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आओ कदम बढ़ाएं, प्यासे विहंगों की ओर

आओ कदम बढ़ाएं, प्यासे विहंगों की ओर

कुमार महेंद्र
ग्रीष्म ऋतु यौवन अंगड़ाई,
परिवेश उत्संग उष्ण धारा।
सिहर रहे मूक जीव-जंतु,
बस उनको अब मनुज सहारा।
शुभ मंगल नव पहल के संग,
परिंडे स्थापना, प्रयास पुरजोर ।
आओ कदम बढ़ाएं, प्यासे विहंगों की ओर।।

सनातन धर्म पय-सेवा,
परम पुण्य, अनुपम काम।
मानवता नित शीर्ष शोभा,
कर खग-पानी का इंतजाम।
सहज सुलभ हर स्थान पर,
शीतल छांव, जहाँ मिले नीर का ठौर ।
आओ कदम बढ़ाएं, प्यासे विहंगों की ओर।।

उच्च तापमान, लू का प्रहार,
दैनिक चर्या अस्त-व्यस्त।
बचाव ही उपाय, मूल मंत्र,
भरी दोपहरी, जीवन पस्त।
सहम रहा संपूर्ण पंछी जग,
कर प्रतीक्षा अंबु-आशा भोर ।
आओ कदम बढ़ाएं, प्यासे विहंगों की ओर।।

पक्षी-मानव अंतर्संबंध अद्भुत,
घनिष्ठ मैत्री, प्रेरणा-पुंज उपमा।
तृषा-तृप्ति, नैतिक कर्म-धर्म,
हिय में प्रकृति-संरक्षण भावना रमा।
करबद्ध निवेदन जन-मानस से,
सक्रिय योगदान—अप्रतिम सेवा की ओर ।
आओ कदम बढ़ाएं, प्यासे विहंगों की ओर।।
✍️ कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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