"सवेरा : एक अंत:संवाद"
पंकज शर्माहर सवेरा
मेरे भीतर
एक अप्रकाशित प्रश्न-सा उतरता है—
जैसे अस्तित्व स्वयं
अपने होने का औचित्य पूछ रहा हो,
और मैं
मात्र साक्षी बना रहता हूँ।
यह जो उजाला है—
क्या सचमुच बाहर से आता है?
या यह वही सवेरा है
जो चेतना की तहों में
धीरे-धीरे अर्थ खोलता है?
अंधकार
अब अभाव नहीं लगता,
वह एक आवरण है
जिसके भीतर
हर सवेरा
अपनी पहली धड़कन साधता है।
मैंने देखा है—
रात की अंतिम निस्तब्धता में
एक सूक्ष्म कंपन उठता है,
वही तो है सवेरा
जो शब्दों से पहले
अनुभूति में जन्म लेता है।
मार्ग की कठिनता या सहजता
अब निर्णायक नहीं—
निर्णायक यह है
कि मैं किस सवेरे को चुनता हूँ:
बाहरी प्रकाश
या भीतर का उद्घाटन।
जब आकाश
अपने विस्तार में ढँक जाता है,
मैं अपने मौन से पूछता हूँ—
क्या यह प्रतीक्षा है सवेरे की,
या भीतर का जड़त्व?
दिन का उजाला
अब चकाचौंध नहीं करता,
क्योंकि मैंने जाना है—
हर सवेरा
पहले आत्मा में घटित होता है,
फिर जगत में।
अंततः
मैं यह स्वीकार करता हूँ—
कोई रात अंतिम नहीं,
हर विराम के भीतर
एक अनिवार्य सवेरा छिपा है,
जो मुझे
मुझ तक लौटाता है।
. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️ "कमल की कलम से"✍️ (शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
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