Advertisment1

यह एक धर्मिक और राष्ट्रवादी पत्रिका है जो पाठको के आपसी सहयोग के द्वारा प्रकाशित किया जाता है अपना सहयोग हमारे इस खाते में जमा करने का कष्ट करें | आप का छोटा सहयोग भी हमारे लिए लाखों के बराबर होगा |

आदित्य' पुत्रों का साम्राज्य और सौर धर्म का पुनरुत्थान

आदित्य' पुत्रों का साम्राज्य और सौर धर्म का पुनरुत्थान

सत्येन्द्र कुमार पाठक
सृष्टि के आरंभ से ही प्रकाश और अंधकार के बीच संघर्ष चला आ रहा है। पौराणिक आख्यान बताते हैं कि जब दैत्यों के अत्याचार से देवगण पराजित होकर वनों में भटकने लगे, तब ब्रह्मांड का अस्तित्व संकट में पड़ गया था। उस समय देवर्षि नारद ने महर्षि कश्यप और माता अदिति को वह मार्ग दिखाया, जिसने संसार को 'आदित्य' (सूर्य) जैसा तेजस्वी रक्षक दिया। मगध की धरती, जिसे ऋग्वेद में 'कीकट' कहा गया, इसी सौर ऊर्जा का मुख्य केंद्र बनी। यह आलेख अदिति के पुत्रों के भूलोक पर साम्राज्य, मगध में जरासंध के काल और शाकद्वीपीय ब्राह्मणों द्वारा स्थापित 'सौर धर्म' के गौरवशाली इतिहास की यात्रा है ।
'आदित्य' का प्राकट्य और दैत्यों का संहार - जब देवताओं की व्यथा लेकर नारद मुनि कश्यप ऋषि के आश्रम पहुँचे, तो उन्होंने स्पष्ट किया कि इस संकट का समाधान केवल सूर्य जैसा प्रचंड तेज ही कर सकता है। लेकिन सूर्य अपनी महाविराट अग्निपिंड अवस्था में सेनापतित्व नहीं कर सकते थे, इसलिए उन्हें मानवीय स्वरूप में जन्म लेना आवश्यक था। माता अदिति का तप और 'आदित्य' का जन्म: - महर्षि कश्यप की पत्नी अदिति ने इस ईश्वरीय कार्य के लिए स्वयं को समर्पित किया। उन्होंने निराहार रहकर कठोर तप किया और भगवान सूर्य को पुत्र रूप में आने के लिए मनाया। अदिति के गर्भ से जन्म लेने के कारण ही सूर्य देव का नाम 'आदित्य' पड़ा। जन्म के समय से ही उनका दिव्य तेज इतना प्रबल था कि देवता भी अचंभित रह गए। उन्हें देवों का सेनापति नियुक्त किया गया। आदित्य के तेज के समक्ष दैत्य टिक नहीं सके और वे पाताल लोक में छिप गए। इस प्रकार, अदिति के पुत्र ने सृष्टि को भयमुक्त कर ब्रह्मांड के केंद्र में अपना स्थान ग्रहण किया। भूलोक पर आदित्य पुत्रों का साम्राज्य विस्तार अदिति के बारह पुत्र (द्वादश आदित्य) केवल सौर मंडल के स्वामी नहीं थे, बल्कि उन्होंने भूलोक के विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों पर अपना प्रभाव स्थापित किया। इंद्र का साम्राज्य: स्वर्ग और उत्तर-पूर्वी आर्यावर्त के अधिपति। वरुण का साम्राज्य: पश्चिम के समुद्री क्षेत्रों और जल निकायों पर नियंत्रण। विवस्वान (सूर्य) का साम्राज्य: इनका सबसे प्रत्यक्ष प्रभाव भारतवर्ष पर रहा। विवस्वान के पुत्र वैवस्वत मनु ने ही आधुनिक सभ्यता की नींव रखी। मिथिला और बज्जि: मनु के पुत्र 'निमि' ने मिथिला के जनक वंश की स्थापना की। अंग प्रदेश: द्वापर युग में सूर्य पुत्र कर्ण ने इस क्षेत्र पर शासन किया, जिससे मुंगेर और भागलपुर का क्षेत्र सूर्य उपासना का गढ़ बना। भोजपुर और अयोध्या: विवस्वान के वंशज रघुवंशी राजाओं (श्री राम) ने इस क्षेत्र को राक्षसी शक्तियों से मुक्त कराया।
: कीकट (मगध) और सम्राट जरासंध का सौर वैभव
प्राचीन मगध, जिसे कीकट साम्राज्य कहा जाता था, सौर धर्म के प्रयोग और विस्तार की सबसे उपजाऊ भूमि रही है। यहाँ सूर्योपासना केवल एक पूजा नहीं, बल्कि राजकीय शक्ति का प्रतीक थी। जरासंध और सौर ऊर्जा: मगध सम्राट जरासंध, जो स्वयं शिव का उपासक था, उसने राजगीर (गिरिव्रज) को अपनी राजधानी बनाया। राजगीर के सप्तकर्णी गुफाओं और सूर्य कुंड का स्थापत्य बताता है कि जरासंध के काल में 'सौर चिकित्सा' (Heliotherapy) और युद्ध कौशल का गहरा संबंध था। योद्धाओं का तेज: मगध सम्राट जरासंध के अखाड़े के पहलवान सूर्य कुंड के गर्म गंधक युक्त जल में स्नान कर सूर्य को अर्घ्य देते थे, जिससे उन्हें 'वज्र' के समान शक्ति