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घर का मुखिया

घर का मुखिया

जय प्रकाश कुवंर
कितना बड़ा पदवी है,
वह घर का मुखिया है।
उसका दिल कोई क्या जाने,
वह सुखिया है या दुखिया है।।
छाता बनकर अपने नीचे,
घर के सबको छुपाता है।
हिम, ताप, वरसात सब‌,
खुद सहे जाता है।।
दीपक बन प्रकाश देता,
खुद जले जाता है।
मोमबत्ती जैसा जलते जलते,
खुद गला जाता है।।
अंदर अंदर रोता है,
बाहर से हंसता है।
परिवार सुखी रहे इसलिए,
अपने तन को कसता है।।
कोई उसका हाल तक नहीं पुछता,
घर वालों की ऐसी कदरदानी है।
कमोवेश हर घर में,
घर के मुखिया की यही कहानी है।। 
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