ऋषि संस्कृति का : श्रृंगी ऋषि और त्याग की देवी शांता
सत्येन्द्र कुमार पाठक
ऋषि सत्ता और राजसत्ता का शाश्वत समन्वय का भारतीय वांग्मय में 'ऋषि' शब्द केवल एक तपस्वी का परिचायक नहीं है, बल्कि वह एक वैज्ञानिक, समाजशास्त्री और मार्गदर्शक का प्रतीक है। त्रेतायुग के इतिहास में श्रृंगी ऋषि एक ऐसे देदीप्यमान नक्षत्र हैं, जिन्होंने अपनी साधना से न केवल दो महान जनपदों—अंग (मगध का पूर्वी भाग) और कौशल (अयोध्या)—को जोड़ा, बल्कि संपूर्ण मानवता को 'मर्यादा पुरुषोत्तम' के रूप में एक आदर्श उपहार दिया। यह आलेख उनके प्रादुर्भाव, उनकी विशिष्ट जीवन पद्धति और वैश्विक संदर्भ में उनके योगदान का एक विस्तृत विश्लेषण है।
प्रकृति और तप का अनूठा संयोग श्रृंगी ऋषि (ऋष्यश्रृंग) का जन्म विभाण्डक ऋषि और अप्सरा उर्वशी के संसर्ग से हुआ। उनके मस्तक पर स्थित 'मृग श्रृंग' (सींग) केवल एक शारीरिक लक्षण नहीं, बल्कि उनके 'ऊर्ध्वरेता' होने और उनकी प्राण-शक्ति के सहस्रार चक्र पर केंद्रित होने का वैज्ञानिक प्रमाण था। कीकट और अंग की तपोभूमि: उनका बचपन मगध के पूर्वी छोर और अंग प्रदेश की पर्वत श्रृंखलाओं (वर्तमान मुंगेर और लखीसराय) में बीता। विभाण्डक ऋषि ने उन्हें बाहरी जगत, विशेषकर नारी-संपर्क से पूर्णतः विलग रखा। यह एक प्रकार का 'मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक प्रयोग' था, जिसने श्रृंगी ऋषि के भीतर एक ऐसी 'अमूर्त ऊर्जा' को संचित किया, जो आगे चलकर अकाल निवारण और वंश-वृद्धि का आधार बनी।
त्याग और सेवा की प्रतिमूर्ति अयोध्या के राजा दशरथ की भार्या कौशल्या की पुत्री भगवान राम की बहन देवी शांता का व्यक्तित्व इतिहास के पन्नों में अत्यंत गरिमामय है। राजा दशरथ और कौशल्या की पुत्री होने के नाते वे अयोध्या की राजकुमारी थीं, किंतु नियति ने उन्हें अंगराज लोमपाद की दत्तक पुत्री बनाया है। वैश्विक दृष्टि में शांता का जीवन 'दत्तक पुत्री' के रूप में पारिवारिक संबंधों की उस महानता को दर्शाता है जहाँ मित्रता (दशरथ और लोमपाद) के लिए रक्त-संबंधों का सहर्ष दान कर दिया जाता था। उनका विवाह श्रृंगी ऋषि से होना 'राजसी वैभव' और 'ऋषि तप' के मिलन का ऐतिहासिक क्षण था।
अंग प्रदेश का अकाल और श्रृंगी ऋषि का वैज्ञानिक हस्तक्षेप कीकट और अंग प्रदेश में पड़े भीषण अकाल के समय श्रृंगी ऋषि का आगमन एक 'जल-वैज्ञानिक' के रूप में देखा जा सकता है। पर्जन्य मंत्र और वातावरण का ज्ञाता ऋषि श्रृंगी उनके द्वारा किए गए अनुष्ठानों ने वायुमंडल के दबाव और आर्द्रता को इस प्रकार प्रभावित किया कि मूसलाधार वर्षा हुई। यह सिद्ध करता है कि ऋषि संस्कृति के पास प्रकृति के तत्वों (Elements) को नियंत्रित करने की परा-विज्ञान शक्ति थी। भू-सांस्कृतिक प्रभाव में मुंगेर के 'ऋषिकुण्ड' और 'श्रृंग पर्वत' पर स्थित जलधाराएँ उनके तपोबल की वैज्ञानिकता की गवाही देती हैं। पुत्रकामेष्टि यज्ञ: एक ब्रह्मांडीय इंजीनियरिंग अयोध्या में संपन्न हुआ 'पुत्रकामेष्टि यज्ञ' भारतीय इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटना है। यह यज्ञ कोई सामान्य कर्मकांड नहीं था:।