गया:
गया में रामनवमी के पावन अवसर पर भारतीय राष्ट्रीय ब्राह्मण महासभा एवं कौटिल्य मंच द्वारा एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम की अध्यक्षता महासभा और मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. विवेकानंद मिश्रा ने की। अपने उद्घाटन संबोधन में डॉ. मिश्रा ने कहा कि "श्रीराम विश्व इतिहास में नैतिक मूल्यों के जीवित स्मृति कथा हैं।" उन्होंने राम के आदर्शों की अद्वितीयता और उनकी लोकप्रियता को ध्यान में रखते हुए कहा कि रामराज्य की जो विचारधारा आज भी प्रासंगिक है, वही आज के समाज के लिए मार्गदर्शन साबित हो सकती है।
संगोष्ठी का मुख्य उद्देश्य केवल रामनवमी का धार्मिक उत्सव मनाना नहीं था, बल्कि वैश्विक अशांति के बीच रामराज्य की अनिवार्यता पर गहन मंथन करना था। इस अवसर पर साहित्यकार आचार्य राधा मोहन मिश्रा माधव ने भगवान श्रीराम के धराधाम पर अवतरण को धर्म, सत्य और न्याय की शाश्वत ज्योति के रूप में प्रस्तुत किया।
इस संगोष्ठी में प्रोफेसर सुनील कुमार मिश्रा ने वर्तमान समाज की दुखद स्थिति पर टिप्पणी की, जिसमें स्वार्थ, लोलुपता और चारित्रिक पतन की गहरी छाप दिखाई दे रही है। डॉ. ज्ञानेश भारद्वाज ने कहा कि यह चारित्रिक पतन केवल व्यक्तिगत स्तर तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने विश्व को युद्ध और संघर्ष की ओर धकेल दिया है, जैसे ईरान और इज़राइल के बीच चल रहा युद्ध इसका उदाहरण है।
समाजसेवी किरण पाठक एवं रंजू देवी ने वैश्विक तनाव को केवल भू-राजनैतिक संघर्ष के रूप में न देख, इसे मानवता के नैतिक स्खलन और पाशविक प्रवृत्तियों का परिणाम बताया। दिव्यांशु ने कहा कि आज की दुनिया में रामराज्य जैसी न्यायपूर्ण व्यवस्था की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक महसूस हो रही है।
गजाधर लाल पाठक ने वर्तमान समाज की खोखली व्यवस्था पर कटाक्ष करते हुए कहा कि समाज जिस अंधी दौड़ में हांफ रहा है, वह अंततः उसे विनाश की ओर ले जाएगी। आचार्य अभय पाठक और सुनील पाठक ने भी राम के आदर्शों से विमुख होकर समाज में हो रहे स्वार्थ व अहंकार के बढ़ते प्रभाव को चिंता का विषय बताया।
संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए आचार्य सच्चिदानंद मिश्रा ने पाखंड और खोखले आचरण पर तीखी आलोचना की। उन्होंने कहा कि धर्म का आज केवल बाहरी प्रदर्शन हो रहा है, जबकि उसकी वास्तविकता से हम दूर हो गए हैं। डॉ. रविंद्र कुमार ने भी इस आत्मप्रवंचना को समाप्त करने की आवश्यकता पर जोर दिया, ताकि समाज धर्म और न्याय की दिशा में लौट सके।
प्रख्यात साहित्यकार प्रोफेसर मनोज कुमार मिश्रा ने कहा कि यह समय केवल उत्सव मनाने का नहीं है, बल्कि हमें अपनी सामूहिक चेतना को जागृत करना होगा और अपने आचरण में सुधार लाना होगा।
अंत में, आचार्य पंडित बालमुकुंद मिश्रा ने धन्यवाद ज्ञापित करते हुए कहा कि यदि समाज शीघ्र ही अपनी चेतना को जागृत नहीं करेगा और श्रीराम के आदर्शों को अपनाने में विफल रहेगा, तो यह निश्चित है कि संपूर्ण विश्व निरंतर संघर्ष और विनाश की ओर अग्रसर होगा।
संगोष्ठी में उपस्थित प्रमुख व्यक्तित्वों में अरुण ओझा, आचार्य अजय मिश्रा, हरि नारायण त्रिपाठी, डॉ. दिनेश कुमार सिंह, राजीव नयन पांडे, अमरनाथ मिश्रा, दीपक पाठक, मनोरमा देवी, अमरनाथ पांडे, कविता रावत, रंजना पांडेय, नीलम कुमारी, फूल कुमारी, ममता देवी, बबलू गोस्वामी, पार्वती देवी, विश्वजीत चक्रवर्ती, मनीष कुमार मिश्रा, कुमारी शीतल, प्रियांशु मिश्रा, बिना कुमारी, रंजीत पाठक, पवन मिश्रा, महेश मिश्रा, देवेंद्र पाठक और बकरौर प्रमुख रूप से उपस्थित थे।
संगोष्ठी के समापन पर सभी ने यह साझा विचार व्यक्त किया कि जब तक समाज राम के आदर्शों को अपने जीवन में नहीं उतारेगा, तब तक रामराज्य की कल्पना केवल पुस्तकों और स्वप्नों में ही सिमटी रहेगी।

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