सिलेंडर मैया
संजय जैन "बीना" मुंबईहे सिलेंडर मैया वर्षो से तुम हो।
भोजनशाला के कर्ता और धर्ता।
जिससे जलता रहता रसोईघर चूल्हा।
तुम बिन मुश्किल है चूल्हा जलना।।
कल तक कद्र न कर रहे थे।
जिस लाल सिलेंडर की हम।
वो ही बना है आज जरूरत।
खाना-पीना चौपट कर दिया।
इस लाल सिलेंडर ने अब।।
हा हा कार मचा दिया है।
देश में इस सिलेंडर ने।
रोने को मजबूर हुए है।
बूढ़े बच्चे और जवान।
भोजनशालाएं बंद हुई मन्दिरो की।
फिर भी हँस रहा ये बेशर्म।।
आधुनिक घरों में सब कुछ है।
पर सिलेंडर बिना सब शून्य।
पहले और अब में देखो लोगों।
अंतर कितना है ईधन को लेकर।
सब कुछ आधुनिक हो गया है।
पर पुराना वाला आज भी हिट है।
जो बिना सिलेंडर के जल रहा है।।
आज कल की बहू बेटियां।
सब की सब परेशान है।
बिना सिलेंडर के देखो इनको
कितनी आसाह और बेबस है।
होटल आदि भी बंद हो रहे।
जिससे खाने के पड़े रहे बांदे।
हे सिलेंडर मैया आ जाओ घर में।।
जय जिनेंद्र
संजय जैन "बीना" मुंबई
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