उज्जैन का शिप्रा, महाकाल और मौन तीर्थ की दिव्य यात्रा
सत्येन्द्र कुमार पाठक
: महाकाल की नगरी में समय का संगम उज्जयिनी, जिसे देवताओं की नगरी और समय की गणना का केंद्र माना जाता है, भारत की उन सात पवित्र पुरियों में अग्रणी है जो मनुष्य को जन्म-मरण के बंधन से मुक्त कर मोक्ष प्रदान करती हैं। १६ अप्रैल २०२६ की सुनहरी सुबह जब सूर्य की पहली किरण शिप्रा की लहरों पर थिरकती है, तो अवन्तिका का कण-कण 'जय श्री महाकाल' के उद्घोष से गुंजायमान हो उठता है। यह नगरी केवल भूगोल का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह वह बिंदु है जहाँ इतिहास, पुराण और आधुनिक आस्था का अद्भुत मिलन होता है। सम्राट विक्रमादित्य की शौर्य गाथाओं से लेकर महाकवि कालिदास की लेखनी तक, उज्जैन का गौरव अनंत है।
उज्जैन की आत्मा उसकी जीवनरेखा 'शिप्रा' नदी में बसती है। पौराणिक आख्यानों के अनुसार, शिप्रा का प्राकट्य किसी साधारण भौगोलिक घटना का परिणाम नहीं है। ब्रह्मपुराण का साक्ष्य: ब्रह्मपुराण के अनुसार, जब भगवान शिव ब्रह्माजी का कपाल लेकर भिक्षा मांग रहे थे, तब विष्णुजी ने अपनी उंगली दिखाई। शिवजी के त्रिशूल के स्पर्श से विष्णुजी की उंगली से जो रक्त की धारा प्रवाहित हुई, वही धरती पर 'शिप्रा' के रूप में अवतरित हुई। इसी कारण इसे 'विष्णु-देह-संभूता' भी कहा जाता है।।वराह पुराण के अनुसार, इसका उद्गम भगवान विष्णु के वराह अवतार के हृदय से माना जाता है।।शिप्रा नदी इंदौर के निकट 'काकरी बरडी' (जानापाव पहाड़ियों) से निकलती है। लगभग १९६ किमी की यात्रा तय कर, यह मंदसौर में चंबल नदी में समाहित हो जाती है। 'क्षिप्रा' शब्द का अर्थ है—'शीघ्र'। मान्यता है कि अन्य नदियों में स्नान का पुण्य लंबे समय के तप के बाद मिलता है, परंतु शिप्रा की गोद में डुबकी लगाते ही मनुष्य के संचित पापों का क्षय हो जाता है और वह तुरंत धर्मात्मा बन जाता है।
. महाकालेश्वर: मृत्युलोक के अधिपति और दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग शिप्रा के पावन तट से कुछ ही दूरी पर स्थित है विश्व प्रसिद्ध महाकालेश्वर मंदिर। यह मंदिर न केवल धार्मिक दृष्टि से, बल्कि स्थापत्य और ज्योतिषीय दृष्टि से भी अद्वितीय है।: भगवान शिव के १२ ज्योतिर्लिंगों में महाकाल को सबसे 'जागृत' स्वरूप माना गया है। यह एकमात्र ऐसा ज्योतिर्लिंग है जो दक्षिणमुखी है। तंत्र शास्त्र में दक्षिण दिशा का स्वामी 'काल' (यमराज) को माना गया है, और महाकाल स्वयं काल के भी अधिपति हैं, इसलिए यहाँ काल का भय समाप्त हो जाता है। भस्म आरती और महाकाल वन: उज्जैन का प्राचीन नाम 'महाकाल वन' भी है। यहाँ की भस्म आरती विश्वप्रसिद्ध है, जो जीवन और मृत्यु की नश्वरता का साक्षात् बोध कराती है। यहाँ के ज्योतिर्लिंग की महिमा का वर्णन शिव पुराण और स्कंद पुराण में विस्तार से मिलता है। आधुनिक भागदौड़ भरी दुनिया में यदि कोई स्थान शांति का पर्याय है, तो वह उज्जैन का मौन आश्रम (मौनतीर्थ धाम) है। शिप्रा के उत्तरवाहिनी तट (गंगाघाट) पर स्थित यह आश्रम अंतर्यात्रा का मार्ग प्रशस्त करता है। ब्रह्मलीन मौनी बाबा की विरासत: यह धाम मौनी बाबा की तपस्थली है, जिन्होंने जीवन भर मौन रहकर आत्मज्ञान का संदेश दिया। आज यहाँ की व्यवस्थाएं डॉ. सुमन भाई