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अमीरी गरीबी

अमीरी गरीबी

जय प्रकाश कुवंर
गरीबी के दिन कटले कटत नइखे।
केहू एह दशा में लगे सटत नइखे।।
जब ले छाता में मधु भरल रहे।
मधुमाछी अइसन सब लोग सटल रहे।।
जैसे छाता से मधु ओरा ग‌इल।
गैर तो गैर अपनो लोग छोड़ के भाग भ‌इल।।
उहो एगो दिन रहे जब मजमा लागल रहे।
चाय बिस्कुट मिठाई से टेबुल भरल रहे।।
केहू कहे काका चाचा केहू बड़का भाई।
जोड़ गांठ वाला नाता गोता हमरा ना बुझाईल।।
दिन रात दालान में रोज खुब चौपाल साजे।
गाना बजाना चलत रहे ढोल आउर झाल बाजे।।
समय अइसन करवट मरलस,
देखते देखते सब कुछ फुर्रर् भ‌इल।
जतने खुशहाल आउर भरल पुरल दिन रहे,
ओतने अब गरीबी के दौर आइल।।
अमीरी में लोग के सही पहचान ना भ‌इल।
गरीबी में आपन बिराना सब केहू पहचानल ग‌इल।।
भगवान जे करेले से अच्छे होला।
आंख पर से भरम के परदा त हट जाला।।
धन्य ह इ गरीबी जेकर कतना करीं बढ़ाई।
आपन बिराना के सही पहचान इहे गरीबी कराई।।

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