Advertisment1

यह एक धर्मिक और राष्ट्रवादी पत्रिका है जो पाठको के आपसी सहयोग के द्वारा प्रकाशित किया जाता है अपना सहयोग हमारे इस खाते में जमा करने का कष्ट करें | आप का छोटा सहयोग भी हमारे लिए लाखों के बराबर होगा |

मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम का सांस्कृतिक महाप्रयाण

मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम का सांस्कृतिक महाप्रयाण 
 सत्येंद्र कुमार पाठक
 त्रेता की पावन बेला और मानवता का उदय भारतीय वांग्मय में काल के कपाल पर अंकित गाथाओं में त्रेतायुग का वह कालखंड स्वर्ण अक्षरों में नहीं, बल्कि जन-जन की आस्था के चंदन से लिखा गया है। जब-जब असुरता ने मानवता के मस्तक पर प्रहार किया, तब-तब नियति ने एक ऐसे सूर्य का सृजन किया जिसने अधर्म के अंधकार को समूल नष्ट कर दिया। वह पावन बेला थी—चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की नवमी। अयोध्या की पावन माटी और सरयू का कल-कल करता जल आज भी उस दिव्य क्षण की गवाही देता है, जब साक्षात् परब्रह्म ने एक 'मर्यादा पुरुष' के रूप में धरती पर पग धरे। श्री राम केवल एक राजा नहीं, बल्कि संपूर्ण भारतवर्ष के सांस्कृतिक भूगोल को जोड़ने वाले एक 'महासेतु' प्रतीत होते हैं।भगवान राम का प्राकट्य किसी साधारण तिथि को नहीं हुआ। वाल्मीकि रामायण के अनुसार, उस समय प्रकृति और अंतरिक्ष एक दुर्लभ उत्सव की तैयारी कर रहे थे। तिथि और नक्षत्र: चैत्र शुक्ल नवमी, पुनर्वसु नक्षत्र। 'पुनर्वसु' का अर्थ ही है—'पुनः प्रकाश का आगमन'। ग्रहों की स्थिति: उस समय पाँच ग्रह (सूर्य, मंगल, शनि, गुरु और शुक्र) अपनी उच्च राशि में स्थित थे। चंद्रमा और बृहस्पति कर्क राशि में एक साथ विराजमान थे। अभिजीत मुहूर्त: दोपहर का वह समय जब सूर्य अपनी पूर्ण आभा के साथ आकाश के मध्य में था। यह ज्योतिषीय संयोग इस बात का प्रतीक था कि आने वाला व्यक्तित्व न केवल तेजस्वी होगा, बल्कि उसमें गुरु (ज्ञान) और सूर्य (तेज) का अद्भुत समन्वय होगा। अयोध्या के राजभवन में जब कौशल्या के नंदन ने जन्म लिया, तो वह केवल एक कुल का दीपक नहीं, बल्कि संपूर्ण जगत का उद्धारक था। राम-कथा का बिहार से संबंध उनके जन्म के पूर्व ही जुड़ जाता है। महाराज दशरथ पुत्र-सुख से वंचित थे और सूर्यवंश का भविष्य धुंधला था। कुलगुरु वशिष्ठ ने तब अंग जनपद (वर्तमान मुंगेर-भागलपुर क्षेत्र) के महान तपस्वी ऋष्यश्रृंग (श्रृंगी) ऋषि को आमंत्रित करने का सुझाव दिया। लोमपाद के राज्य 'अंग' से आए इसी ऋषि ने सरयू के तट पर 'पुत्रकामेष्टि यज्ञ' संपन्न कराया। यह यज्ञ साक्ष्य है कि जब राजसत्ता (दशरथ) और ऋषि-शक्ति (श्रृंगी ऋषि) का मिलन होता है, तभी ईश्वरीय शक्तियों का अवतरण संभव होता है। इस प्रकार, प्रभु राम के जन्म का आध्यात्मिक आधार बिहार की ही 'अंग' भूमि के ऋषियों ने तैयार किया था।
बिहार की माटी और राम के शौर्य की दीक्षा में यदि अयोध्या राम की जन्मभूमि है, तो मगध और भोजपुर उनके 'पुरुषार्थ' की दीक्षाभूमि है। महर्षि विश्वामित्र जब राम और लक्ष्मण को लेकर सिद्धाश्रम (बक्सर) की ओर प्रस्थान करते हैं, तो वह यात्रा वास्तव में एक राजकुमार के 'जननायक' बनने की यात्रा थी। बक्सर का सिद्धाश्रम: गंगा के तट पर स्थित इस भूमि पर राम ने ताड़का का वध किया। यह केवल एक राक्षसी का वध नहीं था, बल्कि आतंक के विरुद्ध राम का प्रथम शंखनाद था। अहिल्या उद्धार: मगध और मिथिला की सीमा पर स्थित गौतम ऋषि के आश्रम में पाषाण बनी अहिल्या का उद्धार राम की करुणा का प्रतीक है। यह संदेश देता है कि राम केवल संहारक नहीं, बल्कि समाज के उपेक्षित और तिरस्कृत पक्षों के 'तारणहार' भी हैं। गया और पुनपुन: पितृ-भक्ति का महातीर्थ का राम-कथा में मगध का स्थान केवल युद्ध तक सीमित नहीं है। राम का 'आदर्श पुत्र' स्वरूप गया और पुनपुन की धरती पर चरितार्थ होता है।
