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भगवान महावीर: अहिंसा और आत्म-कल्याण के ज्योतिपुंज

भगवान महावीर: अहिंसा और आत्म-कल्याण के ज्योतिपुंज

सत्येन्द्र कुमार पाठक
भारतीय धर्म और दर्शन के आकाश में भगवान महावीर एक ऐसे दैदीप्यमान नक्षत्र हैं, जिन्होंने न केवल जैन धर्म को पुनर्जीवित किया, बल्कि पूरी मानवता को 'जियो और जीने दो' का कालजयी संदेश दिया। वे वर्तमान अवसर्पिणी काल के 24वें और अंतिम तीर्थंकर थे। भगवान महावीर का जन्म आज से लगभग 2500 वर्ष पूर्व (ईसा से 599 वर्ष पूर्व) वैशाली गणराज्य के क्षत्रियकुंड में इक्ष्वाकु वंशीय क्षत्रिय राजा सिद्धार्थ और माता त्रिशला के यहाँ चैत्र शुक्ल त्रयोदशी को हुआ था। उनके जन्म के समय राज्य में हुई अभूतपूर्व उन्नति के कारण उनका नाम 'वर्धमान' रखा गया। अन्य नाम: वीर, अतिवीर, सन्मति, वर्धमान है। वंश: ज्ञातृ (क्षत्रिय)। चिह्न: सिंह। वर्ण: स्वर्ण है। राजसी वैभव और सुखों के बीच पलने के बावजूद वर्धमान का मन आत्मिक शांति की खोज में था। 30 वर्ष की आयु में उन्होंने संसार से विरक्त होकर राज-पाट त्याग दिया और संन्यास धारण कर लिया। अगले 12 वर्षों तक उन्होंने मौन रहकर कठोर तपस्या की। इस दौरान उन पर कई उपसर्ग (कष्ट) आए, जिन्हें उन्होंने समभाव से सहा। अंततः जृंभिकग्राम के निकट ऋजुकुला नदी के तट पर उन्हें 'केवलज्ञान' (सर्वोच्च ज्ञान) की प्राप्ति हुई, जिसके बाद वे 'जिन' (विजेता) और 'महावीर' कहलाए।
मुख्य शिक्षाएँ और पंचशील सिद्धांत में महावीर स्वामी ने समाज में व्याप्त हिंसा, पशुबलि है। युगप्रवर्तक भगवान महावीर: जीवन दर्शन और वैश्विक उपासना केंद्रों का ऐतिहासिक-आध्यात्मिक अनुशीलन
प्रस्तावना: वैचारिक क्रांति का उदय मानवता के इतिहास में ईसा पूर्व छठी शताब्दी एक स्वर्णिम युग था। यह वह काल था जब विश्व स्तर पर दार्शनिक चेतना जागृत हो रही थी। एक ओर यूनान में सुकरात और चीन में कन्फ्यूशियस अपने विचार रख रहे थे, वहीं भारत की पावन धरा पर बज्जि संघ की राजधानी वैशाली के निकट क्षत्रियकुंड में एक ऐसी महाविभूति का अवतरण हुआ, जिसने अहिंसा को केवल एक शब्द नहीं, बल्कि जीवन जीने की पद्धति बना दिया। वे थे जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर। वर्धमान से महावीर की यात्रा में भगवान महावीर का जन्म ईसा पूर्व 599 (चैत्र शुक्ल त्रयोदशी) को हुआ था। उनके पिता राजा सिद्धार्थ ज्ञातृक क्षत्रिय कुल के प्रधान थे और माता त्रिशला (विदेहदत्ता) लिच्छवी गणराज्य के राजा चेटक की बहन थीं। उनके जन्म के समय राज्य में धन-धान्य की अपार वृद्धि हुई, जिससे उनका नाम 'वर्धमान' पड़ा। बचपन से ही वे अदम्य साहसी थे, जिसके कारण उन्हें 'महावीर' कहा गया।
वैराग्य और कठोर तपश्चर्या के लिए 30 वर्ष की युवावस्था में, जब संसार के सुख उनके चरणों में थे, वर्धमान ने आत्म-कल्याण और जगत के दुखों के निवारण हेतु राजसी वैभव का त्याग कर दिया। उन्होंने 'नग्नत्व' स्वीकार किया और 12 वर्षों तक मौन रहकर घोर तपस्या की। साधना के केंद्र: उन्होंने चंपा, वैशाली, राजगृह और मिथिला के वनों में ध्यान लगाया। केवलज्ञान: 42 वर्ष की आयु में ऋजुकुला नदी के तट पर शाल वृक्ष के नीचे उन्हें 'केवलज्ञान' (अनंत ज्ञान) प्राप्त हुआ। इसके बाद वे 'जिन' (विजेता) और 'केवली' कहलाए। महावीर स्वामी ने किसी नए धर्म की स्थापना नहीं की, बल्कि शाश्वत सत्य को पुनर्जीवित किया। उनके दर्शन के तीन मुख्य आधार स्तंभ हैं:
