राजद सांसद संजय यादव ने संसद में स्वास्थ्य बीमा कंपनियों द्वारा क्लेम के समय की जा रही धाँधली और मनमानी कटौतियों की समस्या का महत्त्वपूर्ण मुद्दा उठाया।

संजय यादव ने कहा कि भारत में स्वास्थ्य बीमा कंपनिया का वार्षिक प्रीमियम संग्रह लगभग 3 लाख 20 हजार करोड़ रुपये से अधिक का है लेकिन वास्तविकता यह है कि जब अस्पताल का बिल आता है और बीमा क्लेम किया जाता है, तो बीमा कंपनियाँ विभिन्न तकनीकी नियमों और प्रावधानों का हवाला देकर कुल बिल का एक बड़ा हिस्सा काट देती हैं। इससे मरीज और उसके परिवार पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ता है।स्वास्थ्य बीमा का उद्देश्य नागरिकों को बीमारी के समय आर्थिक सुरक्षा देना है, न कि नियमों की जटिलता में उन्हें उलझाना।
यदि पॉलिसी में कमरे की सीमा निर्धारित होती है और मरीज उससे अधिक किराए वाले कमरे में भर्ती होता है, तो केवल कमरे का अंतर ही नहीं बल्कि पूरे अस्पताल बिल पर अनुपातिक कटौती (Proportionate Deduction) कर दी जाती है।
अस्पताल बिल में शामिल कई आवश्यक चिकित्सा वस्तुओं जैसे ग्लव्स, डिस्पोजेबल आइटम, सैनिटाइज़र इंजेक्शन आदि को “नॉन-पेयेबल” बताकर क्लेम से हटा दिया जाता है।
TPA या पैकेज रेट के आधार पर कटौती कई मामलों में बीमा कंपनियाँ या थर्ड पार्टी एडमिनिस्ट्रेटर अस्पताल से पैकेज रेट तय कर देते हैं, जिसके कारण वास्तविक बिल का पूरा भुगतान नहीं किया जाता।
संजय यादव ने सुझाव के साथ सरकार से मांग करते हुए कहा कि:-
1. स्वास्थ्य बीमा पॉलिसियों में अनुपातिक कटौती (Proportionate Deduction) को समाप्त किया जाए।
2. अस्पताल बिल में शामिल आवश्यक चिकित्सा वस्तुओं को नॉन-पेयेबल सूची से हटाया जाए।
3. सभी पॉलिसियों के नियम सरल हिंदी और अंग्रेजी में अनिवार्य रूप से प्रकाशित किए जाएँ। पॉलिसी दस्तावेज़ के 30–50 पेज में लिखी पॉलिसी की शर्तें आम लोगों के लिए समझना कठिन होती हैं।
4. अस्पताल से डिस्चार्ज के समय डिजिटल और पारदर्शी क्लेम ब्रेकअप अनिवार्य किया जाए।
5. बीमा कंपनियों को निर्देश दिया जाए कि उपभोक्ता हित में सुधार बिना प्रीमियम वृद्धि के लागू किए जाएँ।
6. अस्पताल बिलिंग का कोई राष्ट्रीय मानक नहीं है इसलिए एक ही बीमारी के इलाज का खर्च एक ही शहर या अलग शहरों में अलग अस्पतालों में कई गुना अलग-अलग हो सकता है।
7. कैशलेस क्लेम के बावजूद, अस्पताल में “कैशलेस” सुविधा होने के बावजूद डिस्चार्ज के समय मरीज को 10%–40% तक बिल खुद देना पड़ता है।
8. अस्पताल और बीमा कंपनी के बीच पैकेज विवाद होता है जिसमें मरीज पिसता है क्योंकि कई बार अस्पताल का बिल अलग होता है और बीमा कंपनी की मंजूर दर अलग होती है और इस अंतर का भुगतान मरीज को करना पड़ता है।
9. क्लेम सेटलमेंट का मतलब पूरा भुगतान नहीं होता है। कई बीमा कंपनियाँ क्लेम सेटल्ड दिखाती हैं, लेकिन पूरा बिल नहीं देतीं, केवल आंशिक भुगतान करती हैं इससे क्लेम सेटलमेंट रेशियो वास्तविक राहत को नहीं दर्शाता।
10. भारत में चिकित्सा संबंधित महंगाई लगभग 12–14% प्रतिवर्ष है, जबकि सामान्य महंगाई लगभग 5–6% रहती है। क्लेम रिजेक्शन के कारण उपभोक्ताओं को सारा खर्च वहन करना पड़ता है।
स्वास्थ्य बीमा का मूल उद्देश्य नागरिकों को बीमारी के समय आर्थिक सुरक्षा प्रदान करना है। यदि क्लेम के समय तकनीकी आधारों पर बड़े पैमाने पर कटौती होती है, तो इस उद्देश्य की पूर्ति नहीं हो पाती।
माननीय सांसद संजय यादव ने सरकार से अनुरोध किया कि इस विषय पर गंभीरता से विचार करते हुए उपभोक्ताओं को संरक्षित करने के लिए आवश्यक नीतिगत कदम उठाए जाएँ।
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