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आरक्षण, राजनीति और समानता का प्रश्न

आरक्षण, राजनीति और समानता का प्रश्न

-डॉ. अ. कीर्ति वर्द्धन

भारत का संविधान हमें “समान नागरिक” होने का अधिकार देता है। यह केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की मूल आत्मा है। परंतु वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में यह प्रश्न बार-बार उठता है कि क्या वास्तव में सभी नागरिकों के अधिकार समान हैं, या फिर यह समानता केवल कागज़ों तक सीमित रह गई है?

आज देश की राजनीति में एक प्रवृत्ति स्पष्ट रूप से दिखाई देती है-नीतियाँ और निर्णय योग्यता या समग्र राष्ट्रीय हित के बजाय वोट-बैंक और संख्या बल के आधार पर तय होते हैं। आरक्षण, जो कभी सामाजिक न्याय और ऐतिहासिक विषमताओं को दूर करने का माध्यम था, अब कई बार राजनीतिक हथियार बनकर उभरता दिखता है।

यह स्वीकार करना होगा कि भारत जैसे विविधतापूर्ण समाज में पिछड़े वर्गों, दलितों और वंचित समुदायों को आगे लाने के लिए विशेष प्रावधान आवश्यक थे और हैं। परंतु प्रश्न तब उठता है, जब यह व्यवस्था “सहायक साधन” से “स्थायी आधार” बन जाती है। क्या हम एक ऐसे समाज की कल्पना कर सकते हैं, जहाँ योग्यता, परिश्रम और प्रतिभा से अधिक महत्व केवल जातीय या सामाजिक पहचान को मिले?

राजनीतिक दलों की विडंबना भी कम नहीं है। वे मंच से आरक्षण का समर्थन करते हैं, परंतु जब अपने दलों में टिकट वितरण की बात आती है, तो वही दल “जीताऊ उम्मीदवार” की तलाश में सिद्धांतों से समझौता कर लेते हैं। यदि सामाजिक न्याय के प्रति इतनी ही प्रतिबद्धता है, तो क्यों नहीं सभी वर्गों-अल्पसंख्यक, दलित, पिछड़े और महिलाओं-को व्यापक और निष्पक्ष प्रतिनिधित्व दिया जाता?

समाज में एक और चिंता उभर रही है-कुछ वर्गों में यह भावना गहराती जा रही है कि उनके अधिकारों की अनदेखी हो रही है। जब कोई व्यवस्था संतुलन खो देती है, तो असंतोष जन्म लेना स्वाभाविक है। यह स्थिति किसी भी लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है।

“संख्या बल” को यदि ही एकमात्र मापदंड बना दिया जाए, तो शासन व्यवस्था की गुणवत्ता पर प्रश्नचिह्न लगना तय है। नेतृत्व केवल संख्या से नहीं, बल्कि क्षमता, दृष्टि और नैतिकता से तय होना चाहिए। अन्यथा लोकतंत्र धीरे-धीरे भीड़तंत्र में परिवर्तित हो सकता है।

यह भी समझना आवश्यक है कि कोई भी राष्ट्र केवल “बैसाखियों” के सहारे मजबूत नहीं बन सकता। आरक्षण का उद्देश्य समाज को स्थायी रूप से विभाजित करना नहीं, बल्कि उसे इस स्थिति तक पहुँचाना होना चाहिए, जहाँ इसकी आवश्यकता स्वयं समाप्त हो जाए।

समय की मांग है कि हम इस विषय पर भावनाओं से नहीं, बल्कि तर्क और संतुलन से विचार करें। सामाजिक न्याय और समान अवसर-दोनों के बीच संतुलन स्थापित करना ही सच्चे लोकतंत्र की पहचान है।

अंततः, हमें यह तय करना होगा कि हम किस प्रकार का भारत बनाना चाहते हैं-
एक ऐसा भारत जहाँ पहचान के आधार पर अवसर मिलते हैं,
या एक ऐसा भारत जहाँ हर नागरिक को उसकी योग्यता और कर्म के आधार पर समान अवसर प्राप्त हो।यही प्रश्न आज हमारे लोकतंत्र के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनकर खड़ा है।
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