पंच महाव्रत (अणुव्रत) में अहिंसा: "अहिंसा परमो धर्म:"। महावीर की अहिंसा में सूक्ष्म जीवों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, वनस्पति) की रक्षा भी अनिवार्य है। सत्य: मन, वचन और कर्म से सत्य का पालन। अचौर्य: किसी के अधिकार या वस्तु का हनन न करना। अपरिग्रह: संसाधनों का सीमित उपयोग। आज के 'क्लाइमेट चेंज' और 'उपभोक्तावाद' के दौर में अपरिग्रह ही एकमात्र समाधान है। ब्रह्मचर्य: इंद्रियों पर संयम और पवित्रता। अनेकांतवाद और स्यादवाद का महावीर का सबसे महान बौद्धिक योगदान है। उन्होंने सिखाया कि सत्य सापेक्ष है। एक ही वस्तु को अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखा जा सकता है। यह दर्शन कट्टरता को समाप्त कर आपसी संवाद और सहिष्णुता (Tolerance) को बढ़ावा देता है।
महावीर साधना का हृदय स्थल में भगवान महावीर की पूरी जीवनलीला बिहार की भूमि पर रची गई। यहाँ के प्रमुख उपासना केंद्र वैश्विक जैन समाज की आस्था के केंद्र हैं: पावापुरी (नालंदा): मोक्ष की पावन भूमि राजगीर के निकट स्थित पावापुरी वह स्थान है जहाँ कार्तिक कृष्ण अमावस्या को महावीर स्वामी ने निर्वाण प्राप्त किया। जल मंदिर: तालाब के बीच स्थित यह मंदिर स्थापत्य कला का अद्भुत नमूना है। मान्यता है कि यहाँ की पवित्र मिट्टी ले जाने की होड़ में श्रद्धालुओं ने इतना गहरा गड्ढा किया कि वह तालाब बन गया। समवशरण: यहाँ वह स्थान है जहाँ भगवान ने अपना अंतिम उपदेश दिया था। वैशाली और कुण्डलपुर: जन्मस्थली विवाद और श्रद्धा में वैशाली (बासोकुंड): श्वेतांबर मान्यता के अनुसार वैशाली का बासोकुंड महावीर की जन्मभूमि है। यहाँ विशाल पुस्तकालय और शोध संस्थान हैं। कुण्डलपुर (नालंदा): दिगंबर मान्यता के अनुसार यहाँ महावीर स्वामी का जन्म हुआ था। यहाँ भव्य 'नंद्यावर्त महल' और मंदिर स्थित हैं। राजगीर (राजगृह): उपदेशों की गूँज का राजगीर की पाँच पहाड़ियाँ—विपुलाचल, रत्नागिरी, उदयगिरी, स्वर्णगिरी और वैभवगिरी—जैन धर्म के लिए पवित्र हैं। विपुलाचल पर्वत पर महावीर स्वामी ने अपना प्रथम उपदेश (दिव्य ध्वनि) दिया था। लछुआड़ और क्षत्रियकुंड (जमुई): की पहाड़ियों की गोद में बसा यह क्षेत्र महावीर की जन्मभूमि और दीक्षा भूमि के रूप में प्रसिद्ध है। यहाँ प्राचीन काले पत्थर की महावीर प्रतिमा ऐतिहासिक महत्व रखती है। भारत के अन्य राज्यों में उपासना केंद्र में महावीर स्वामी का संदेश मगध से निकलकर पूरे भारत में फैला: , राजस्थान (श्री महावीरजी): करौली जिले में स्थित यह मंदिर पूरे उत्तर भारत का सबसे बड़ा उपासना केंद्र है। यहाँ की 'महावीर जयंती' पर लगने वाला मेला सांप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक है। दिलवाड़ा (माउंट आबू) और रणकपुर के मंदिर अपनी कलात्मक नक्काशी के लिए विश्व विख्यात हैं। मध्य प्रदेश (कुंडलपुर और सोनागिर): दमोह के पास कुंडलपुर में महावीर स्वामी की विशाल 'बड़े बाबा' प्रतिमा और सोनागिर के सैकड़ों श्वेत मंदिर जैन दर्शन की भव्यता दर्शाते हैं। खजुराहो के जैन मंदिर भी विशेष हैं।
