“भाई से बड़ा न शत्रु कोई”
✍️ डॉ. रवि शंकर मिश्र "राकेश"
भाई से बड़ा न शत्रु कोई, ये जग का दस्तूर हुआ,
अपने ही घर में देखो कोहराम कैसा भरपूर हुआ।
खून का रिश्ता कहने भर का, भीतर अग्नि दहकती है,
हँसते चेहरों के पीछे भी, कितना गहरा सूर हुआ।
जायदाद के टुकड़ों ने ही, बाँट दिए दिल के आँगन,
राम-नाम के घर-घर में भी, अब कलह मशहूर हुआ।
माँ की ममता, बाप का साया - सबका बँटवारा देखो,
छोटे-छोटे स्वार्थों में ही, रिश्तों का दस्तूर हुआ।
पीठ पीछे वार करे जो, वही सहोदर कहलाता,
कैसा ये विश्वास टूटा, कैसा ये भरपूर हुआ।
संग पले, संग खेले-खाए, फिर भी बैर निभाते हैं,
कैसा ये कलियुग आया है, अपना ही मजबूर हुआ।
'राकेश' ये दुनिया देखो, कैसी चाल चलन वाली,
भाई ही जब शत्रु बने तो, किस पर फिर गुरूर हुआ।
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