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बिखरे जब सांसों की खुशबू, मधुमास हृदय में छा जाता

तेरी मुस्कान में बहता नेह,
तेरी हर अदा में छिपा अनुराग…
प्रेम जब खिलता है, तो जीवन मधुमास बन जाता

बिखरे जब सांसों की खुशबू, मधुमास हृदय में छा जाता

कुमार महेन्द्र


मुखमंडल मुस्कान निर्झर,
नयन पटल नेह प्रवाह।
भाव-भंगिमा मस्त मलंग,
रूप उभार मोहक अथाह।
चाल-ढाल मनभावन ऐसी,
सौंदर्य सदा तन-मन लुभाता।
बिखरे जब सांसों की खुशबू, मधुमास हृदय में छा जाता।।


हिय प्रिय परिधान छटा,
संवाद आत्मिकता सराबोर।
सहज-सरस आचार-विचार,
शर्म-संकोच नैसर्गिक ठौर।
काया कंचन-सी रम्य कामिनी,
हर पग मधुरिम गान सुनाता।
बिखरे जब सांसों की खुशबू, मधुमास हृदय में छा जाता।।


बिंदी-सिंदूर श्रृंगार प्रमुख,
चूड़ी-झांझर मधुर खनक।
अधर-अमृत दिव्य गागर,
शब्द-संकेत सुख के जनक।
पुरातन संग अधुना समन्वय,
लोक-राग रंग खुशियां लाता।
बिखरे जब सांसों की खुशबू, मधुमास हृदय में छा जाता।।


स्वर मधुरिम कर्णप्रिय,
प्रीतम-सम रूप आकर्षण।
रग-रग नवयौवन स्पंदन,
मिलन हेतु सर्वस्व अर्पण।
जीवन प्रतिपल आनंदमय,
परिणय उत्सव उमंग जगाता।
बिखरे जब सांसों की खुशबू, मधुमास हृदय में छा जाता।।


कुमार महेन्द्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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