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मैं साहस का सिंधु,शौर्य का शिखर,भारत हूं

मैं साहस का सिंधु,शौर्य का शिखर,भारत हूं

कुमार महेंद्र
सहज सरल जन-अठखेलियाँ,
सादा जीवन,उच्च विचार।
अहिंसा परमो धर्म,मूल मंत्र,
रज-रज स्नेह-प्रेम-शांति धार।
अंतःकरण वैदिक ज्ञान-ज्योति,
सदा वंदे मातरम् उच्चारत हूं ।
मैं साहस का सिंधु,शौर्य का शिखर,भारत हूं ।।


कर तत्पर मानवता-कल्याण,
प्रगति संग प्रकृति-संरक्षण ध्यान।
सदैव अभिरक्षा नैसर्गिक धरोहर,
शिष्ट-सदाचारी दिनचर्या आह्वान।
वरिष्ठजन,नारी प्रति आदर भाव,
नित्य प्राणी-सेवा भाव विचारत हूं ।
मैं साहस का सिंधु,शौर्य का शिखर,भारत हूं ।।


अग्र कदम विज्ञान-प्रौद्योगिकी,
कला-कौशल-प्रतिभा निर्झर।
प्रेरणास्पद परिवेश अनुपम,
मधुर संवाद सजे हर अधर।
जननी जन्मभूमि सेवा ध्येय,
तिरंगी आन-बान-शान धारत हूं ।
मैं साहस का सिंधु,शौर्य का शिखर,भारत हूं ।।


हर राष्ट्र प्रति मैत्री अभिलाष,
सदा विरोध दमनकारी रूप।
वार्तालाप माध्यम समस्या-हल,
परस्पर आदर आदर्श प्रतिरूप।
निज संस्कृति,मर्यादा सर्वोपरि,
वैश्विक खुशियाँ पथ संवारत हूं ।
मैं साहस का सिंधु,शौर्य का शिखर,भारत हूं ।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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