कर्नाटक (बादामी और श्रवणबेलगोला): बादामी की गुफाओं में महावीर स्वामी की ध्यानस्थ प्रतिमाएँ चालुक्य काल की श्रेष्ठता को दर्शाती हैं। महाराष्ट्र (एलोरा): एलोरा की गुफा संख्या 32 (इंद्र सभा) में महावीर स्वामी की भव्य प्रतिमाएँ और नक्काशी चट्टानों को काटकर बनाई गई हैं, जो पर्यटकों और उपासकों के लिए आकर्षण का केंद्र हैं। ओडिशा (खंडगिरि-उदयगिरि): भुवनेश्वर के पास स्थित ये गुफाएँ राजा खारवेल के काल की हैं, जो महावीर स्वामी के प्रति उनकी अगाध श्रद्धा का प्रमाण हैं। तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश: मदुराई की 'समणर मलाई' और कोलनपाक (कुलपाकजी) प्राचीन जैन संस्कृति के दक्षिण भारतीय स्तंभ हैं। भगवान महावीर का "जियो और जीने दो" का सिद्धांत आज वैश्विक स्तर पर गूँज रहा है:।।नेपाल: काठमांडू में स्थित 'भगवान महावीर जैन मंदिर' नेपाल के जैन समुदाय का मुख्य केंद्र है। नेपाल के तराई क्षेत्रों में भी महावीर स्वामी के अनुयायी बड़ी संख्या में हैं। पाकिस्तान और बांग्लादेश: बंटवारे से पूर्व इन क्षेत्रों में भव्य जैन मंदिर थे। लाहौर और ढाका के संग्रहालयों में महावीर स्वामी की प्राचीन प्रतिमाएँ आज भी सुरक्षित हैं, जो इस क्षेत्र के जैन इतिहास की गवाही देती हैं। आधुनिक वैश्विक केंद्र में मॉरिशस: मॉरिशस के फिनिक्स में एक अत्यंत सुंदर जैन मंदिर है। यहाँ प्रवासी भारतीय समुदाय महावीर स्वामी की शिक्षाओं का प्रचार-प्रसार करता है। थाईलैंड (बैंकॉक): बौद्ध बाहुल्य देश होने के बावजूद यहाँ महावीर स्वामी के उपासकों के लिए 'बैंकॉक जैन सेंटर' एक प्रमुख आध्यात्मिक केंद्र है। अमेरिका और यूरोप: अमेरिका के टेक्सास में स्थित 'सिद्धायतन' और लीसेस्टर (इंग्लैंड) का जैन केंद्र महावीर स्वामी के अहिंसा दर्शन को पश्चिमी जगत में फैला रहे हैं। बेल्जियम के एंटवर्प में हीरा व्यापारियों द्वारा निर्मित भव्य मंदिर महावीर स्वामी की उपासना का आधुनिक केंद्र है। महावीर स्वामी ने केवल धर्म की बात नहीं की, बल्कि सामाजिक बुराइयों पर भी प्रहार किया: जातिवाद का अंत: उन्होंने कहा कि मनुष्य कर्म से महान होता है, जन्म से नहीं।।महिला सशक्तिकरण: उन्होंने महिलाओं को अपने संघ में प्रमुख स्थान दिया (चंदनबाला इसकी प्रथम प्रमुख थीं)।।पर्यावरण और जीव दया: उनकी अहिंसा में प्रकृति का संतुलन छिपा है। आज का 'वेजिटेरियनिज़्म' (शाकाहार) आंदोलन कहीं न कहीं महावीर की शिक्षाओं से प्रेरित है।
शाश्वत शांति का मार्ग में भगवान महावीर का 72 वर्ष का जीवन काल (ईसा पूर्व 599 - 527) मानवता के लिए एक प्रयोगशाला था, जहाँ उन्होंने सिद्ध किया कि संयम और तपस्या से एक साधारण मनुष्य भी 'परमात्मा' बन सकता है। उनके उपासना केंद्र केवल पत्थर की इमारतें नहीं हैं, बल्कि वे अहिंसा और शांति के ऊर्जा केंद्र हैं। आज जब विश्व आतंकवाद, आर्थिक विषमता और पर्यावरणीय विनाश के कगार पर खड़ा है, तब महावीर का 'अपरिग्रह' हमें लालच से बचा सकता है, उनका 'अनेकांतवाद' हमें वैचारिक मतभेदों से उबार सकता है और उनकी 'अहिंसा' हमें विनाश से बचा सकती है। उनका यह सूत्र सदा सर्वदा प्रासंगिक रहेगा:
"सव्वे जीवा वि इच्छंति जीविउं न मरिज्जिउं" > (अर्थात: सभी जीव जीना चाहते हैं, मरना कोई नहीं चाहता, इसलिए किसी की हिंसा मत करो। भगवान महावीर का प्रकाश स्तंभ युगों-युगों तक मानवता को सत्य और करुणा का मार्ग दिखाता रहेगा।
संदर्भ - आचार्य भद्रबाहु कृत 'कल्पसूत्र' , जैन आगम साहित्य और उत्तरपुराण , भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के ऐतिहासिक अभिलेख , विश्व के प्रमुख जैन तीर्थों का भौगोलिक सर्वेक्षण
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