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चैती छठ और मगध की वैश्विक सूर्य-चेतना

चैती छठ और मगध की वैश्विक सूर्य-चेतना

सत्येंद्र कुमार पाठक
सूर्य - चराचर जगत की आत्मा भारतीय मनीषियों ने उद्घोष किया था— “सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च” अर्थात् सूर्य इस चराचर जगत की आत्मा है। यह केवल एक धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि एक वैज्ञानिक सत्य है। संपूर्ण सौरमंडल की ऊर्जा, पृथ्वी का जीवन चक्र और मनुष्य की शारीरिक-मानसिक चेतना इसी एक शक्तिपुंज पर टिकी है। इसी शक्ति की आराधना का महापर्व है ‘छठ’, और विशेषकर ‘चैती छठ’, जो ऋतु परिवर्तन के संधिकाल में हमें प्रकृति के साथ तादात्म्य बिठाना सिखाता है। बिहार की भूमि, जिसे वेदों में 'कीकट' कहा गया, सूर्योपासना की वह आदि-प्रयोगशाला है जहाँ से यह परंपरा निकलकर पूरे विश्व में 'सप्तद्वीपों' तक विस्तारित हुई। कीकट की आदि-चेतना: जहाँ से सूर्योदय हुआ । ऋग्वेद में जिस 'कीकट' प्रदेश का उल्लेख है, वह आज का मगध ही है। उस काल में यहाँ के निवासी 'व्रात्य' कहलाते थे। वेदों के अनुसार, कीकट के लोग प्रकृति के सीधे संपर्क में थे। वे किसी भव्य मंदिर के बजाय नदियों के संगम और पर्वतों की चोटियों पर सूर्य की किरणों का स्वागत करते थे। कीकट कालीन सूर्योपासना का मूल मंत्र था— “ॐ चित्रं देवानामुदगादनीकं...”। इस मंत्र में सूर्य को 'देवताओं का विलक्षण समूह' माना गया है। कीकट के ऋषियों ने सबसे पहले यह पहचाना कि सूर्य की किरणें केवल प्रकाश नहीं देतीं, बल्कि वे जल के साथ मिलकर 'अर्क' (औषधि) बन जाती हैं। यही कारण है कि आज भी हम सूर्य पूजा को 'अर्क' या 'अर्घ्य' देना कहते हैं।. महाराजा प्रियव्रत: वैश्विक सूर्य-संस्कृति के सूत्रधार पौराणिक इतिहास में स्वायंभुव मनु के पुत्र महाराजा प्रियव्रत का स्थान अद्वितीय है। उन्होंने ही पृथ्वी को सात द्वीपों (जम्बू, प्लक्ष, शाल्मली, कुश, क्रौंच, शाक और पुष्कर) में विभाजित किया था। सौर सांप्रदाय का राजा प्रियव्रत के बारे में कथा है कि उन्होंने अपने दिव्य रथ से पृथ्वी की सात बार परिक्रमा की थी। उनके रथ के पहियों के निशान से समुद्र बने और भूमि द्वीपों में बँट गई। यह कथा संकेत देती है कि प्रियव्रत ने ही सूर्य की किरणों के पृथ्वी पर पड़ने वाले प्रभाव (Latitude/Longitude) के अनुसार मानव संस्कृति का विस्तार किया। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि 'शाकद्वीप' जैसे क्षेत्रों में सूर्योपासना की ऐसी पद्धति विकसित हो जो वैज्ञानिक और खगोलीय गणनाओं पर आधारित हो।
आज जब हम चैती छठ मनाते हैं, तो हम अनजाने में महाराजा प्रियव्रत द्वारा स्थापित उसी वैश्विक व्यवस्था का स्मरण करते हैं, जिसने पूरे विश्व को एक सूत्र में पिरोया था। . शाकद्वीप से मगध का महाप्रवास: 'मगा' परंपरा - मगध की सूर्योपासना के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण मोड़ 'शाकद्वीपीय ब्राह्मणों' (मगा) का आगमन है। भविष्य पुराण के अनुसार, जब भगवान कृष्ण के पुत्र साम्ब को असाध्य कुष्ठ रोग हुआ, तब नारद मुनि ने उन्हें शाकद्वीप से सूर्य-उपासक ब्राह्मणों को बुलाने की सलाह दी। ये 'मगा' ब्राह्मण सूर्य-विज्ञान, आयुर्वेद और खगोलशास्त्र के प्रकांड विद्वान थे। उन्होंने मगध की धरती पर कदम रखते ही यहाँ की भक्ति धारा को एक वैज्ञानिक आधार प्रदान किया। उन्होंने ही सूर्य की मूर्ति-पूजा का विधान शुरू किया। मगध के जनपदों (गया, औरंगाबाद, पटना, नालंदा) में आज जो प्राचीन सूर्य मूर्तियाँ मिलती हैं, जिनमें भगवान सूर्य 'उपानह' (जूते) पहने और 'अव्यंग' (कमरबंद) धारण किए हुए हैं, वह इसी शाकद्वीपीय कला का प्रतीक है।
