विश्व गौरैया दिवस पर विलुप्त होती चुलबुली पक्षी को समर्पित
✍️ डॉ. रवि शंकर मिश्र "राकेश"नन्ही सी चिड़िया, प्यारी गौरैया,
कभी आंगन करती थी ताताथैया।
छतों पे चहकती, दानों को चुगती,
हर सुबह को तुम मधुरता से सजती।
अब वो कलरव कहीं खो सा गया है,
शहरों का शोर तुमको डरा गया है।
पेड़ों की छाँव, वो कच्चे मकान,
सब छिन गए तुमसे, सूना है जहान।
तारों का जाल और कंक्रीट की दीवार,
कैसे बसाओगी तुम अपना परिवार ?
ना दाना बचा, ना पानी की धार,
कैसे जिएगी तू, ओ नन्ही सरकार!
आओ मिलकर प्रण ये उठाएँ,
गौरैया को फिर से घर बुलाएँ।
छोटे से पात्र में जल भर देंगे,
आँगन में दाने रोज़ बिखेर देंगे।
बगीचे लगाएँ, प्रकृति सजाएँ,
हर छत पर उसका घर बनवाएँ।
फिर लौटेगी वो चींचीं वाला तान,
गूँजेगा फिर से तेरा आँगन-जहान।
नन्ही सी चिड़िया, हमारी पहचान,
गौरैया है प्रकृति का अभिमान।
आओ बचाएँ इस प्यारे जीवन को,
दें फिर से उसको खुला आसमान।
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