पारखी नजर
अरुण दिव्यांशपरख रही हैं ये पारखी नजरें ,
निरंतर आने जाने वालों को ।
आ रहे हैं जो दाग ये छुपाए ,
ढूॅंढ़ रहीं उन नक्कालों को ।।
मुखौटे पहन यहाॅं भरे पड़े हैं ,
उन नेता रूपी रखवालों को ।
समझ रहे हम उन्हें यहाॅं पर ,
मन में भरे हुए इन चालों को ।।
उनकी चालों व भूचालों को ,
कुचलेंगे उनकी ख्यालों को ।
घुसकर आए जो गंदे मार्ग,
बंद करेंगे उन नदी नालों को ।।
आने न देंगे हम राष्ट्र अपने ,
उन गुंडों और मव्वालों को ।
कर देंगे प्रज्वलित वह्नि हम ,
उनके बुने हुए ही जालों को ।।
शेर रूप में घूम रहे हैं भेड़िए ,
गलने न देंगे हम दालों को ।
मिले पड़े हैं दुश्मन से हमारे ,
भेजेंगे वापस इन दलालों को ।।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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