सनातन का संकट: राजनीति के चक्रव्यूह में पिसती सामाजिक समरसता
सत्येन्द्र कुमार पाठक
"जब से मैंने होश संभाला है, हिन्दुओं को आपस में लड़ते देखा है।" यह पीड़ा मात्र एक व्यक्तिगत अनुभव नहीं, बल्कि आधुनिक भारत का सबसे क्रूर यथार्थ है। भारतीय समाज, जो सहस्राब्दियों से अपनी सांस्कृतिक एकता और दार्शनिक गहराई के लिए विश्वविख्यात था, आज राजनीति की बिसात पर 'जातिगत मोहरों' में तब्दील हो चुका है। जिस सनातन धर्म ने 'वसुधैव कुटुंबकम्' का उद्घोष किया, आज उसी के अनुयायी 'अगड़ा, पिछड़ा , अतिपिछड़ा , दलित और महादलित' जैसी कृत्रिम पहचानों के बोझ तले दबे जा रहे हैं। इस 'जातिगत नंगे नाच' और इसके पीछे के राजनैतिक व वैधानिक षड्यंत्रों करता है।
ऐतिहासिक समन्वय से संघर्ष की यात्रा में इतिहास गवाह है किभारत की इस पावन भूमि ने कभी जातियों के आधार पर नहीं, बल्कि 'राष्ट्रनीति' के आधार पर अखंड भारत का निर्माण किया था। चंद्रगुप्त मौर्य और चाणक्य का संगम इस बात का जीवंत प्रमाण है कि योग्यता और ज्ञान किसी जाति की बपौती नहीं थे। प्राचीन भारत में 'वर्ण' एक कर्तव्य-आधारित श्रम विभाजन था, जिसमें लचीलापन और गतिशीलता थी। ऋषि वाल्मीकि, वेदव्यास और निषादराज गुह जैसे पात्रों के बिना रामायण और महाभारत की कल्पना असंभव है, जो यह सिद्ध करते हैं कि श्रेष्ठता का आधार 'कुल' नहीं बल्कि 'कर्म' था। किंतु, मध्यकाल की विकृतियों और ब्रिटिश औपनिवेशिक काल की 'बाँटो और राज करो' की नीति ने इस सामाजिक ताने-बाने में विष घोल दिया। 1901 की जनगणना ने जो वर्गीकरण शुरू किया, उसे स्वतंत्र भारत की राजनीति ने विकास का साधन बनाने के बजाय सत्ता का सोपान बना लिया। वैधानिक प्रहार से आरक्षण और विशेष अधिनियमों का द्वंद्व की स्वतंत्रता के पश्चात संविधान की मंशा एक 'समरस समाज' के निर्माण की थी, लेकिन कालांतर में राजनैतिक दलों ने वैधानिक प्रावधानों को विभाजन का हथियार बना लिया।
आरक्षण का बदलता स्वरूप में आरक्षण का मूल उद्देश्य सामाजिक उत्थान था, लेकिन आज यह 'प्रतिभा के हनन' का पर्याय बन गया है। सवर्ण समाज को निरंतर दरकिनार कर, योग्यता की बलि देकर केवल जातिगत आंकड़ों के आधार पर अवसरों का वितरण राष्ट्र की बौद्धिक प्रगति को बाधित कर रहा है। यूजीसी एक्ट और एस.सी./एस.टी. एक्ट: इन अधिनियमों का जिस प्रकार राजनैतिक प्रश्रय के माध्यम से उपयोग (और दुरुपयोग) किया गया, उसने समाज में आपसी भरोसे को समाप्त कर दिया है। जहाँ कानून को न्याय का साधन होना चाहिए था, वहाँ उसे 'वोट बैंक' को साधने और एक विशेष वर्ग में असुरक्षा का भाव पैदा करने का माध्यम बना दिया गया।श्रेणीबद्ध विभाजन में समाज को पहले 'अगड़ा-पिछड़ा' में बांटा गया, फिर राजनीति की भूख इतनी बढ़ी कि 'अत्यंत पिछड़ा' और 'महादलित' जैसे नए वर्ग गढ़ दिए गए। यह विभाजनकारी प्रक्रिया समाज को सूक्ष्म स्तर पर खंडित कर रही है।
सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना पर कुठाराघात के लिए राजनीति ने केवल संसाधनों का बँटवारा नहीं किया, बल्कि उसने हमारी सामूहिक चेतना को भी प्रदूषित किया है। सिनेमा, साहित्य और राजनैतिक भाषणों के माध्यम से जातियों के प्रति 'स्टीरियोटाइप' (रूढ़ियाँ) प्रचारित की गईं। भ्रामक धारणाएँ में बनिया को 'कंजूस', ब्राह्मण को 'शोषक', ब्राह्मणवाद , मनुवाद और क्षत्रिय को 'अत्याचारी' भूमिहार एवं लाला कायस्थ दिखाकर नई पीढ़ी के मन में अपने ही पूर्वजों और समाज के प्रति घृणा भरी गई। पृथ्वीराज चौहान , शिव जी , राणा प्रताप , संभा जी महाराज , लक्ष्मी बाई , तात्या टोपे , बाल गंगाधर तिलक , मदानमोहन मलवीय , चंद्रशेखर आजाद , वीर सावरकर , वीर भगत सिंह , विवेकानंद की विचारों और सिद्धांत आज की मांग है । सर्वे भवन्तु सुखिन का रूप लाना होगा ।
