- मोहिनी प्रिया
स्वर्गीय पंडित बिरजू महाराज ने कहा है कि नृत्य कहाँ नहीं है ? रसोई में खाना बनाती उंँगलियों का नृत्य । कलम चलाते हाथों का कागज पर नृत्य । किसान का खेतों में नृत्य । हृदय का शरीर में ताल बद्ध नृत्य , नृत्य खत्म प्रकृति खत्म । अब आप ही देखिये ना प्रकृति सबसे बड़ी नृत्यांगना है । पेड़ों का झूमना , नदियों का बलखाना , मोर का पंख फैलाना — यह सब सृष्टि का शाश्वत नृत्य ही तो है । इंसान ने जब प्रकृति को देखा , तो कदम खुद-ब-खुद थिरक उठे । भारत के कई नृत्य तो सीधे प्रकृति की गोद से जन्मे हैं । नृत्य सिर्फ कदमों की थिरकन नहीं है । यह आत्मा की भाषा है , जो शब्दों के बिना भी सब कुछ कह देती है । हर साल 29 अप्रैल को जब पूरी दुनिया ‘ विश्व नृत्य दिवस ’ मनाती है , तो असल में हम मानवता की सबसे पुरानी , सबसे ईमानदार अभिव्यक्ति का उत्सव मनाते हैं । नृत्य महज मनोरंजन का साधन नहीं है , बल्कि यह भावनाओं के साथ , कला व संस्कृति को दर्शाने और सेहतमंद रहने का भी बेहतरीन जरिया है ।
*क्यों मनाते हैं विश्व नृत्य दिवस ?*
1982 में यूनेस्को की अंतरराष्ट्रीय नृत्य परिषद ने 29 अप्रैल को विश्व नृत्य दिवस घोषित किया । यह दिन महान बैले मास्टर जीन जॉर्जेस नोवरे की जयंती है , जिन्हें ‘ आधुनिक बैले का जनक ’ कहा जाता है । इस दिन का उद्देश्य है — नृत्य को सभी राजनीतिक , सांस्कृतिक और जातीय सीमाओं से ऊपर उठाकर एक सार्वभौमिक कला के रूप में सम्मान देना । नृत्य किसी भाषा का मोहताज नहीं । अफ्रीका का आदिवासी नृत्य हो या भारत का भरतनाट्यम , स्पेन का फ्लैमेंको हो या अमेरिका का हिप-हॉप — हर थिरकन में एक ही दिल धड़कता है । नृत्य हमें यही बताता है कि कला किसी भी धर्म , जाति , देश या व्यक्ति से कहीं आगे होती है , जिससे समृद्धि और एकता का वातावरण बनता है ।
*भारत : जहाँ हर कण में नृत्य बसता है ।*
हमारे देश में तो नृत्य साँस की तरह है । शिव का तांडव सृष्टि का प्रतीक है , तो कृष्ण की रासलीला प्रेम का उत्सव । कथक के घुंघरुओं में इतिहास बोलता है , तो ओड़िसी की भंगिमाओं में मूर्तियाँ जीवित हो उठती हैं । कथकली के रंगों में महाकाव्य साकार होते हैं , तो मणिपुरी में भक्ति घुल जाती है । लोकनृत्य की तो बात ही अलग — पंजाब का भांगड़ा हो , गुजरात का गरबा , असम का बिहू , राजस्थान का कालबेलिया या बिहार का कजरी हर राज्य अपनी मिट्टी की खुशबू नृत्य में समेटे हुए है ।
नृत्य हमारे त्योहारों का प्राण है । शादी हो या जन्म , फसल कटे या बारिश आए — हम नाचकर ही खुशी मनाते हैं । कोरोना महामारी काल में भी जब पूरी दुनिया थम गई थी , तो बड़े पैमाने पर लोगों ने उदासीनता से बाहर निकलने के लिये , अपनी सेहत और शौक के लिये घर पर रहते हुए नृत्य करने की शुरुआत की । क्योंकि दुख को भी हल्का करने का हुनर सिर्फ नृत्य के पास है ।
