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मन मानत नइखे

मन मानत नइखे

जय प्रकाश कुवंर
चाहत बानी अब अपना मन के समुझा के रहीं।
भला बुरा सब अपना दिल में दबा के रहीं।।
कतनो समझावला पर इ दिल मानत नइखे।
बात बिगड़त देख आपन मन मानत नइखे।।
पहिले लोग बुढ़वन के इज्जत करत रहे।
घर भर के लोग उहे करे बुढ़वन जे कहे।।
अब घर के बुढ़ा बुढ़ी एके जगह खोजात बा।
ओह मौका पर जब घर के इज्जत पिटात बा।।
अपना बुजुर्ग लोग के हमनीं खुब इज्जत कइनी।
घर का खुशहाली खातिर बहुत कुछ हजम क‌इनी।।
अब केकरा से कटल रहब, केकरा से इरखा करब।
अइसहीं सब चलत रही, जब ले अब जियत रहब।।
पुराना दिन याद क‌इला में, कौनो ना लाभ बा।
घर के सब कुछ बदले खातिर, नया पीढ़ी बेताब बा।।
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