ढुंढा राक्षसी का अंत: अनादि काल से आधुनिक विज्ञान तक
सत्येंद्र कुमार पाठक
भारतीय वास्तुकला, इतिहास और पुराणों के पन्नों में कई ऐसी कथाएँ दबी हुई हैं, जो केवल कहानियाँ नहीं बल्कि तत्कालीन समाज की चिकित्सा पद्धति, सुरक्षा व्यवस्था और मनोवैज्ञानिक उपचार का आधार थीं। इन्हीं में से एक अत्यंत प्रभावशाली और रहस्यमयी प्रसंग है—राक्षसी ढुंढा का अंत और होली के हुड़दंग का रहता है। भविष्य पुराण और स्थानीय लोक कथाओं) के अनुसार, ढुंढा का संबंध रामायण काल से भी पूर्व के राक्षस वंश से जुड़ा है। राक्षस राज माली सुमाली और माल्यवान भाई थे, जिन्होंने लंका बसाई थी। माली भगवान विष्णु के हाथों पराजित हुआ था। राक्षस संस्कृति का राजा माली की पत्नी का नाम 'वसुदा' (कुछ स्थानों पर 'नर्मदा' का उल्लेख भी मिलता है) था। तंत्र साहित्यों के अनुसार उसने अविवाहित रहकर शिव की तपस्या की थी। कुछ लोक कथाओं में उसे 'अंधकासुर' के कालखंड की एक शक्तिशाली तांत्रिक स्त्री के रूप में भी देखा गया है, जिसने विवाह के स्थान पर 'अमोघ शक्ति' को चुना। त्रेतायुग के आरंभिक काल का माना जाता है, हालांकि इसका प्रभाव द्वापर और वर्तमान कलियुग की लोक-परंपराओं में जीवंत है।
ढुंढा का प्रभाव क्षेत्र केवल स्वर्ग या पाताल नहीं, बल्कि मध्य भारत और पश्चिम भारत का धरातल रहा है।
राजस्थान का ढुंढाड़ क्षेत्र - ऐतिहासिक रूप से, जयपुर और उसके आसपास के क्षेत्र (दौसा, टोंक) को आज भी 'ढुंढाड़' कहा जाता है। इतिहासकारों के अनुसार, इस क्षेत्र का नाम इसी राक्षसी या यहाँ स्थित 'ढुंढ' नामक विशाल टीले के कारण पड़ा। यहाँ की मिट्टी 'धूल' प्रधान है, जिसे स्थानीय भाषा में 'ढुंढ' कहा जाता है। लोक मान्यता है कि ढुंढा इसी धूल के बवंडर में छिपकर बच्चों पर प्रहार कर ढुंढाड़ के कछवाहा शासकों के आने से पूर्व यहाँ मीणा और गुर्जर समुदायों का शासन था। उन प्राचीन समुदायों में होली पर 'ढुंढ' पूजने की परंपरा इस बात का ऐतिहासिक साक्ष्य है कि यह क्षेत्र कभी उस राक्षसी के प्रभाव में था, जिसे सामूहिक 'कोलाहल' से मुक्त कराया गया।
. शिव का वरदान और 'ध्वनि युद्ध' की युक्ति ढुंढा ने भगवान शिव की घोर तपस्या कर यह वरदान प्राप्त किया था कि उसे देव, दानव, मानव या कोई भी अस्त्र-शस्त्र न मार सके। वह अदृश्य होने की विद्या में निपुण थी। जब उसने इस शक्ति का दुरुपयोग कर ऋषियों के आश्रमों और गांवों के बच्चों को बीमार करना शुरू किया, तब भगवान शिव ने इसके अंत का एक 'मनोवैज्ञानिक मार्ग' बताया।
भगवान शिव ने विधान किया:"यह राक्षसी अस्त्रों से नहीं मरेगी, बल्कि यह 'सामूहिक उल्लास' और 'अट्टहास' से पराजित होगी। जहाँ बच्चे निडर होकर शोर मचाएंगे, गालियां (प्रतीकात्मक रूप से बुराई को कोसना) देंगे और ढोल पीटेंगे, वहाँ इसकी तंत्र शक्ति छिन्न-भिन्न हो जाएगी।" इसी कारण होली पर 'हुड़दंग' की परंपरा शुरू हुई। यह अनुशासनहीनता नहीं, बल्कि एक 'साउंड बैरियर' (ध्वनि अवरोध) तै। आज का आधुनिक विज्ञान भी इस प्राचीन कथा के पीछे छिपे स्वास्थ्य संबंधी तथ्यों को स्वीकार करता है।
