राजा अथवा राष्ट्रपति की योग्यताएं
मनुस्मृति के सातवें अध्याय में महर्षि मनु के द्वारा राजधर्म विषय पर विस्तृत प्रकाश डाला गया है। यह सातवां अध्याय संसार के सभी देशों के लिए और संसार के उन सभी संविधान विशेषज्ञों के लिए एक चुनौती है जो यह मानते हैं कि प्राचीन काल में कहीं पर भी कोई ऐसी राज्य व्यवस्था लागू नहीं थी जो लोगों को लोकतांत्रिक अधिकार प्रदान करती थी और उनके समग्र कल्याण की योजना पर कार्य करती थी। मनु को पढ़ते ही इस प्रकार की सोच रखने वाले लोगों के सारे दावे झूठे सिद्ध हो जाते हैं, क्योंकि महर्षि मनु ने मनुस्मृति के अंतर्गत राजधर्म की विस्तृत व्याख्या की है। राजधर्म के हर बिंदु को बड़ी स्पष्टता और पारदर्शिताओं के साथ छूने का सफल प्रयास किया है। जो लोग मनु की मनुस्मृति को लेकर पूर्वाग्रह रखते हैं वे मनुस्मृति को पढ़ना ही नहीं चाहते। अपने दावों की हवा बनाए रखने के लिए ही ऐसे लोग संसार के लोगों को मनु की ओर जाने नहीं देते। उनका हरसंभव प्रयास होता है कि मनु की ओर आंख उठाकर भी न देखा जाए और हमें ही संसार का सबसे बड़ा विचारक और राजनीतिशास्त्री माना जाए। यह एक जिद है। दुराग्रह है। जिसे आप एक मूर्खतापूर्ण जिद के अतिरिक्त कुछ नहीं कह सकते।
महर्षि मनु ने जिन तीन सभाओं की व्यवस्था की है, उनका सभाध्यक्ष उन्होंने राजा को घोषित किया है। सभा में जाने वाले सभासद भी विद्वान होने चाहिए। हर किसी को सभा में जाने का अधिकार नहीं होता था। जिनका चिंतन अत्यंत ऊंचा और पवित्र होता था वही सभासद बनने की योग्यता रखते थे । जिनका चरित्र उज्जवल होता था और जिनकी सोच में मानवतावाद होता था ,उनको ही सभासद बनने का अवसर मिलता था। यही लोकतंत्र का आधार होता है, जिसमें योग्यता को ही प्राथमिकता दी जाती है। यहां चमत्कार को ( अर्थात ढोंग और पाखंड को नमस्कार ) नहीं होता। आज राजनीति में ऐसे अनेक नौटंकीबाज मिलते हैं जो अपने ढोंग और पाखंड से कुछ चमत्कार का नाम देते हैं और लोग उन्हें नमस्कार करते हैं।
राजा तीनों सभाओं का सभाध्यक्ष
महर्षि मनु संसार के एकमात्र ऐसे आदि व्यवस्थापक हैं, जिन्होंने इन तीनों सभाओं के सभाध्यक्ष अर्थात राजा के भीतर भी कुछ विशिष्ट गुणों की चर्चा की है अर्थात राजा के भीतर यदि ये गुण नहीं हैं तो वह इन सभाओं का अध्यक्ष होने की योग्यता नहीं रखता। आज के संविधानों में 8 गुणों की बात तो छोड़िए इनमें से एक गुण की आवश्यकता नहीं समझी गई है।
राजा के आठ विशिष्ट गुण-
इन्द्राऽनिलयमार्काणामग्नेश्च वरुणस्य च।
चन्द्रवित्तेशयोश्चैव मात्रा निर्हत्य शाश्वतीः ॥ ४॥ (४)
महर्षि मनु ने कहा है कि " वह सभेश राजा इन्द्र अर्थात् विद्युत के समान शीघ्र ऐश्वर्यकर्त्ता, वायु के समान सब को प्राणवत् प्रिय और हृदय की बात जाननेहारा, पक्षपातरहित न्यायाधीश के समान वर्त्तनेवाला, सूर्य के समान न्याय, धर्म, विद्या का प्रकाशक, अन्धकार अर्थात् अविद्या अन्याय का निरोधक हो। वह अग्नि के समान दुष्टों को भस्म करनेहारा, वरुण अर्थात् बांधनेवाले के सदृश दुष्टों को अनेक प्रकार के दण्ड