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वर्ष को सुखप्रद बनाने के लिए करें वर्षपति की पूजा

वर्ष को सुखप्रद बनाने के लिए करें वर्षपति की पूजा

श्री मार्कण्डेय शारदेय
 (ज्योतिष एवं धर्मशास्त्र विशेषज्ञ)

हमारे यहाँ अनेक तरह के वर्षों का प्रचलन है।धार्मिक दृष्टि से विक्रमी संवत् का अधिक महत्त्व है। ईसवीय सन् में 57 तथा शक संवत् में 135 वर्ष जोड़ने पर इसका संख्यक मान प्राप्त होता है।उदाहरणार्थ अभी 2026 ईसवीय सन् चल रहा है।इसमें 57 जोड़ा तो 2083 हुआ।इसी तरह वर्तमान 1948 शक संवत् में 135 जोड़ा तो 2083 हुआ।यानी; चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (19.03.2026, गुरुवार) से विक्रम का 2083 वाँ वर्ष प्रारम्भ हो जाएगा, जो चैत्र अमावस्या (06.04.2027, मंगलवार) तक रहेगा।यह अमान्त वर्ष है।अर्थात्; इसके सभी महीने शुक्ल प्रतिपदा से कृष्ण पक्ष की अन्तिम तिथि अमावस्या तक के होते हैं।
यह वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से प्रारम्भ होता है।इसीलिए इस तिथि को वर्षप्रतिपदा के नाम से भी जाना जाता है।शास्त्रीय मत है कि सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी ने पूर्वाह्न में इसी दिन (इसी तिथि को) सृष्टि शुरू की थी।यों तो इस तिथि को युगादि के नाम से पंचांगों में उल्लेख मिलता है, पर किस युग का आरम्भ इस दिन से हुआ; स्पष्ट नहीं।मेरी समझ में संविधान-निर्माण और लागू होने की तरह यह युग-निर्धारण के पूर्व का समय है।इसी दिन सत्ययुग के आरम्भ का आरम्भ माना जा सकता है।इसलिए इसे युगादि भी कहते हैं।
यद्यपि पंचांगों में अक्षय-तृतीया को त्रेतायुग का आरम्भ तथा अक्षयनवमी को सत्ययुग का आरम्भ बताया गया है, पर ब्रह्मपुराण में चारों युगों की आदि तिथिंयाँ इस प्रकार हैं—
“वैशाखे शुक्लपक्षे तु तृतीयायां कृतं युगम्।
कार्तिके शुक्लपक्षे तु त्रेताथ नवमेsहनि।।
अथ भाद्रपदे कृष्ण- त्रयोदश्यां तु द्वापरम्।
माघे च पौर्णमास्यां वै घोरं कलियुगं स्मृतम्”।।
अर्थात्; वैशाख शुक्ल तृतीया (अक्षय-तृतीया) को कृतयुग (सत्ययुग) आरम्भ हुआ।कार्तिक शुक्ल नवमी (अक्षय-नवमी) को त्रेतायुग प्रारम्भ हुआ।भद्रपद कृष्ण त्रयोदशी को द्वापर युग एवं माघी पूर्णिमा को कलियुग की शुरूआत हुई।
इस मत से अक्षय-तृतीया को सत्ययुग का आरम्भ मान्य है और वर्षप्रतिपदा (चैत्र शुक्ल प्रतिपदा) से वैशाख शुक्ल द्वितीया तक की तिथियाँ सृष्टि के शुभारम्भ से जड़-चेतन के सामान्य सृजन की तथा अक्षय-तृतीया से सत्ययुग स्थापित कर ब्रह्माजी द्वारा मानवजाति के लिए कृत्याकृत्य विधान प्रस्तुत किया जाना जान पड़ता है।
यद्यपि कृष्णपक्ष और शुक्लपक्ष दोनों में प्रतिपदा का स्थान है।इसी काररण चैत बदी परिबा को लोकमत से नववर्ष के रूप में हम होलोत्सव व होलिकोत्सव मनाते हैं।परन्तु; चन्द्रमा की कला की वृद्धि और ह्रास के आधार पर ही क्रमशः शुक्ल तथा कृष्ण नाम पड़ा।तिथियों में प्रवरता के कारण ही विधाता ने इस तिथि को प्रतिपदा नाम दिया।चूँकि चैत्रशुक्ल की प्रतिपदा को ही उन्होंने विश्व का निर्माण प्रारम्भ किया था, इसलिए यह तिथि बहुत पवित्र मानी गई है।चैती नवरात्र का शुभारम्भ तो इस दिन से होता ही है, मतान्तर से इसी दिन भगवान विष्णु का प्रथम मत्स्य (मछली) के रूप में अवतार भी माना गया है।
वर्षप्रतिपदा, यानी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को सूर्योदय कालीन ही यह तिथि मान्य है।कारण कि कहा गया है—
“चैत्रे मासि जगद् ब्रह्मा ससर्ज प्रथमेsहनि।
शुक्लपक्षे समग्रे तु तदा सूर्योदये सति”।।
अर्थात्; ब्रह्माजी ने चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को पूर्वाह्ण में सृष्टि प्रारम्भ की थी, इसलिए यह सूर्योदय-व्यापिनी हो तो वर्पप्दिपदा के लिए मान्य है।
