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सामाजिक समरसता है भगवान आदर्श श्रीराम

सामाजिक समरसता है भगवान आदर्श श्रीराम

सत्येंद्र कुमार पाठक
विषय: भारतीय संस्कृति और सामाजिक दर्शन में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के जीवन को केवल एक पौराणिक गाथा के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता और 'इन्क्लूसिव गवर्नेंस' (समावेशी सुशासन) के एक कालजयी मॉडल के रूप में प्रस्तुत करता है। इसमें विश्लेषण किया गया है कि कैसे राम ने 'स्व' का परित्याग कर 'सर्व' के कल्याण हेतु एक ऐसे समाज की नींव रखी, जहाँ जाति, वर्ण और वर्ग के भेद को प्रेम और नैतिकता से प्रतिस्थापित किया गया। यह आलेख रामराज्य की आधुनिक प्रासंगिकता और उनके वैश्विक सांस्कृतिक प्रभाव की भी पड़ताल करता है।
श्री राम - एक सांस्कृतिक और नैतिक चेतना के लिए भारतीय वांग्मय में 'राम' केवल एक नाम नहीं, अपितु एक संपूर्ण जीवन-दर्शन हैं। वाल्मीकि के 'आदि काव्य' से लेकर तुलसी के 'मानस' तक, श्रीराम का चरित्र एक ऐसे 'मर्यादा पुरुष' के रूप में उभरा है जो हर परिस्थिति में नैतिक श्रेष्ठता को सर्वोपरि रखता है। शोध की दृष्टि से, राम का चरित्र 'व्यक्ति से समष्टि' की यात्रा है। उन्होंने सिद्ध किया कि नेतृत्व की शक्ति तलवार में नहीं, बल्कि चरित्र की शुचिता और सामाजिक समावेशिता में निहित है। श्रीराम के जीवन की सबसे बड़ी विशेषता उनका 'जोड़ने वाला व्यक्तित्व' है। जिस कालखंड में समाज वर्णगत और क्षेत्रीय सीमाओं में बँधा था, वहां राम ने इन सीमाओं को तोड़कर एक 'सांस्कृतिक एकता' का सूत्रपात किया। निषादराज और केवट: मैत्री का नया दर्शन में राजपुत्र राम जब वन को जाते हैं, तो उनका पहला बड़ा मिलन निषादराज गुह से होता है। वह समाज के उस वर्ग से थे जिन्हें तत्कालीन व्यवस्था में मुख्यधारा से दूर माना जाता था। राम ने उन्हें 'भ्राता' कहकर गले लगाया। यह प्रसंग केवल शिष्टाचार नहीं, बल्कि 'सामाजिक लोकतंत्र' की पहली घोषणा थी। केवट के साथ उनका संवाद यह स्पष्ट करता है कि ईश्वर और सत्ता, दोनों को केवल 'प्रेम और समर्पण' से जीता जा सकता है, कुल या वैभव से नहीं।
माता शबरी: भक्ति और समानता का शिखर माता शबरी का प्रसंग पितृसत्तात्मक और जाति-केंद्रित समाज के लिए एक महान सबक है। एक वनवासी महिला, जिसे समाज उपेक्षित मानता था, उसके 'जूठे बेर' ग्रहण करना इस बात का प्रमाण है कि राम के लिए 'पवित्रता' हृदय की थी, बाह्य क्रियाओं की नहीं। यहाँ राम 'अंत्योदय' (समाज के अंतिम व्यक्ति का उदय) के प्रथम प्रणेता के रूप में उभरते हैं। 'रामराज्य' शब्द आज भी राजनीति विज्ञान में 'आदर्श शासन' का पर्याय बना हुआ है। महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान रामराज्य को ही भारत के भविष्य का स्वप्न बताया गया है। आधुनिक लोकतंत्र में 'वोट' का महत्व है, परंतु रामराज्य में 'लोक-रंजन' (प्रजा की ख़ुशी) का महत्व था। राम का शासन 'संविधान सम्मत' था, जहाँ राजा स्वयं को कानून से ऊपर नहीं मानता था। एक सामान्य नागरिक की शंका पर अपनी सबसे प्रिय वस्तु का त्याग करना यह दर्शाता है कि शासक का उत्तरदायित्व कितना गहरा होना चाहिए। आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा में रामराज्य की परिकल्पना में किसी भी प्रकार के अभाव का स्थान नहीं थासंसाधनों का सशक्तिकरण हेतु राम ने रावण जैसी महान शक्ति से लड़ने के लिए अयोध्या से सेना नहीं मंगवाई। उन्होंने वन के वनवासियों, वानरों और भालुओं को प्रशिक्षित किया। यह आधुनिक प्रबंध' मॉडल है। उन्होंने यह संदेश दिया कि कोई भी व्यक्ति छोटा या अक्षम नहीं होता, बस उसे सही नेतृत्व की आवश्यकता होती है।।