मंद-मंद किरण अब,
ज्वाला बनकर धधकती है।

घने वृक्ष की शीतल छाया,
तन-मन को सहलाती है,
शीतल मंद समीर लहरकर,
चेतन को हरषाती है।

पवन आज तपन से बोझिल,
अंगारों-सी बहती है,
धरती की हर एक धड़कन,
ज्वाला बनकर रहती है।

सरिता की सूनी लहरें अब,
शीतलता को तरसती हैं,
जल की हर इक बूँद मानो,
अंगारों-सी झरती है।

पलाश-वृंत दहक उठे हैं,
लालिमा छटा बिखरती है,
वन-उपवन की हर इक डाली,
अंगारों-सी हँसती है।

अम्बर से बरसें किरणें,
तीक्ष्ण शरों-सी चुभती हैं,
जीवन की हर एक श्वास अब,
तप की धारा बहती है।

राकेश कहे—इसी दाहक तप में,
नव-आशा अंकुरित होती है,
मरु-क्षण की कठिन परीक्षा में,
सृष्टि नूतन विकसित होती है।

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