देकर बांधनेवाला, चन्द्र के तुल्य श्रेष्ठ पुरुषों को आनन्ददाता, धनाध्यक्ष के समान कोशों का पूर्ण करने वाला सभापति होवे। राजा में यह गुण भी होना चाहिये कि वह सूर्यवत् प्रतापी व सब के बाहर और भीतर मनों को अपने तेज से तपाने वाला हो। वह राजा ऐसा हो कि जिसे पृथिवी में वक्र दृष्टि से देखने को कोई भी समर्थ न हो। राजा ऐसा हो कि जो अपने प्रभाव से अग्नि, वायु, सूर्य, सोम, धर्मप्रकाशक, धनवर्द्धक, दुष्टों का बंधनकर्त्ता तथा बड़े ऐश्वर्यवाला होवे, वही सभाध्यक्ष, सभेश वा राजा होने के योग्य है।"
स्वामी दयानंद जी का कथन
स्वामी दयानंद जी महाराज ने सत्यार्थ प्रकाश में इस श्लोक का अर्थ करते हुए लिखा है कि - " यह सभेश राजा इन्द्र अर्थात् विद्युत् के समान शीघ्र ऐश्वर्यकर्त्ता, वायु के समान सबको प्राणवत् प्रिय और हृदय की बात जानने हारा, यम पक्षपातरहित न्यायाधीश के समान वर्त्तने वाला, सूर्य के समान न्याय, धर्म, विद्या का प्रकाशक, अन्धकार अर्थात् अविद्या अन्याय का निरोधक, अग्नि के समान दुष्टों को भस्म करने हारा, वरुण अर्थात् बांधने वाले के सदृश दुष्टों को अनेक प्रकार से बांधने वाला, चन्द्र के तुल्य श्रेष्ठ पुरुषों को आनन्ददाता, धनाध्यक्ष के समान कोशों का पूर्ण करने वाला सभापति होवे।" (स०प्र०, समु० 6)
इन सारे विशिष्ट गुणों के बारे में पढ़कर निश्चय ही महर्षि मनु की बौद्धिक क्षमता के समक्ष हृदय नतमस्तक हो जाता है। वह सृष्टि के आदि राजा हैं। जिस काल को संसार के तथाकथित राजनीतिशास्त्री और इतिहास विशेषज्ञ अंधकार का काल समझते हैं, उस काल में भी इतनी ऊंची आदर्श व्यवस्था की स्थापना महर्षि मनु कर रहे हैं तो स्पष्ट है कि भारत को ही नहीं संसार के सभी लोगों को उन पर गर्व होना चाहिए।
डॉ सुरेंद्र कुमार जी ने उपरोक्त श्लोक की व्याख्या करते हुए राजा के आठ गुणों का बहुत सुंदर वर्णन किया है :-
अनुशीलन - राजा के आठ विशिष्ट गुणों की व्याख्या- (क) महर्षि मनु ने इस श्लोक में कहा है कि राजा को आठ विशिष्ट गुणों से युक्त होना चाहिए। जैसे श्लोकोक्त आठ ईश्वरीय दिव्यशक्तियों का कार्य या स्वभाव है, वैसा ही राजा का स्वभाव और आचरण होना चाहिए। मनु ने 9.303 से 311 श्लोकों में स्वयं इन गुणों की व्याख्या की है, जो निम्न प्रकार -अपनी प्रजाओं को सुख-सुविधाएं, ऐश्वर्य प्रदान करे। उनकी कामनाओं को पूर्ण कर सन्तुष्ट रखे (9.304) । [इदि परमैश्वर्ये भ्वादि धातु से 'ऋजेन्द्राग्नवज्र' (उणादि 2.28) सूत्र से 'रन्' प्रत्यय के योग से 'इन्द्र' शब्द सिद्ध होता है।' इन्दतेर्वा ऐश्वर्यकर्मणः' (निरुक्त 10.8)= (1) इन्द्र [= वृष्टिकारक शक्ति या विद्युत्] जैसे भरपूर जल बरसाकर जगत् को तृप्त करता है, वैसे राजा ऐश्वर्यप्रदाता होने से इन्द्र कहलाता है। मनु० 7.7 श्लोक में इसके पर्यायवाची रूप में 'महेन्द्र' का प्रयोग है।