पुनपुन (आदि गंगा): गया जाने के मार्ग में प्रभु ने सर्वप्रथम पुनपुन नदी के तट पर विश्राम किया। प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, उन्होंने यहाँ प्रथम पिंडदान (तर्पण) किया था। आज भी मगध की परंपरा में गया श्राद्ध से पूर्व पुनपुन में तर्पण करना अनिवार्य माना जाता है। मोक्षदायिनी फल्गु और गया: वनवास के दौरान राम, सीता और लक्ष्मण का गया आना पितृ-ऋण से मुक्ति का महान संदेश है। फल्गु नदी के बालू से माता सीता द्वारा महाराज दशरथ को दिया गया पिंड, जिसे स्वयं राजा दशरथ की आत्मा ने स्वीकार किया, यह प्रमाणित करता है कि श्रद्धा और भक्ति के सामने विधि-विधान भी गौण हो जाते हैं। गया की यह माटी आज भी राम की पितृ-भक्ति की सुगंध से महकती है।
मिथिला का 'पाहुन' और बज्जि का स्वागत - जब विश्वामित्र के साथ राम-लक्ष्मण गंगा पार कर वैशाली (बज्जि संघ) पहुँचे, तो वहाँ के राजा सुमति ने उनका भव्य स्वागत किया। यह बिहार की उस लोकतांत्रिक परंपरा का सम्मान था जो राम के चरित्र में भी झलकती है।।तत्पश्चात, मिथिला की पावन धरा पर शिव धनुष का भंजन कर उन्होंने जानकी का हाथ थामा। मिथिला में राम 'भगवान' नहीं, बल्कि 'पाहुन' (दामाद) हैं। यहाँ के लोकगीतों, सोहर और गारी में राम का जो सजीव चित्रण मिलता है, वह विश्व साहित्य में अनुपम है। विवाह के माध्यम से अयोध्या और मिथिला का जो संबंध जुड़ा, वह वास्तव में दो संस्कृतियों का महा-मिलन था। सोनभद्र तटीय क्षेत्रों में भी राम-कथा की प्रतिध्वनियाँ सुनाई देती हैं। सोन और पुनपुन के बीच का यह भू-भाग प्राचीन काल से ही ऋषियों की तपोभूमि रहा है। लोकश्रुतियों के अनुसार, विश्वामित्र के साथ यात्रा करते समय राम के चरण इस मिट्टी पर भी पड़े थे। एक शिक्षक के रूप में ४० वर्षों तक इस क्षेत्र के बच्चों को पढ़ाते हुए, मैंने सदैव यही प्रयास किया कि वे राम के 'मर्यादा' वाले स्वरूप को अपने आचरण में उतारें।
राम-राज्य: एक शाश्वत सामाजिक दर्शन में आज जब हम 'राम-राज्य' की बात करते हैं, तो वह केवल एक राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि एक सामाजिक न्याय का दर्शन है। समानता का भाव: राम ने निषादराज को गले लगाया, शबरी के जूठे बेर खाए और वानर-भालूओं को अपनी सेना का मुख्य हिस्सा बनाया। यह 'अंत्योदय' का सबसे बड़ा प्रमाण है।
मर्यादा: उन्होंने कभी अपनी शक्ति का दुरुपयोग नहीं किया। एक राजा के रूप में उन्होंने प्रजा के लिए अपने सुखों की बलि दी। संकट मोचन हनुमान की सेवा का आदर्श: प्रभु राम के चरित्र का विस्तार हनुमान जी के बिना संभव नहीं है। हनुमान जी बुद्धि, बल और चातुर्य के देवता होकर भी 'राम-काज' के लिए पूर्णतः समर्पित रहां हैं।
आज का समाज जब नैतिक मूल्यों के संकट से गुजर रहा है, तब राम का चरित्र एक दीपस्तंभ की भांति हमारा मार्गदर्शन करता है। राम नवमी का पर्व हमें यह याद दिलाता है कि अधर्म कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, सत्य और धर्म की विजय सुनिश्चित है। अपनी सांस्कृतिक विरासत को केवल पुस्तकों तक सीमित न रखें, बल्कि अपनी नदियों (पुनपुन, फल्गु, सोन) और ऐतिहासिक स्थलों (गया, बक्सर, मिथिला) का संरक्षण करें। राम की मर्यादा तभी सार्थक होगी जब हम उनके बताए समानता और न्याय के मार्ग पर चलेंगे।
"राम राष्ट्र की कीर्ति हैं, राम राष्ट्र के प्राण।
राम बिना यह देश है, केवल मिट्टी का ढे़र समान॥"
त्रेतायुग का वह सूर्य आज भी हमारे भीतर प्रकाशित है। आवश्यकता है तो बस उस 'मर्यादा' को अपने भीतर जागृत करने की। अयोध्या से मगध और मिथिला तक की यह यात्रा वास्तव में स्वयं से स्वयं के साक्षात्कार की यात्रा है।
प्रभु श्री राम का आशीर्वाद बिहार के हर आंगन और विश्व के हर हृदय पर बना रहे। हम अपनी माटी के गौरव को पहचानें और एक सशक्त, शिक्षित और मर्यादित समाज का निर्माण करें ।

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