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अणुव्रत दर्शन: व्यक्ति निर्माण से विश्व शांति का महापथ

अणुव्रत दर्शन: व्यक्ति निर्माण से विश्व शांति का महापथ

सत्येन्द्र कुमार पाठक
आधुनिक युग में जहाँ मानव जाति तकनीकी और वैज्ञानिक ऊँचाइयों को छू रही है, वहीं दूसरी ओर नैतिक मूल्यों का निरंतर ह्रास हो रहा है। हिंसा, भ्रष्टाचार, संग्रह की प्रवृत्ति और मानसिक तनाव ने वैश्विक स्तर पर अशांति पैदा कर दी है। ऐसे चुनौतीपूर्ण समय में, आचार्य तुलसी द्वारा प्रवर्तित 'अणुव्रत' का सिद्धांत एक संजीवनी के समान प्रकट होता है। 'अणु' का अर्थ है सूक्ष्म या छोटा, और 'व्रत' का अर्थ है संकल्प। अर्थात, जीवन के छोटे-छोटे व्यवहारिक संकल्पों के माध्यम से स्वयं को और समाज को परिष्कृत करना ही अणुव्रत है।
अणुव्रत आंदोलन का सूत्रपात 1 मार्च 1949 को राजस्थान के सरदारशहर से हुआ। द्वितीय विश्व युद्ध की विभीषिका और भारत के विभाजन के बाद फैली सांप्रदायिक हिंसा ने समाज को भीतर से झकझोर दिया था। उस समय तेरापंथ धर्मसंघ के नौवें अधिशास्ता आचार्य तुलसी ने महसूस किया कि जब तक व्यक्ति का चरित्र नहीं सुधरेगा, तब तक राष्ट्र या समाज की उन्नति केवल कागजी होगी।
आचार्य तुलसी ने नारा दिया— "सुधरे व्यक्ति, समाज और राष्ट्र स्वयं सुधरेगा।" यह आंदोलन किसी धर्म विशेष के लिए नहीं था, बल्कि यह 'मानव धर्म' की पुनः स्थापना का प्रयास था। आचार्य तुलसी ने इसे 'असांप्रदायिक' रखा, ताकि हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई या नास्तिक भी इसे सहजता से अपना सकें।
अणुव्रत का आधार जैन दर्शन के 'महाव्रत' (अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह) हैं, लेकिन इन्हें गृहस्थ जीवन और आधुनिक संदर्भों के अनुकूल बनाया गया है। अणुव्रत के ११ मुख्य नियम या संकल्प निम्नलिखित क्षेत्रों पर बल देते हैं: अहिंसा और सौहार्द: किसी भी निर्दोष प्राणी की हत्या न करना और न ही आत्महत्या का विचार करना। इसमें वैचारिक हिंसा का त्याग भी शामिल है। धर्म के नाम पर नफरत न फैलाना। अन्य धर्मों के प्रति सहिष्णुता रखना।
व्यापार और व्यवहार में मिलावट, धोखाधड़ी या कालाबाजारी न करना। यौन शुचिता बनाए रखना और संबंधों में मर्यादा का पालन करना। अपनी आवश्यकताओं को सीमित करना। यह आज के उपभोक्तावाद का सबसे सटीक उत्तर है । शराब, ड्रग्स और अन्य नशीले पदार्थों का पूरी तरह त्याग करना। मतदान के समय बिना किसी प्रलोभन या दबाव के योग्य व्यक्ति का चयन करना।
आंतरिक परिवर्तन की प्रक्रिया में अणुव्रत का सबसे बड़ा मानवीय अवदान 'चरित्र निर्माण' है। मनोविज्ञान कहता है कि मनुष्य की आदतें ही उसका भविष्य तय करती हैं। अणुव्रत व्यक्ति को आत्म-निरीक्षण के लिए प्रेरित करता है।
आत्म-संयम के लिए वर्तमान शिक्षा पद्धति सूचनाओं पर बल देती है, लेकिन अणुव्रत 'संस्कारों' पर बल देता है। यह सिखाता है कि इच्छाओं पर विजय पाना ही वास्तविक स्वतंत्रता है। तनाव मुक्ति से संचय की अंधी दौड़ तनाव का कारण है। अणुव्रत के 'इच्छा परिमाण' सिद्धांत से व्यक्ति को मानसिक संतोष प्राप्त होता है।
निर्भयता में : जब व्यक्ति झूठ और चोरी का त्याग करता है, तो उसके भीतर एक अद्भुत साहस का जन्म होता है