प्राप्त होती थी। राजगीर की सूर्य प्रतिमाएं: यहाँ प्राप्त प्रतिमाओं में सूर्य को ऊंचे जूते और कवच पहने दिखाया गया है, जो उन्हें एक 'योद्धा राजा' के रूप में प्रतिष्ठित करता : सौर धर्म के संस्थापक और शाकद्वीपीय 'मग' ब्राह्मण सौर धर्म को एक व्यवस्थित संप्रदाय के रूप में स्थापित करने का श्रेय भगवान कृष्ण के पुत्र साम्ब और शाकद्वीपीय ब्राह्मणों को जाता है। साम्ब को कुष्ठ रोग से मुक्ति के लिए सूर्योपासना की सलाह दी गई थी। जब वे स्वस्थ हुए, तो उन्होंने मंदिर बनवाए, लेकिन उनके अनुष्ठान के लिए उन्हें विशेष पुजारियों की आवश्यकता थी। वे शाकद्वीप (ईरान/मध्य एशिया) से 18 मग परिवारों को लेकर आए। मगध का नामकरण: 'मग' ब्राह्मणों के निवास के कारण ही इस क्षेत्र का नाम 'मगध' (मग + धर) पड़ा। इन ब्राह्मणों ने ही सूर्य की साकार (मूर्ति) पूजा को प्रचलित किया। विशिष्ट पहचान: शाकद्वीपीय ब्राह्मणों ने सूर्य की मूर्तियों में 'अव्यांग' (कमरबंद) और 'उदीच्य वेश' (लंबे जूते) को अनिवार्य किया, जो आज भी मगध के प्राचीन मंदिरों में देखा जा सकता है मगध के 'द्वादश अर्क' (12 सूर्य केंद्र) में मगध के कीकट प्रदेश में शाकद्वीपीय ब्राह्मणों ने भौगोलिक और ज्योतिषीय गणना के आधार पर 12 प्रमुख सूर्य केंद्रों की स्थापना की, जिन्हें 'अर्क' कहा जाता है। देव (औरंगाबाद): पश्चिमाभिमुख सूर्य मंदिर, जो वास्तुकला का बेजोड़ नमूना है। देवकुण्ड (अरवल सीमा): महर्षि च्यवन की तपोभूमि, जहाँ सूर्य ने उन्हें पुनः यौवन प्रदान किया। उलार्क (पालीगंज): साम्ब द्वारा स्थापित, जहाँ आज भी पालकालीन प्रतिमाएं मौजूद हैं। दक्षिणार्वार्क (गया): पितृपक्ष में सूर्य पूजा का विशेष केंद्र। , पुण्यार्क गंगा और (पुनपुन): जहाँ अर्घ्य देकर ही गया की यात्रा पूर्ण मानी जाती है। ये सभी केंद्र मगध की उस 'सौर श्रृंखला' का हिस्सा हैं जो उत्तर से दक्षिण तक फैली हुई है। सूर्य के रथ और घोड़ों का वैज्ञानिक व आध्यात्मिक दर्शन में भगवान सूर्य का रथ समय के चक्र का प्रतीक है। सात घोड़े: ये सप्ताह के सात दिनों और प्रकाश के सात रंगों (VIBGYOR) के प्रतीक हैं। इनके नाम (गायत्री, त्रिष्टुप आदि) वेदों के सात छंदों को दर्शाते हैं। एक पहिया: यह 'संवत्सर' (वर्ष) का प्रतीक है, जिसमें 12 आरे (महीने) और 6 नाभियाँ (ऋतुएँ) होती हैं। सारथी अरुण: अरुण का अर्थ है 'लालिमा'। वे अनुशासन के प्रतीक हैं, जो सूर्य के प्रचंड तेज को पृथ्वी के लिए सहनीय बनाते हैं।
छठ महापर्व— बिहार की जीवंत विरासत अदिति के पुत्रों और छठी मैया (देवसेना) की पूजा का सबसे भव्य स्वरूप बिहार का 'छठ महापर्व' है। यह पर्व 'सौर धर्म' का व्यावहारिक रूप है। अस्ताचलगामी सूर्य की पूजा दुनिया का एकमात्र पर्व है जो ढलते सूरज को नमन करता है, यह संदेश देते हुए कि अंत ही नए आरंभ की जननी है। : कार्तिक मास में सूर्य की किरणों के विशिष्ट स्पेक्ट्रम का लाभ उठाना और नदी के जल में खड़े होकर ऊर्जा ग्रहण करना एक उच्च स्तरीय सौर चिकित्सा है। बिहार , झारखंड उड़ीसा की धरती पर बिखरी ये सूर्य प्रतिमाएं और विस्मृत हो रहे 'अर्क' तीर्थ केवल पत्थर की इमारतें नहीं हैं, बल्कि ये सम्राट जरासंध के वैभव, शाकद्वीपीय ब्राह्मणों के ज्ञान और माता अदिति के पुत्रों के विजय की गाथाएं हैं। जहाँ जहानाबाद की बराबर पहाड़ियाँ और राजगीर की गुफाएं आज भी सूर्य की पहली किरण का स्वागत उसी भव्यता से करती हैं, जैसे हजारों साल पहले करती थी ।संदर्भ: वाल्मीकि रामायण (आदित्य हृदय स्तोत्र) , साम्ब पुराण एवं भविष्य पुराण , वराह पुराण (मगध के सूर्य तीर्थ) , मार्कण्डेय पुराण (अदिति कथा) , सूर्यपुराण ।
हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews #Divya Rashmi News, #दिव्य रश्मि न्यूज़ , https://www.facebook.com/divyarashmimag

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