मत हिला तू उस महिला को
अरुण दिव्यांशआज समस्त माताओं , बहनों एवं बंधुओं को सपरिवार अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की हार्दिक बधाई एवं कोटि कोटि शुभकामनाऍं । अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के उपलक्ष्य में एक छोटी सी रचना का सादर प्रयास :
मत हिला तू उस महिला को ,
हिलाते हिलाते तू हिल जाएगा ।
दृढ़ पग को तू हिला न सकेगा ,
स्वयं ही ख़ाक में मिल जायेगा ।।
देख लिया है अब रमा बनकर ,
रावण बालि सदा ही मिला है ।
महिला बनी जब काली चंडी ,
अधमों का ही संहार खिला है ।।
द्रौपदी बनी तो देखा दुर्योधन
नारी निज चीर हरण कराई है ।
पाॅंचो पति भी नाकाम हुए थे ,
नारी तबसे देख बौखलाई है ।।
महा इला से महिला बनी है ,
इला पृथ्वी गाय सरस्वती है ।
जिसने किया नारी अपमानित ,
उसकी मारी जाती मति है ।।
नर होता नारायण जहाॅं पर ,
नारी विराजित नारायणी है ।
चुक जाए नर कर्म में भले ही ,
नारी ही कर्तव्यपरायणी है ।।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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