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"जिजीविषा का आलोक"

"जिजीविषा का आलोक"

पंकज शर्मा
निश्चल तर्क खड़ा था जैसे
शिलाश्रय कोई निर्जन में,
नियमों के दृढ़ वलय रचाए
अविचल अपने बंधन में।


किंतु अचानक कहीं अंतः में
जीवन का स्वर जाग उठा,
सूखे तट पर जैसे सहसा
सरिता का उत्साह फूटा।


बुद्धि कहे—सब पथ अवरुद्ध हैं,
संध्या ने घेरे आकाश;
मन कहता—अभी शेष है
प्रभातों का मधुमय विश्वास।


कितनी ही बार निराशा ने
दीपक को बुझना चाहा,
पर जिजीविषा की वायु ने
फिर उसका ज्योति-पथ साधा।


विपदाओं की घनी घटाओं में
मानव का साहस मुस्काया,
तर्कों के कठोर शिलालेखों पर
उसने नव गीत लिखाया।


जीवन केवल गणना कब है,
यह तो उर का स्पंदन है;
असंभव के शुष्क प्रांत में भी
संभावनाओं का चंदन है।


इसलिए मनुज चलता जाता
सीमाओं से टकराकर,
अंधकार के गर्भ से जैसे
उषा निकलती लजाकर।


अंततः वही विजयी होता
जो जीवन का मान करे,
तर्कों से परे उठकर भी
जीवन का अभिनंदन करे।


. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️ "कमल की कलम से"✍️ (शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
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