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"अविराम अंतर्द्वंद्व"

"अविराम अंतर्द्वंद्व"

पंकज शर्मा
हृदय के इस निस्तब्ध वन में, पीड़ा बीज-सी जमती है,
न अश्रु बनकर बह पाती, न ज्वाला बनकर दमकती है।
स्मृतियों की परतों तले, एक अज्ञात दरार है,
जहाँ चेतना अपनी ही पदचापों से चौंकती है।

शून्य के अगाध सिंधु में, डूबा एक किनारा है,
न मृत्यु का कोई आश्रय, न जीवन का सहारा है।
त्रिशंकु-सा लटका अस्तित्व, नियति की मुट्ठी में कैद,
हर श्वास ने बस विवशता का ही स्वर दोहराया है।

नयनों में निद्रा का मरुस्थल, प्यास बन ठिठकी रहती,
स्वप्नों की हर कोमल कली, खिलने से पहले झरती।
सुकून का पंछी उड़ चला है, पार किसी अनजान गगन,
अंतर की गुफा में तड़प, स्वयं से ही सहमी रहती।


दोष किसे दें? विधि ने ही जब, लेख विकट लिख डाला,
अंधकार में टूटा दर्पण, बिखरा हर एक उजाला।
न हँसी का कोई अवशेष, न अश्रु का कोई विस्तार,
भाग्य को कोसते रहते, पर घाव रहा उतना ही काला।


यह कैसी निःशब्द ज्वाला है, जो धुएँ बिना ही जलती,
जीवन की हर एक अभिलाषा को, चुपचाप निगलती चलती।
अस्तित्व बना कारागार, जहाँ दीवारें भी गूँगी हैं,
हर करवट पर नियति नई व्यथा का रूप बदलती।


मूक व्याकुलता की शिराओं में, रक्त नहीं—विष बहता,
अंतर्मन अपने ही सम्मुख, निर्मम सत्य कहता।
न देह को मुक्ति का स्पर्श, न मन को विश्राम का क्षण,
बस एक अथाह सन्नाटा, भीतर ही भीतर रहता।


विरह की वह करुण छाया अब, देह-मन पर छा आई,
चेतना के गूढ़ संघर्षों ने, पहचान स्वयं की भरमाई।
जीवन एक अनकहा बंधन, मृत्यु भी एक पहेली,
इस द्वंद्व में ‘कमळ’ ने अपनी ही छवि धुंधलाई।


पर क्या यह अंतिम विराम? या भोर की कोई आहट?
क्या इस वेदना-सिंधु में भी, छिपी हुई है मुस्कुराहट?
जब तक श्वासों का संबल है, संघर्ष ही सत्य रहेगा,
इसी अंतर्दाह में संभव, जीवन का मौलिक सारतत्त्व।


. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️ "कमल की कलम से"✍️ (शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
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