होली खेले पिया साथ
रंग गुलाल के मिलन सेकमल सा दिल खिल उठा।
चेहरे पर मुस्कान बहुत है
पर दिल अंदर से बेचैन है।।
होली का त्यौहार आया तो
नईदुल्हन का दिल मचल उठा।
पहली होली पिया संग खेले
जिसका देखो कैसे रंग चढ़ता।।
वर्षो से होली खेल रहे थे
रंग बिरंग रंगो को उड़ाकर।
खुदको राधा और उनको कृष्ण
बस कल्पनाओं में मान रहे थे।।
यौन अवस्था को देख दर्पण में
अरमानों को समझा रहा।
पर रंगो की पड़ती फुहार से
अंग-अंग अब तड़प उठा।।
कब पिया आये पीहर मेरे
खेलने पहली होली को।
सखी सहेली बहिन भाभी को
है उनके आने के इंतजार मे जो।।
जय जिनेंद्र
संजय जैन "बीना" मुंबई
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