होली का समय ऋतु परिवर्तन (सर्दियों की विदाई और गर्मियों का आगमन) का होता है। इस संधि काल में वातावरण में बैक्टीरिया और कीटाणु पनपते हैं। प्राचीन काल में माना जाता था कि ढोल, नगाड़ों और शंख की तीव्र ध्वनि तरंगें सूक्ष्म सूक्ष्मजीवों को नष्ट करने की क्षमता रखती हैं। ढुंढा को उन 'अदृश्य कीटाणुओं' का रूपक माना गया है। ढुंढा बच्चों में 'भय' और 'अवसाद' पैदा करती थी। आधुनिक मनोविज्ञान कहता है कि सामूहिक रूप से चिल्लाने, नाचने और हँसने से मस्तिष्क में एंडोर्फिंस और डोपामिन का स्तर बढ़ता है। यह 'कैथार्सिस' की प्रक्रिया है, जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाती है।
होलिका दहन या ढुंढा दहन के समय जलने वाली अग्नि और उसमें डाली जाने वाली औषधियाँ (कपूर, घी, सूखी लकड़ियाँ) वातावरण को शुद्ध करती हैं। ढुंढा की कथा का सबसे बड़ा सामाजिक संदेश 'एकजुटता' है। वर्ग-भेद का अंत: इस राक्षसी को भगाने के लिए समाज के हर वर्ग के बच्चे एक साथ आते हैं। इसमें कोई छोटा-बड़ा नहीं होता। सामूहिक प्रतिकार: यह कथा सिखाती है कि जब शत्रु अदृश्य (जैसे महामारी या सामाजिक बुराई) हो, तो उससे अकेले नहीं, बल्कि पूरे समाज को मिलकर लड़ना पड़ता है। ढुंढोत्सव की रस्म: आज भी परिवारों में जब नए शिशु का जन्म होता है, तो पहली होली पर 'ढुंढ' मनाना सामाजिक उत्सव का रूप ले चुका है, जो परिवार के नए सदस्य के लिए सुरक्षा की सामूहिक प्रार्थना है। बच्चों के गले में गाय की गोबर से बनाई गई उपला को माला बनाकर डालने के बाद बच्चे द्वारा पहने उपला माला को फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा होलिकादहन के पूर्व होलिका स्थल पर डालते है ।
वैश्विक परिप्रेक्ष्य में यह केवल भारत की कहानी नहीं है। विश्व भर में 'शोर' और 'उत्सव' के माध्यम से बुराई को भगाने के साक्ष्य मिलते हैं: चीन: 'न्यान' राक्षस को भगाने के लिए लाल रंग और पटाखों के शोर का प्रयोग। यूरोप: सर्दियों के अंत में 'क्रैम्पस' डरावने पात्रों को शोर मचाकर दूर करना। जापान: 'सेत्सुबुन' उत्सव में शोर मचाकर राक्षसों (ओनी) को भगाना और सुख-शांति का आह्वान करना है।ढुंढा राक्षसी का अंत हमें यह शाश्वत संदेश देता है कि नकारात्मकता, अवसाद और बीमारी का सबसे बड़ा शत्रु 'आनंद' है। जहाँ उल्लास होता है, वहाँ तंत्र-मंत्र और नकारात्मक शक्तियां स्वतः ही समाप्त हो जाती हैं।होली का हुड़दंग, ढोल की थाप और बच्चों की वह निश्छल हँसी दरअसल एक प्राचीन 'रक्षा कवच' है जिसे हमारे पूर्वजों ने बड़े ही वैज्ञानिक ढंग से धर्म और लोक-परंपरा से जोड़ दिया था। अतः, होली पर बच्चों का मस्ती करना केवल खेल नहीं, बल्कि विश्व-कल्याण और स्वास्थ्य की एक प्राचीन पद्धति है।
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