(2) वायु - जैसे वायु सब प्राणियों, स्थानों में प्रविष्ट होकर विचरण करता है, उसी प्रकार राजा को अपने गुप्तचरों द्वारा सर्वत्र प्रविष्ट होकर सब स्थानों की, अपनी तथा शत्रु की प्रजाओं की बातों की जानकारी रखनी चाहिए [ 9.306 ] | [ वायुः वा गतिगन्धनयोः अदादि धातु 'वायुर्वातेर्वैतेर्वा स्याद् गतिकर्मणः' (निरुक्त 10.1)]। में 9.306 श्लोक में 'मारुत' का प्रयोग है। कृवापाजि०' (उणादि 1.1) सूत्र से 'उः प्रत्यय ।
(3) यम [ = ईश्वर की मारक या नियन्त्रक शक्ति] जैसे यम-ईश्वर कर्मफल का समय आने पर श्रेष्ठ और दुष्ट सबको धर्मपूर्वक अर्थात् न्यायानुसार दण्डित करता है या मारता है, उसी प्रकार राजा को भी अपराध करने पर अपने वा पराये सभी को न्यायपूर्वक दण्ड देना चाहिए और उनको अपने नियन्त्रण में रखना चाहिए [9.307] । 7.7 श्लोक में मनु ने यम का' धर्मराट्' पर्यायवाची ग्रहण किया है। धर्म अर्थात् न्यायपूर्वक शासन करने वाला 'धर्मराट्' होता है। ['यमु उपरमे' भ्वादि धातु से कर्त्तरि पचाद्यच्। "यमः यच्छतीति सतः" (निरु० 10.19)]।
(4) अर्क सूर्य जैसे प्रकाश से अन्धकार को नष्ट करता है उसी प्रकार राजा अज्ञान-अविद्या निवारक हो तथा जैसे सूर्य अपनी किरणों द्वारा बिना संतप्त किये जलग्रहण करता है, उसी प्रकार राजा भी प्रजा को कष्ट और हानि पहुंचाये बिना (7.137-139 ) अपने अधिकारों के द्वारा शास्त्रोक्त कर ग्रहण करे (9.305)। [अर्च- पूजायाम् भ्वादि धातु से 'कृदाधारार्चिकलिभ्यः कः' (उणादि पर्यायवाची रूप में 'आदित्य' का प्रयोग है। 3.40) सूत्र से 'कः' प्रत्यय]। मनु० 9.305 श्लोक में
शुद्धि करने वाली और तेजयुक्त होती है, उसी प्रकार राजा (5) अग्नि- जैसे अग्नि अशुद्धि का नाश करके अपराध, हानि एवं दुष्टता करने वालों तथा प्रजा को पीड़ित करने वालों को प्रभावशाली ढंग से सन्तापित करने वाला, भयभीत करने वाला एवं दण्ड से सुधारने वाला होवे (9.310)। [अगि गतौ धातु से "अङ्गेर्नलोपश्च (उणादि 4.50)
(6) वरुण-जल जैसे अपने तरंग या भंवररूपी पाश में प्राणियों को फंसा लेता है, उसी प्रकार राजा अपराधियों और शत्रुओं को बन्धन या कारागार में डाले (9.308) । [वृञ्-वरणे स्वादि धातु से कृवृदारिभ्य उनन्' (उणादि 3.53) सूत्र से 'उनन्' प्रत्यय]।
(7) चन्द्र- मनु ने कहा है कि राजा पिता के समान होता है और प्रजा पुत्रवत् होती है। राजा को प्रजाओं से पितृवत् व्यवहार करना चाहिए- "वर्तेत पितृवत् नृषु" [7.80] जैसे चन्द्र शीतलता प्रदान करता और पूर्णिमा के चांद को देखकर जैसे हृदय में प्रसन्नता होती है, उसी प्रकार राजा प्रजाओं को शान्ति तथा प्रसन्नता प्रदान करने वाला होवे। ऐसे राजा के रूप में पाकर प्रजा को हर्ष का अनुभव हो (9.309)। [चदि आह्लादने दीप्तौ च ध्वादिधातु से 'स्फायितञ्जिवञ्चि०' (उणादि 2.13) सूत्र से 'रक्' प्रत्यय ।] मनु० 7.7 श्लोक में 'सोम' चन्द्र का पर्यायवाची है।
(8) वित्तेश अर्थात् ऐश्वर्यवान्। मनु० 7.7 श्लोक में कुबेर और 9.311में इसके पर्यायवाची के रूप में 'धरा' 'पृथ्वी' शब्दों का ग्रहण है। जैसे धरती या धनस्वामी परमेश्वर समान भाव से सब प्राणियों का पालन-पोषण करते हैं, उसी प्रकार राजा पक्षपातरहित होकर समानभाव से प्रजाओं का पुत्रवत् पालन करे (9.311)।
महर्षि मनु की व्यवस्था चलती तो....