गणितीय परिशुद्धता: यज्ञ कुण्ड की वेदी का निर्माण विशिष्ट ज्यामितीय अनुपातों (Geometric Ratios) में किया गया था ताकि मंत्रों की ध्वनि तरंगें अंतरिक्ष से ईश्वरीय अंश को आकर्षित कर सकें। कीकट (मगध) का योगदान: यज्ञ में प्रयुक्त हविष्य, ओषधियाँ और समिधा मुख्य रूप से मगध और अंग के वनों से ली गई थीं। पुनपुन और गंगा का जल इस यज्ञ का आधार बना। नौ माह पश्चात श्रीराम का जन्म हुआ, जो यह दर्शाता है कि ऋषियों ने 'जेनेटिक्स' और 'एस्ट्रो-बायोलॉजी' के सूक्ष्म सिद्धांतों का उपयोग किया था।।मृग श्रृंग' का लोप: व्यक्तित्व का मानवीकरण विवाह के पश्चात श्रृंगी ऋषि के मस्तक से सींग का लुप्त होना उनके 'ऋषि' से 'लोक-शिक्षक' बनने की प्रक्रिया थी। यह इस बात का वैश्विक संदेश है कि जब एक व्यक्ति व्यक्तिगत मोक्ष को छोड़कर समाज की सेवा में आता है, तो वह अपनी विशिष्टताओं का त्याग कर जन-सामान्य के साथ एकाकार हो जाता है।
वैश्विक परिप्रेक्ष्य:में श्रीलंका और दक्षिण-पूर्व एशिया तक प्रभाव में श्रृंगी ऋषि की इस वंश परंपरा और यज्ञ विद्या का विस्तार सुदूर दक्षिण तक हुआ।।रावण और ऋषि संस्कृति: लंकापति रावण स्वयं एक प्रकांड विद्वान था, किंतु उसने ऋषि संस्कृति के 'कल्याणकारी' पक्ष को त्याग दिया था। श्रृंगी ऋषि द्वारा स्थापित मर्यादाओं का ही प्रभाव था कि विभीषण जैसे पात्रों ने ऋषि संस्कृति को लंका में जीवित रखा। बौद्ध और सनातन समन्वय: श्रीलंका में ऋषि परंपरा के अवशेष आज भी वहां के प्राचीन मंदिरों और 'मंत्र-पद्धति' में देखे जा सकते हैं, जहाँ भारतीय ऋषियों के ज्ञान को संचित किया गया है। बिहार क्षेत्र की विरासत: में श्रृंगी ऋषि के सिद्धांतों की प्रतीक्षा कर रही है। पर्यावरण और जल संरक्षण: श्रृंगी ऋषि ने अकाल दूर किया था। आज 'नमामि गंगे' और 'नदी स्वच्छता' के माध्यम से हम उसी ऋषि परंपरा को दोहरा रहे हैं। सांस्कृतिक चेतना: मगध का इतिहास केवल साम्राज्यों का इतिहास नहीं है, बल्कि यह ऋषियों के उस 'बौद्धिक साम्राज्य' का इतिहास है जिसने अयोध्या को राम दिए और विश्व को शांति का संदेश। श्रृंगी ऋषि और शांता का आख्यान हमें सिखाता है कि ज्ञान (विभाण्डक), सेवा (शांता), तप (श्रृंगी) और शासन (दशरथ) जब एक सूत्र में बंधते हैं, तभी 'राम-राज्य' की स्थापना होती है। आज के वैश्विक परिदृश्य में, जहाँ जल संकट और नैतिक पतन की चुनौतियाँ हैं, श्रृंगी ऋषि की 'प्रकृति-केंद्रित' जीवन पद्धति ही एकमात्र समाधान है।
संदर् वाल्मीकि रामायण - बालकांड (सर्ग 9-11) , श्रीमद्भागवत पुराण - नवम स्कंध ,ऋष्यश्रृंग स्मृति एवं अथर्ववेदीय संहिता , मगध क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत , पुनपुन एवं गंगा महात्म्य - क्षेत्रीय श्रुत ।
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