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“जीवन चक्र का चित्रण”

“जीवन चक्र का चित्रण”

     ✍️ डॉ. रवि शंकर मिश्र "राकेश"
बचपन हर ग़म से बेगाना होता है,  
चिंता का उसमें ना ठिकाना होता है।  
बालपन बड़ा सुहाता,हर दिल को भाता, 
खुशियों का तराना होता है।
*बचपन हर ग़म से बेगाना होता है॥*

आती है जब जीवन में जवानी,  
बन जाती है एक नई कहानी।  
पढ़ने-लिखने में होती परेशानी,
रुक जाती है सारी मनमानी।  
माँ-बाप का स्नेह भी कम होता,
बदमाशी पर डांट भी लगता।
गलती पर उठक-बैठक होता,
व्यर्थ सभी पर यूं ही झुंझलाना होता है।
*पर बचपन हर ग़म से बेगाना होता है॥*

फिर एक दिन हो जाती शादी,  
सलोनी लगती वो शहजादी।  
कुछ दिन रहती रानी बनकर,  
फिर लगती है भारी जिम्मेदारी।  
आते नन्हे-मुन्ने घर आँगन में,  
गूंजते किलकारी पालन में,  
आँखों से बहती अश्रु धारा।
जीवन जैसे जंजाल में उलझाना होता है।
*पर बचपन हर ग़म से बेगाना होता है॥*

धीरे-धीरे बच्चे बढ़ते जाते,  
अपने-अपने सपने सजाते।  
घर का बोझ बढ़ता जाता,  
खर्चों का संकट सताता।  
मन हर पल चिंतित रहता,
फूल भी जैसे काँटा लगता।  
रोज़ी-रोटी की फिक्र सताता,  
हाड़ तोड़ कमाना होता है।  
*पर बचपन हर ग़म से बेगाना होता है॥*

समय का चक्र बदलता जाता,  
काम करते तन झुक जाता।  
थककर शरीर हो जाता कमजोर,  
कमजोरी आ जाती पुरजोर।  
हरदम बीमारी का डर सताता,  
मृत्यु का भी भय दे जाता।  
टकटकी लगाए खाट पर,
सोए सोए भीतर से रोना होता है।  
पर बचपन हर ग़म से बेगाना होता है॥
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