सांस्कृतिक क्षति: हिन्दू समाज की वह व्यवस्था जिसमें हर जाति का अपना सम्मान और अनिवार्य भूमिका थी (जैसे बिना धोबी के शुद्धता नहीं, बिना डोम के मोक्ष नहीं), उसे 'अत्याचार' के नैरेटिव में बदल दिया गया। परिणामतः, जो समाज एक-दूसरे का पूरक था, वह आज एक-दूसरे का प्रतिद्वंद्वी बन गया है। गौरवशाली अतीत बनाम वर्तमान पतन मगध और भारत की धरती, जो कभी ज्ञान, विज्ञान और शौर्य का केंद्र थी, आज जातिवाद की सबसे वीभत्स राजनीति का केंद्र बन गई है। भगवान राम और कृष्ण की सिद्धांतों और विचारों एवं कार्यों तथा भगवान परशुराम के पदचिह्नों , चाणक्य की नीतियों से समाज की सांस्कृतिक विरासत और भारत में एकता और अखंडता , सामाजिक उन्नति होगी ।
वीर कुंवर सिंह का आदर्श: 1857 में जब 80 वर्षीय कुंवर सिंह अंग्रेजों से लड़े, तो उनके पीछे चलने वाले हाथ किसी एक जाति के नहीं थे। उनमें सवर्ण, पिछड़े और वंचित—सभी वर्गों का रक्त शामिल था। आज की विसंगति में : वर्तमान राजनीति ने भारत के उस महान गौरव को भुलाकर उसे 'जातिगत जनगणना' और 'आरक्षण के भीतर आरक्षण' के मुद्दों में उलझा दिया है। यह सनातन धर्म की उस मूल आत्मा पर प्रहार है जो सबको एक सूत्र में पिरोती थी।
सनातन धर्म पर संकट और षड्यंत्रकारियों का लक्ष्य में षड्यंत्रकारियों को पता है कि जब तक हिन्दू अपनी 'सनातनी' पहचान के साथ एकजुट है, उसे पराजित करना असंभव है। इसलिए, उन्होंने 'जाति' को हथियार बनाया। धार्मिक विखंडन: आज स्थिति यह है कि एक हिन्दू मंदिर जाने से पहले अपनी जातिगत पहचान के बारे में सोचता है। राजनीति ने धर्म को जाति के नीचे दबा दिया है। सांस्कृतिक आक्रमण: 'दलित विमर्श' के नाम पर कई बार हिन्दू देवी-देवताओं और परंपराओं का अपमान किया जाता है, जिसे राजनैतिक संरक्षण प्राप्त होता है। यह सनातन की जड़ों को खोखला करने का एक सुविचारित प्रयास है।
प्रश्न यह है कि क्या जातियों को श्रेणियों में बांटकर हम वास्तव में समानता ला रहे हैं? उत्तर नकारात्मक है।
इस राजनीति ने केवल 'जातिगत अभिमान' या 'जातिगत हीनता' को जन्म दिया है। आर्थिक रूप से पिछड़ों की उपेक्षा कर केवल जाति को आधार बनाना यह सिद्ध करता है कि राजनैतिक दलों की रुचि समाज के कल्याण में नहीं, बल्कि उसे उलझाए रखने में है। जब समाज अपनों के बीच ही 'दीवारें' खड़ी कर लेता है, तब उसकी सामूहिक शक्ति क्षीण हो जाती है। विदेशी आक्रांताओं की जीत का इतिहास भी यही रहा है कि उन्होंने हमें बंटा हुआ पाया।
राजनीति का यह 'जातिगत नंगा नाच' तभी रुकेगा जब समाज स्वयं अपनी चेतना जागृत करेगा। एक इतिहासकार के नाते हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि समाज की शक्ति उसके विभाजन में नहीं, बल्कि उसकी एकता में है।
योग्यता का सम्मान: राष्ट्र के निर्माण में जाति से ऊपर उठकर प्रतिभा और योग्यता को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी।
भ्रामक विमर्श का विरोध: उन फिल्मों, पुस्तकों और नेताओं का सामूहिक बहिष्कार आवश्यक है जो किसी विशेष जाति का अपमान करते हैं या समाज को बांटते हैं। सनातन पुनर्जागरण: हमें पुनः अपनी उस 'सहयोग आधारित व्यवस्था' की ओर लौटना होगा जहाँ हर व्यक्ति गौरवशाली था। मतदान का आधार: जनता को 'जाति' के बजाय 'नीति' और 'राष्ट्रहित' के आधार पर अपना मत देना होगा। , हमें यह याद रखना होगा कि यदि हम 'अगड़े, पिछड़े या दलित' बनकर लड़ते रहे, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें एक 'पराजित और खंडित समाज' के रूप में याद रखेंगी। किंतु यदि हम 'हिन्दू' बनकर एक हुए, तो भारत को पुनः विश्वगुरु बनने से कोई नहीं रोक सकता।
जात-पात की करो विदाई, हम सब हिन्दू भाई-भाई!भारत की माटी पुकारती, तज दो सारी ये चतुराई !!
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