यदि महर्षि मनु की व्यवस्था के अनुसार संसार की राज्य व्यवस्था चलती तो कहीं पर भी लोकतंत्र के विरुद्ध कोई कार्य न हो रहा होता। एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं होता जिसे सत्ता शीर्ष पर पहुंचने का अवसर प्राप्त हो जाता । जिन लोगों के चाल, चरित्र और चेहरे बिगड़े हुए हैं , उन्हें कभी भी राजनीति में जाने तक का अवसर नहीं मिलता। क्योंकि तब राजा के उपरोक्त विशिष्ट गुणों को किसी भी जनप्रतिनिधि को चुनने के लिए आवश्यक शर्त के रूप में सम्मिलित किया जाता । सर्वत्र शांति रहनी स्वाभाविक थी। क्योंकि महर्षि मनु की व्यवस्था के अंतर्गत राजा वही बनेगा, जिसके भीतर उपरोक्त आठ दिव्य गुणों की उपस्थित होगी।
इन दिव्य गुणों से युक्त व्यक्तित्व को ही यदि राजा बनाया जाता है तो उससे किसी भी प्रकार के अत्याचार, अनाचार की अपेक्षा नहीं की जा सकती। स्पष्ट है कि संसार में जितने भर भी अत्याचारी, अनाचारी तानाशाहों या बादशाहों या सुल्तानों ने निरपराध लोगों पर अत्याचार किये वे सारे के सारे राजा की श्रेणी में नहीं आते। उनके अपराधों पर पानी डालने के लिए लोगों ने उनकी झूठी आरती उतारने का कार्य किया है। इतिहास के बड़े-बड़े ग्रंथ उनके लिए बना दिए गए, जबकि महर्षि मनु की दृष्टि से देखा जाए तो पापियों को ऐसा सम्मान मिलना नहीं चाहिए। मानवता के लिए कलंक रहे लोगों को राजपद कभी नहीं मिल सकता और यदि उन्होंने डकैती से राजपद प्राप्त कर लिया है तो उन्हें राजा कभी नहीं माना जा सकता। उन्हें राजा के रूप में डकैत , लुटेरा , अपराधी या बदमाश अवश्य माना जा सकता है। तब निश्चित रूप से भारत के ही नहीं संसार भर के इतिहास के उन पृष्ठों को हमें पढ़ने के लिए विवश नहीं होना पड़ता जो खून से लथपथ हैं।
संसार के सांप्रदायिक शासक
भारत के अतिरिक्त जितने भर भी तानाशाह, सुल्तान और बादशाह संसार में हुए हैं और जिन्होंने संप्रदाय के आधार पर लोगों का रक्त बहाने का पाप किया है, वे सारे के सारे अशिक्षित, कुपढ और मानवता के हत्यारे रहे हैं। इन्होंने अपने आप को इस प्रकार दिखाने का प्रयास किया कि जैसे वे ही संसार में लोगों पर शासन करने के लिए जन्मे हैं। इसलिए उन्हें किसी प्रकार की शिक्षा या विद्या लेने की आवश्यकता नहीं है। इन्हीं पापियों ने उपनिवेशवादी व्यवस्था को लागू किया और संसार का शोषण करने का ठेका लेने के लिए अनेक देशों में नरसंहार किये। मानवता के इन हत्यारों से छुटकारा पाने के लिए अनेक देशों में क्रांतियां हुईं।स्वाधीनता आंदोलन चले और स्वाधीनता के पश्चात लोगों ने अपने-अपने संविधान बनाए।
संसार के भीतर जितने भी प्रचलित संविधान हैं वे सारे के सारे किसी न किसी क्रूर शासन व्यवस्था से मुक्ति के बाद बनाए गए हैं। इन संविधानों के माध्यम से संविधानों के बनाने वालों ने जनता को यह संदेश देने का प्रयास किया कि अब उनके साथ किसी प्रकार का कोई अत्याचार नहीं होगा। इसलिए लोगों ने अपने-अपने देश के संविधान के प्रति श्रद्धा व्यक्त करनी आरंभ की।
परंतु यहीं पर एक बड़ी डकैती पड़ी। जिसकी भनक तक किसी भी देश के जनसाधारण को नहीं हुई। जिन लोगों ने संविधान बनाए थे, उन्हीं लोगों ने संविधान में ऐसे चोर दरवाजे बना दिए ,जिनसे वे स्वयं या उनके उत्तराधिकारी देश पर शासन करने के लिए विशेष अधिकार प्राप्त कर गए। भारत सहित किसी भी देश के संविधान में यह व्यवस्था नहीं की गई कि राजा में ( देश के प्रधानमंत्री अथवा राष्ट्रपति के भीतर राजा बनने के लिए ) उपरोक्त 8 गुण अनिवार्य रूप से होंगे। देश की भोली भाली जनता समझ ही नहीं पाई कि क्या हो गया है और आगे क्या होने वाला है ? संविधान में किसी भी जनप्रतिनिधि के चुनाव के लिए बहुत हल्की योग्यताओं को रखा गया, जिससे हर प्रकार से चोरों को आगे बढ़ने में सुविधा हो सके।
जिस पुरानी व्यवस्था को हटाकर नई व्यवस्था को उसके स्थान पर स्थापित करने का कार्य किया गया था, वह पहले वाली व्यवस्था से भी अधिक दुर्गंधभरी सिद्ध हुई। अब लोगों का दम घुट रहा है। वेद ना होने से सर्वत्र वेदना भरी पड़ी है।
अब हम अपने देश के संविधान पर दृष्टिपात करें। जहां पर देश के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के लिए बताया गया है कि कौन व्यक्ति देश का राष्ट्रपति,प्रधानमंत्री और जनप्रतिनिधि बन सकता है ?
