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खता किसकी है

खता किसकी है

संजय जैन

मोहब्बत हम कर तो बैठे है।
परंतु करने का तरीका नही पता।
नहाना तो समुंदर में चाहता हूँ।
पर तैरना बिल्कुल आता नही।।

शाम-ऐ तो बहुत रंगीन होती है।
जिसमें मोहब्बत हसीन दिखती है।
ऐसा किताबों में पढ़ रखा है।
परंतु आज उसे देख लिया है।।


रातों में वो ही वो दिख रही है।
जिसमें उसकी क्या खता है।
दर्द और तड़प मुझे हो रहा है।
अखिकार वो मेरी कौन है।।

नदी तालाब समुंदर में नशा है।
तो मोहब्बत एक एबादत क्यों है।
मिलन की रात को तो देखो।
इतनी लम्बी और हसीन क्यों हो गई है।।


जय जिनेंद्र
संजय जैन "बीना" मुंबई
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