वायु ,पवन और वायुमंडल
जय प्रकाश कुवंर
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से वायु अथवा हवा रंगहीन, गंधहीन एवं स्वादहीन होती है, जिसको हमलोग देख नहीं पाते हैं, केवल अनुभव करते हैं। यह अदृश्य गैसों का एक मिश्रण है तथा एक भौतिक पदार्थ है।
इसमें नाइट्रोजन,ऑक्सीजन तथा अन्य गैसें समाहृत हैं। इस कारण हवा में भार अथवा वजन होता है और आयतन होता है। यानि हवा जगह घेरती है।
वायु अथवा हवा से ही वायुमंडल बनता है, जो पृथ्वी को चारों ओर से घेरे हुए है। हवा के बिना जीवन संभव नहीं है। पृथ्वी पर सभी प्राणियों के सांस लेने के लिए वायु का होना अत्यंत आवश्यक है।
अक्सर हमलोग हवा और पवन को एक ही मानते हैं और उनका प्रयोग एक जैसा ही करते हैं परंतु हवा और पवन में अंतर होता है। हवा वायुमंडल में फैली हुई है और स्थिर है। परंतु वही हवा जब चलती है तब उसे पवन कहा जाता है। हवा हमेशा उच्च दबाव से निम्न दबाव की ओर बहती है, जो दबाव सूर्य के प्रकाश तथा उष्णता के कारण बनता है।
साधारणतया हमलोग वायु को एक प्रकार का ही जानते हैं। तथा ज्यादा से ज्यादा गर्म हवा एवं शर्द हवा के रूप में मानते हैं। परंतु हमारे धर्मशास्त्रों एवं अध्यात्मिक विज्ञान के अनुसार वायु के ४९ प्रकार हैं।
श्रीराम भक्त हनुमान जी के पास अष्ट सिद्धि और नव निधियों के साथ ४९ मरुत की शक्तियों का भी संग्रह था, जिसका उपयोग हनुमान जी ने राम रावण युद्ध के समय लंका दहन के लिए किया था। जिसका उल्लेख संत तुलसीदास जी ने श्रीरामचरितमानस के सुंदरकांड में कुछ इस प्रकार किया है :
हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास।
अट्टहास करि गर्जा कपि बढ़ि लाग आकास।।
हनुमान जी को हिन्दू धर्मशास्त्रों के अनुसार पवनसुत तथा मारुति नंदन माना जाता है। मरुत को वैदिक हिन्दुधर्म में वायु के ४९ प्रकार को तथा देवता के रूप में माना जाता है।
मरुत का जन्म ऋषि कश्यप और दिति के संतान के रूप में हुआ था। धर्मशास्त्रों के अनुसार दिति एक ऐसे पुत्र को जन्म देना चाहती थी जो देवराज इन्द्र को हरा सके। इस बात की जानकारी होने पर इन्द्र ने दिति के गर्भ में पल रहे भ्रूण को बज्र से पहले ७ टुकड़ों और फिर उन ७ टुकड़ों को पुनः ७-७ टुकड़ों में काट दिया, जिससे ४९ दिव्य मरुत ( वायु देवता ) उत्पन्न हुए।
हमलोग जिस वायु को एक तथा गर्म शर्द के रूप में जानते हैं वह पौराणिक मान्यताओं के अनुसार ४९ मरुतगण माने गए हैं तथा उन्हें इन्द्र का सैनिक माना जाता है। यानि ऐसे कहें तो पवन अथवा वायु एक नहीं बल्कि ७ हैं, जिनका वर्णन वेदों में मिलता है। वो ७ वायु ये हैं :-
१ . प्रवह - पृथ्वी के उपर स्थित वायु
२. आवह :- सूर्य मंडल से बंधी हुई वायु
३. उद्वह :- चन्द्र लोक में स्थित वायु
४. संवह :- नक्षत्र मंडल में स्थित वायु
५. विवह :- ग्रह मंडल में स्थित वायु
६. परिवह :- सप्तर्षि मंडल में स्थित वायु
७. परावह :- ध्रुव मंडल में स्थित वायु।
इन्हीं सातों वायु के प्रत्येक के सात सात उप- गण मिलकर ४९ प्रकार के पवन ( वायु ) बनते हैं, जिसे मरुत कहा जाता है और ये हनुमान जी के शक्तियों के रूप में प्रसिद्ध हैं।
जिस समय हनुमान जी ने लंका में आग लगाई थी उस समय यही ४९ पवन यानि हनुमान जी की ये शक्तियां अपना काम कर रहीं थी, जिससे उन्होंने लंका को उलट पलट कर जला दिया था। जिसका वर्णन संत तुलसीदास जी ने श्रीरामचरितमानस में सुंदरकांड में किया है।
इसलिए यह कहना अनुचित नहीं होगा की वायु अथवा पवन जिसे विज्ञान एक कहता है और भौतिक पदार्थ मानता है वह मात्र एक भौतिक पदार्थ ही नहीं है, बल्कि वायु एक देवता हैं जिनके वगैर धरती पर जीवन संभव नहीं है। इनके ४९ प्रकार पूरे ब्रह्माण्ड को नियंत्रित करने का काम करते हैं और पृथ्वी पर जीवन का संचालन करते हैं।
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