हाँ; जिस दिन चैत्र सुदी परिबा होती है, उसी दिन को उसे वर्षपति माना जाता है।जैसे इस बार बृहस्पतिवार को वर्ष का आरम्भ होने से बृहस्पति ही वर्षपति कहलाएँगे।इसी तरह विक्रमी संवत् की मेष संक्रान्तिवाले दिन का स्वामी ग्रह मन्त्री, आर्द्रा नक्षत्र में सूर्य के प्रवेश के दिन का स्वामी मेघेश, कर्क संक्रान्तिवाले दिन का स्वामी खरीफ फसलों का मालिक कहलाता है।पुनः सिंह, कन्या, तुला, धनु, मकर तथा मीन की संक्रान्तियाँ जिस-जिस दिन होती हैं, क्रमशः उस-उस दिन का स्वामी यथाक्रम दुर्गेश, धनेश, रसेश, रबी फसलों का मालिक, नीरसेश (शुष्क पदार्थों का अधिकारी) एवं फलेश होते हैं।
जैसे हमारे यहाँ सात वार, पन्द्रह तिथियाँ, बारह महीने, छह ऋतुएँ एवं चार युग आदि अपने खास-खास नाम से जाने जाते हैं, वैसे ही हमारे यहाँ साठ संवत् हैं, जिनके नाम हैं-- प्रभव, विभव, शुक्ल, प्रमोद, प्रजापति, अंगिरा, श्रीमुख, भाव, युवा, धाता, ईश्वर, बहुधान्य, प्रमाथी, विक्रम, वृष, चित्रभानु, सुभानु, तारण, पार्थिव, व्यय, सर्वजित्, सर्वधारी, विरोधी, विकृत, खर, नन्दन, विजय, जय, मन्मथ, दुर्मुख, हेमलम्ब, विलम्ब, विकारी, शर्वरी, प्लव, शुभकृत्, शोभन, क्रोधी, विश्वावसु, पराभव, प्लवंग, कीलक, सौम्य, साधारण, विरोधकृत्, परिधावी, प्रमादी, आनन्द, राक्षस, अनल, पिंगल, कालयुक्त, सिद्धार्थ, रौद्र, दुर्मति, दुन्दुभी, रुधिरोद्गारी, रक्ताक्ष, क्रोधन तथा क्षय।
ये साठों बारह युगों में बँटे हैं।अर्थात्; पाँच-पाँच वर्षों के एक-एक सामान्य युग होते हैं।इन बारहों युगों के स्वामी क्रमशः विष्णु, बृहस्पति, इन्द्र, अग्नि, त्वष्टा, अहिर्बुध्न्य, पितर, विश्वेदेवा, सोम, इन्द्राग्नि, अश्विनीकुमार तथा भग (सूर्य) हैं।
चूँकि विक्रमी संवत् का प्रारम्भ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से माना जाता है और प्रायः हमारे सभी पंचांग इसी वर्षमान से चलते हैं, इसलिए यह हमारा नववर्ष भी है।इस दिन, यानी वर्षप्रतिपदा को पूर्वाह्ण में स्नानादि से शुद्ध होकर पूजन-सामग्री लेकर केसर-चन्दन आदि से अष्टदल कमल बनाकर पहले ‘ऊँ ब्रह्मणे नमः’ इस मन्त्र से सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी की विधिपूर्वक पूजा करनी चाहिए।इसके बाद सृष्टि के ज्ञाताज्ञात समस्त अवयवों (ऊँ आब्रह्म-स्तम्भेभ्यो नमः) का, अनन्तर विष्णु आदि पंचदेवताओं का (ऊँ विष्ण्वादि- पंचदेवताभ्यो नमः) पूजन कर जिस नाम का संवत् चलने जा रहा हो, उसका तथा उस वर्ष के स्वामी, मन्त्री आदि की भी पूजा करें।
चूँकि इस संवत्सर का नाम रौद्र है, राजा बृहस्पति हैं, मन्त्री मंगल हैं, इसलिए-- ऊँ रौद्र-संवत्सराय नमः, ऊँ वर्षपतये बृहस्पतये नमः, वर्षमन्त्रिणे मंगलाय नमः, ऊँ सस्येशाय शुक्राय नमः, ऊँ दुर्गेशाय चन्द्रमसे नमः, ऊँ धनेशाय गुरवे नमः, ऊँ रसेशाय रवये नमः, ऊँ धान्येशाय बुधाय नमः, ऊँ नीरसाय गुरवे नमः, ऊँ फलेशाय चन्द्राय नमः, ऊँ मेघेशाय चन्द्राय नमः; इन नाम मन्त्रों से पूजन करें।
इन नाम मन्त्रों से अष्टदल कमल के ही आस-पास रोली-मिश्रित अक्षत फूल छोड़ते हुए आवाहित करें।यदि षोडशोपचार पूजा हो सके तो करें, नहीं तो पंचोपचार (जल, रोली-चन्दन, फूल, धूप-दीप, नैवेद्य (प्रसाद) चढ़ाकर) एकतन्त्र से (एक ही साथ सबका) ऊँ ब्रह्मादिभ्यो आवाहितेभ्यो नमः इस मन्त्र का उच्चरण करते हुए एक-एक सामग्री चढ़ाते जाएँ और अन्त में प्रणाम करें।इस दिन ध्वजा-रोपण का भी विधान है, अतः वानरांकित लाल झंडा, जिसे महावीरी झंडा भी कहते हैं, उसपर श्रीराम की पूजा कर स्थापित करें।चैती व वासन्ती नवरात्र का आरम्भ भी इस दिन से होता है, इसलिए वर्षमंगल के लिए यथाशक्ति भगवती की आराधना व नवरात्रिक अनुष्ठान, दुर्गोत्सव करें।
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