समाज केवल व्यक्तियों का समूह नहीं, बल्कि उनके अंतर्संबंधों का जाल है। अणुव्रत ने सामाजिक ढाँचे को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है: अणुव्रत ने दहेज प्रथा, मृत्युभोज और पर्दा प्रथा जैसी कुरीतियों के विरुद्ध जन-जागरण किया। आचार्य तुलसी और उनके उत्तराधिकारी आचार्य महाप्रज्ञ ने पदयात्राओं के माध्यम से सुदूर गाँवों तक जाकर लोगों को इन सामाजिक बुराइयों से मुक्त कराया ।
आज दुनिया में अमीर और गरीब के बीच की खाई बढ़ती जा रही है। अणुव्रत का 'अपरिग्रह' सिद्धांत कहता है कि धन का संचय उतना ही करो जितनी जरूरत हो। यह विचार गांधीजी के 'ट्रस्टीशिप' (न्यास) के सिद्धांत से मेल खाता है। यदि समाज के धनी वर्ग में अणुव्रत की भावना आए, तो वितरण प्रणाली स्वतः ही न्यायसंगत हो जाएगी।
अणुव्रत आंदोलन ने लाखों परिवारों को टूटने से बचाया है। 'व्यसन मुक्ति' इसका एक अनिवार्य अंग है। जब एक व्यक्ति नशा छोड़ता है, तो केवल वह नहीं सुधरता, बल्कि उसकी पूरी अगली पीढ़ी का भविष्य सुरक्षित हो जाता है।
आचार्य महाप्रज्ञ ने 'प्रेक्षाध्यान' और अणुव्रत के माध्यम से पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता जगाई। अणुव्रत का नियम है कि "मैं प्रकृति के संसाधनों का अनावश्यक दोहन नहीं करूँगा।" जल, वायु और वनस्पति की रक्षा करना अणुव्रती के लिए एक नैतिक दायित्व है।
आज विश्व दो बड़े संकटों से जूझ रहा है: आतंकवाद और जलवायु परिवर्तन। आतंकवाद की जड़ कट्टरता और संकुचित सोच में है। अणुव्रत का 'अनेकांतवाद' (विविध दृष्टिकोणों का सम्मान) और 'सांप्रदायिक सौहार्द' का संकल्प इस घृणा को समाप्त करने की शक्ति रखता है। ग्लोबल वार्मिंग मनुष्य के लालच का परिणाम है। अणुव्रत का 'संयम' और 'अपरिग्रह' हमें यह सिखाता है कि हम धरती के मालिक नहीं, बल्कि इसके हिस्सेदार हैं।
अणुव्रत कोई संन्यासी बनने का मार्ग नहीं है, बल्कि यह एक 'जागरूक नागरिक' बनने की प्रक्रिया है। यह धर्म को मंदिर और पूजा-पाठ की सीमाओं से निकालकर 'आचरण' के धरातल पर खड़ा करता है। आचार्य तुलसी ने जो बीज 1949 में बोया था, वह आज एक विशाल वटवृक्ष बन चुका है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में अणुव्रत की प्रासंगिकता और बढ़ गई है। यदि हम चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ियाँ एक शांतिपूर्ण और सुरक्षित विश्व में साँस लें, तो हमें अणुव्रत के छोटे संकल्पों को अपने जीवन का हिस्सा बनाना ही होगा। अणुव्रत केवल एक विचार नहीं, बल्कि एक जीवन-क्रांति है।
"अणुव्रत का है यह संदेश, सुधरे व्यक्ति और सुधरे देश।"
संदर्भ - ऐतिहासिक आधार: आचार्य तुलसी का 'अणुव्रत दर्शन' (1949)। , दार्शनिक आधार: जैन धर्म के पंच महाव्रत (लघु रूप में)। सामाजिक प्रभाव: नशा मुक्ति, दहेज निषेध और सांप्रदायिक एकता। वैश्विक संदर्भ: सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स और वैश्विक शांति।
स्थाई पता : करपी , अरवल , बिहार ८०४४१९
वर्तमान पता - माधवनगर , काकोरोड़ , आर एस ,
जहानाबाद , बिहार ८०४४१७


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