*नृत्य : शरीर , मन और आत्मा का संगम ।*
नृत्य करना एक तरह से मन और आत्मा को प्रसन्न करना है । नृत्य एक तरह का व्यायाम है , इसलिए नृत्य करने के शारीरिक लाभ अन्य कार्डियो एक्सरसाइज के समान है । विज्ञान भी मानता है कि नृत्य सबसे बेहतरीन थेरेपी है । नृत्य करने से ब्रेन में केमिकल डोपामाइन बढ़ने के कारण हमें भावनात्मक ऊँचाई मिलती है । संगीत पर नृत्य करना नकारात्मक भावनाओं को दूर करने का एक शानदार तरीका है । जब पैर थिरकते हैं तो तनाव हार्मोन कोर्टिसोल घटता है और खुशी का हार्मोन एंडोर्फिन बढ़ता है । डिप्रेशन , चिंता , अकेलापन — सब पर नृत्य भारी पड़ता है । बुजुर्गों के लिए यह जोड़ों की कसरत है , बच्चों के लिए एकाग्रता व अनुशासन का साधन और युवाओं के लिए खुद को अभिव्यक्त करने का सबसे सशक्त माध्यम । नृत्य भेदभाव मिटाता है । स्टेज या डांस - फ्लोर पर न कोई छोटा होता है , न बड़ा । वहाँ सिर्फ कला होती है और कलाकार ।
*आज के दौर में नृत्य की चुनौतियाँ ।*
रील्स और 15 सेकंड के वीडियो के युग में शास्त्रीय नृत्य की साधना कहीं पीछे छूट रही है । गुरु-शिष्य परंपरा कमजोर हो रही है । लोक कलाकारों को मंच नहीं मिल रहे । नृत्य को ‘ टाइमपास ’ समझने वाली सोच भी हावी है । जबकि सच यह है कि एक भरतनाट्यम नर्तक को अर्जुन की तरह वर्षों का तप करना पड़ता है , तब जाकर एक मुद्रा पूर्ण होती है । आजकल अश्लीलता को भी कला का नाम दिया जा रहा । फूहड़ - अश्लील गानों पर डांस करना कला नहीं है , यह हमारे भारतीय सभ्यता , संस्कृति या समाज का हिस्सा नहीं । बढ़ते आइटम - सांग या आइटम - डांस का क्रेज चिंताजनक है । जरूरत है कि हम स्कूलों में नृत्य को सिर्फ ‘ एक्स्ट्रा - करिकुलर ’ नहीं , ‘ कोर - करिकुलर ’ बनाएँ । शास्त्रीय नृत्य को बढ़ावा दे और रोजगार से जोड़ें । गाँव-गाँव के लोक नृत्य कलाकारों को मंच दें ।
*नृत्य को अपने जीवन का हिस्सा बनाए ।*
इस विश्व नृत्य दिवस पर अपने भीतर के उस बच्चे को जगाइए जो कभी बेझिझक नाचा करता था । ऑफिस की टेंशन , जमाने की शर्म , उम्र का बहाना — सब भूलकर दो मिनट आँख बंद करके थिरकिए । क्योंकि जैसा मार्था ग्राहम ने कहा था , “ नृत्य आत्मा की छिपी हुई भाषा है । ” आज शाम घर के किसी कोने में , छत पर , या समुद्र की लहरों के साथ ही सही — नाचिए । अपने लिए नाचिए । क्योंकि जब तक पैर थिरक रहे हैं , तब तक जीवन जिंदा है । नृत्य दिवस की शुभकामनाएँ । नाचते रहिए , जीवित रहिए , नाचिए , क्योंकि प्रकृति हर रोज नाचती है और रुकी तो जीवन रुक जाएगा ।
- मोहिनी प्रिया

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