के निर्देशन में एक जीवंत आध्यात्मिक केंद्र के रूप में फल-फूल रही हैं। वैदिक पुनर्जागरण: यहाँ का वेद विद्यालय प्राचीन और आधुनिकता का संगम है। विद्यार्थी परंपरागत वेशभूषा में वेदों का सस्वर पाठ करते हैं, जिससे पूरा वातावरण पवित्र हो जाता है। अध्यात्म के प्रतीक: आश्रम में स्थित शालीग्राम, जिसे गोस्वामी तुलसीदास जी ने अर्पित किया था, और परिसर का दिव्य कल्पवृक्ष श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र हैं। यहाँ की गौशाला, जहाँ गायों का मानवीकरण कर उन्हें देवियों का नाम दिया गया है, जीव-दया का अनुपम उदाहरण पेश करती है। शिप्रा का रामघाट वह स्थान है जहाँ त्रेतायुग में भगवान श्रीराम ने वनवास के दौरान अपने पिता राजा दशरथ का श्राद्ध और तर्पण किया था। इसी प्रकार, सिद्धवट (पार्वती वट) को गया के अक्षयवट के समान फलदायी माना गया है। यहाँ पितरों के निमित्त किया गया दान और तर्पण अक्षय पुण्य प्रदान करता है।
. सिंहस्थ कुंभ २०२८: आगामी महापर्व की आहट उज्जैन की चर्चा तब तक अधूरी है जब तक 'सिंहस्थ' का उल्लेख न हो। सिंहस्थ कुंभ हर १२ साल में एक बार तब आयोजित होता है जब बृहस्पति सिंह राशि में और सूर्य मेष राशि में प्रवेश करते हैं प्रशासन द्वारा वर्ष २०२८ के सिंहस्थ की तारीखों की घोषणा कर दी गई है। इस बार का सिंहस्थ ऐतिहासिक होने वाला पहली बार यह मेला दो महीने तक चलेगा, जिससे श्रद्धालुओं को अधिक समय और सुविधा मिल सकेगी । करोड़ों श्रद्धालु शिप्रा के अमृतमयी जल में डुबकी लगाएंगे। देशभर के अखाड़े, नागा साधु और संत समाज अवन्तिका की पावन धरा पर एकत्रित होंते है। उज्जैन की यात्रा सांदीपनि आश्रम (जहाँ श्रीकृष्ण ने ६४ कलाएं सीखीं), मंगलनाथ मंदिर (मंगल ग्रह की जन्मभूमि), और काल भैरव (जहाँ मदिरा का भोग लगाया जाता है) के बिना अपूर्ण है। प्रत्येक मंदिर की अपनी एक अलग पौराणिक कथा और महत्व है।
१६ अप्रैल २०२६ का यह भ्रमण हमें यह सिखाता है कि उज्जैन केवल मंदिरों का शहर नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की कला का केंद्र है। शिप्रा की कल-कल ध्वनि में विष्णु का समर्पण है, तो महाकाल के घंटों की गूंज में शिव का वैराग्य। यहाँ का मौन आश्रम हमें अपने भीतर झांकने की प्रेरणा देता है, तो सिंहस्थ का मेला हमें वसुधैव कुटुंबकम की भावना से जोड़ता है। शिप्रा तट पर बैठकर संध्या आरती देखना एक ऐसा अनुभव है जो शब्दों से परे है। जैसा कि स्कंद पुराण में कहा गया है—जो पुण्य प्रयाग या काशी में लंबे प्रवास से मिलता है, वह उज्जैन में महाकाल के दर्शन और शिप्रा के स्पर्श से क्षण भर में प्राप्त हो जाता है।जय महाकाल! जय माँ शिप्रा
हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे फेसबुक पेज से जुड़े https://www.facebook.com/divyarashmimag हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews हमें ट्विटर पर फॉलो करे :- https://x.com/DivyaRashmi8

0 टिप्पणियाँ
दिव्य रश्मि की खबरों को प्राप्त करने के लिए हमारे खबरों को लाइक ओर पोर्टल को सब्सक्राइब करना ना भूले| दिव्य रश्मि समाचार यूट्यूब पर हमारे चैनल Divya Rashmi News को लाईक करें |
खबरों के लिए एवं जुड़ने के लिए सम्पर्क करें contact@divyarashmi.com
#NEWS,
#hindinews