कपट के लपट में
अरुण दिव्यांशकपट लपट झपट लिहलs तू ,
रपट चपट काहे जड़त बाड़s ।
निकट विकट लउकत नईखे ,
दोसरा के देखके मरत बाड़s ।।
चटक पटक चटपट हो गईल ,
लटक लटक गटक गईलs तू ।
टप टप टप टप टपक टपक ,
काहे गहिरे में अटक गईल तू ।।
मटक मटक तू मटकत बाड़s ,
गरम पथल सा चटकत बाड़s ।
चोर के दाढ़ी में होखे तिनका ,
शब्द शब्द पर अटकत बाड़s ।।
पटक पटक गोर पटकत बाड़s ,
खटक खटक तू खटकत बाड़s ।
साॅंचे अईसन तू फटकत बाड़s ,
बीचे में तबहूॅं तू भटकत बाड़s ।।
चिड़ईं अईसन करे चीं चीं चूॅं चूॅं ,
उल्टे काहे तू करत बाड़s तू तू ।
जवन जान जाए बारे में तोहरा ,
चेहरे पर सामने करेला थू थू ।।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
डुमरी अड्डा
छपरा ( सारण )बिहार ।
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