प्रकृति और पर्यावरण के लिए राम का जीवन वनों, नदियों और पर्वतों के बीच बीता। चित्रकूट से लेकर पंचवटी तक, उन्होंने प्रकृति का संरक्षण किया। रामराज्य में प्रकृति कुपित नहीं होती थी क्योंकि मनुष्य ने अपनी सीमाओं (मर्यादाओं) का उल्लंघन नहीं किया था। आज के पर्यावरण संकट के दौर में राम का 'प्रकृति-प्रेम' एक अनिवार्य शिक्षा है। वैश्विक राम—सीमाओं के पार प्रभाव में राम केवल भारत के नहीं हैं; वे एक 'वैश्विक विचार' हैं। दक्षिण-पूर्व एशिया की संस्कृतियों में राम का प्रभाव मानवीय एकता का सबसे बड़ा प्रमाण है। थाईलैंड: यहाँ राम को 'रामकियान' के रूप में पूजा जाता है। अयुथ्या (अयोध्या) यहाँ की प्राचीन राजधानी रही है, जो राम के प्रभाव का भौगोलिक साक्ष्य है।इंडोनेशिया: मुस्लिम बहुल होने के बावजूद, यहाँ रामायण जीवन का अटूट हिस्सा है। यह सिद्ध करता है कि राम 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' के ऐसे सूत्र हैं जो धर्म की दीवारों को गिरा देते हैं।।कंबोडिया और लाओस: अंगकोर वाट की नक्काशी और वहां के लोकगीतों में राम एक ऐसे 'नैतिक नायक' हैं जो बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक हैं। आधुनिक चुनौतियाँ और राम का मार्ग आज का विश्व धार्मिक कट्टरता, जातिवाद और भ्रष्टाचार से जूझ रहा है।।भ्रष्टाचार मुक्त शासन में श्री राम का त्याग यह सिखाता है कि पद 'भोग' के लिए नहीं, 'सेवा' के लिए है। स्त्री गरिमा में अहिल्या का उद्धार और सीता के प्रति सम्मान (युद्ध के कठिन समय में भी) स्त्री की अस्मिता की रक्षा का संदेश देता है। लंकाधिपति राक्षस राज: रावण के वध के बाद उसे सम्मान देना और विभीषण को राज्य सौंपना यह दर्शाता है कि राम 'विस्तारवादी'नहीं, बल्कि 'न्यायवादी' थे।
मर्यादा की शाश्वत प्रासंगिकता में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का जीवन एक ऐसा प्रकाश स्तंभ है जो सदियों से भटकती मानवता को राह दिखा रहा है। सामाजिक समरसता उनके लिए कोई राजनीतिक नारा नहीं था, बल्कि उनका स्वाभाविक आचरण था। उन्होंने केवट को गले लगाकर और शबरी के बेर खाकर जो सामाजिक क्रांति की, वह आज के आधुनिक समाज के लिए भी एक चुनौती और प्रेरणा है। रामराज्य केवल इतिहास का एक पन्ना नहीं है, बल्कि वह भविष्य का एक 'ब्लूप्रिंट' है। यदि हम एक ऐसा विश्व चाहते हैं जहाँ घृणा का स्थान प्रेम ले, और भेदभाव का स्थान समरसता, तो हमें पुनः राम के 'मर्यादा' पथ पर लौटना होगा।
संदर्भ ग्रंथ - वाल्मीकि रामायण - मूल पाठ। रामचरितमानस - गोस्वामी तुलसीदास। , राम, कृष्ण और शिव - डॉ. राम मनोहर लोहिया। The Ramayana in Greater India - V. Raghavan. , भारत: गांधी के सपनों का रामराज्य - महात्मा गांधी के भाषणों का संकलन।
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