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"असंतोष का आलोक"

"असंतोष का आलोक"

पंकज शर्मा 
संतोष—
क्या वह अंतिम ठहराव है,
या चेतना की परिधि पर जड़ता का
एक मृदुल, किंतु घातक आवरण?
जहाँ प्रश्न नहीं जन्मते,
और उत्तर—
अप्रासंगिक होकर भी पर्याप्त प्रतीत होते हैं।


एक तुष्ट देह की निस्तब्धता में
मन का कोई इतिहास नहीं होता;
वहाँ अनुभूति
केवल उपभोग का पर्याय बन जाती है,
और अस्तित्व—
स्वतः अपने औचित्य से विमुख हो जाता है।


किन्तु मनुष्य—
वह अपने ही असंतोष का शिल्पी है,
जो अपूर्णता को
अभिशाप नहीं,
अपितु संभावना का उद्गम मानता है;
उसकी प्यास ही
उसकी पहचान का प्रथम सूत्र है।


तृप्ति,
यदि विवेक को विस्मृत कर दे,
तो वह एक परिष्कृत जड़ता भर है;
और असंतोष—
यदि प्रश्नों से अनुप्राणित हो,
तो वही चेतना का उत्कर्ष है,
वही आत्मा का स्वाभाविक स्पंदन।


एक ओर
संतोष का सहज अंधकार है—
जहाँ सीमाएँ ही परिधि बन जाती हैं;
दूसरी ओर
अतृप्ति का वह उजास,
जो प्रत्येक सीमा को
संभावना में रूपांतरित करता है।


जो तुष्ट हैं—
वे अपने ही क्षुद्र वृत्त में पूर्ण हैं,
उन्हें विस्तार का भय है;
वे नहीं जानते
कि अपूर्णता का बोध ही
अनंत की दिशा में प्रथम संकेत है।


और जो अतृप्त हैं—
वे निरंतर प्रश्नों के साथ जीते हैं,
उनकी यात्रा का कोई निश्चित पड़ाव नहीं;
परंतु उसी अनिश्चितता में
एक सूक्ष्म, दीप्त सत्य है—
जो उन्हें स्वयं से परे ले जाता है।


अंततः—
मानव होने का अर्थ ही यही है
कि हम अपने भीतर
उस असंतोष को जीवित रखें,
जो हमें जड़ता से बचाए,
और अपूर्णता में ही
पूर्णता का आभास कराए।


. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️ "कमल की कलम से"✍️ (शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
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