जरासंध का साम्राज्य: शक्ति और विजय की उपासना - इतिहासकार प्रायः जरासंध को केवल एक क्रूर शासक या शिवभक्त के रूप में देखते हैं, लेकिन मगध सम्राट जरासंध की शक्ति का एक गुप्त आधार 'सूर्योपासना' भी था। जरासंध के काल में मगध एक अखंड साम्राज्य बना।जरासंध ने 'बड़गाँव' (नालंदा) और 'राजगीर' के क्षेत्रों में विशाल सूर्य केंद्रों को राजकीय संरक्षण दिया। उनके साम्राज्य में यह मान्यता थी कि जो सैनिक उदयगामी और अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देता है, उसका शरीर वज्र के समान हो जाता है। जरासंध के पुत्र सहदेव ने भी इसी परंपरा को आगे बढ़ाया। महाभारत युद्ध के बाद जब मगध की सत्ता पुनर्स्थापित हुई, तब भी सूर्योपासना ही यहाँ की जनता को जोड़ने वाली एकमात्र शक्ति बनी रही। मगध के जनपदों में सूर्य-चेतना का भूगोल मगध के कोने-कोने में सूर्य देव के जीवंत प्रमाण आज भी पत्थरों और तालाबों के रूप में विद्यमान हैं: गया का सुर्य मंदिर , सूर्यकुण्ड , विरची नारायण विष्णु आदित्य जहानाबाद का बराबर स्थित सूर्यांक गिरी , काको , औरंगाबाद (देव): यहाँ का त्रेतायुगीन मंदिर स्थापत्य का चमत्कार है। यह पश्चिमाभिमुख है, जो अस्ताचलगामी सूर्य (संध्या अर्घ्य) के महत्व को रेखांकित करता है। औरंगाबाद (देवकुंड) arval का मदसरवा : ऋषि च्यवन और राजा गय की स्मृति से जुड़ा यह स्थान आज भी श्रद्धालुओं के लिए आरोग्य का केंद्र है। नवादा (हंडिया): यहाँ के सूर्य मंदिर का जल आज भी चर्म रोगों के लिए चमत्कारिक माना जाता है। नालंदा (बड़गाँव): राजा साम्ब की तपस्थली, जहाँ चैती छठ का मेला लघु-कुंभ का स्वरूप ले लेता है।पटना (उलार और पंडारक): साम्ब द्वारा स्थापित १२ अर्क स्थलों में से ये दो मगध के गौरव हैं।
चैती छठ का चार दिवसीय विधान: एक आध्यात्मिक यात्रा - चैती छठ केवल एक व्रत नहीं, बल्कि स्वयं को प्रकृति के अनुकूल ढालने की प्रक्रिया है। नहाय-खाय: यह शरीर की बाहरी और आंतरिक शुद्धि है। खरना: यह 'रसियाव' (गुड़ की खीर) के माध्यम से पृथ्वी के मीठे अंश को ग्रहण करने और उपवास की शक्ति संचित करने का दिन है। संध्या अर्घ्य: यह इस दर्शन का प्रतीक है कि जो अस्त होता है, उसका सम्मान ही उदय का मार्ग प्रशस्त करता है। उषा अर्घ्य: यह नई ऊर्जा और संकल्प के साथ जीवन की नई शुरुआत है।
आधुनिक विज्ञान भी अब मानता है कि छठ के दौरान सूर्य की किरणों का जल के माध्यम से अपवर्तन (Refraction) आंखों के रेटिना और पीनियल ग्रंथि को सक्रिय करता है। आयुर्वेद के अनुसार, चैत्र माह में जब पित्त और कफ का असंतुलन होता है, तब यह व्रत और सूर्य की किरणें 'कायाकल्प' का कार्य करती हैं। ज्योतिष शास्त्र में सूर्य को 'कारक' माना गया है— आरोग्य, प्रतिष्ठा और पिता का। इसकी उपासना से कुंडली के समस्त ग्रह दोष शांत हो जाते हैं । विरासत का संरक्षण में आज जब हम आधुनिकता की अंधी दौड़ में अपनी जड़ों को भूल रहे हैं, तब 'चैती छठ' और मगध के ये प्राचीन केंद्र हमें याद दिलाते हैं कि हमारी संस्कृति कितनी वैज्ञानिक और वैश्विक रही है। शाकद्वीप से लेकर कीकट तक, और प्रियव्रत से लेकर जरासंध तक, सूर्य की यह रश्मि हमारे रक्त में बह रही है। बिहार की इस विस्मृत विरासत को पुनः जाग्रत करें। इन मंदिरों का जीर्णोद्धार और इस गौरवमयी इतिहास का प्रचार-प्रसार ही हमारे पूर्वजों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।“एहि सूर्य सहस्त्रांशो तेजोराशे जगत्पते। अनुकम्पय मां भक्त्या गृहाणार्घ्यं दिवाकर॥”
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