भारत के संविधान के अनुच्छेद 58 के अनुसार
कोई भी व्यक्ति भारत का राष्ट्रपति बन सकता है, यदि वह :-
(क) भारत का नागरिक है,
(ख) पैंतीस वर्ष की आयु पूरी कर चुका है, और
(ग) लोक सभा के सदस्य के रूप में चुनाव के लिए योग्य है।
(2) कोई व्यक्ति राष्ट्रपति के रूप में चुनाव के लिए पात्र नहीं होगा यदि वह भारत सरकार या किसी राज्य सरकार या उक्त सरकारों में से किसी के नियंत्रण के अधीन किसी स्थानीय या अन्य प्राधिकरण के अधीन कोई लाभ का पद धारण करता है।
जहां भारतीय संविधान की धारा 58 राष्ट्रपति बनने के लिए किसी व्यक्ति की योग्यताओं का वर्णन करती है, वहीं धारा 84 किसी व्यक्ति के भारत का प्रधानमंत्री बनने की योग्यता को स्पष्ट करती है। संविधान का यह अनुच्छेद स्पष्ट करता है कि भारत के प्रधानमंत्री बनने के लिए व्यक्ति को भारतीय नागरिक होना चाहिए, कम से कम 25 वर्ष (लोकसभा सदस्य हेतु) या 30 वर्ष (राज्यसभा सदस्य हेतु) आयु पूरी होनी चाहिए। उन्हें संसद के किसी भी सदन का सदस्य होना चाहिए या छह महीने के भीतर बनना होगा। इसके अलावा, केंद्र या राज्य सरकार के तहत किसी भी प्रकार का 'लाभ का पद' नहीं होना चाहिए। यदि नियुक्ति के समय लोकसभा या राज्यसभा का सदस्य नहीं है तो प्रधानमंत्री बनने वाले व्यक्ति को 6 महीने के भीतर संसद सदस्य बनना अनिवार्य होगा।
इसके लिए यह भी अनिवार्य है कि उसे लोकसभा में बहुमत प्राप्त दल का नेता होना चाहिए।
अयोग्यताएं
मानसिक रूप से अस्वस्थ या दिवालिया घोषित होने पर,
किसी भी कानूनी अपराध में दोषी पाये जाने पर और सजायाफ्ता मुजरिम होने पर किसी व्यक्ति को देश का राष्ट्रपति प्रधानमंत्री या लोकसभा अथवा राज्यसभा अथवा किसी राज्य की विधानसभा का सदस्य बनने का अधिकार नहीं होगा। संविधान में राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री सहित किसी भी जनप्रतिनिधि के लिए किसी शैक्षणिक योग्यता को अनिवार्य नहीं किया गया है। आप जानते हैं कि इससे हमें कितनी बड़ी हानि उठानी पड़ी है ? महर्षि मनु ने योग्य लोगों में से योग्यतम को राजा बनने के लिए आदेशित किया। अपने धर्मशास्त्र में उसका विधान किया। उसकी पहली और अनिवार्य योग्यता घोषित की कि राजा योग्यतम से भी योग्यतम हो। ....और हमने राजा की इस अनिवार्य योग्यता को एक झटके में समाप्त कर दिया। पूरे संविधान में कहीं भी यह लिखना उचित नहीं माना कि राजा के भीतर महर्षि मनु द्वारा प्रतिपादित 8 गुण आवश्यक होने चाहिए। यदि ऐसा राजा हमारे पास होता तो चरित्रवान राष्ट्र का निर्माण करने में सक्षम होता। ब्रह्मचर्य के तप से तपते हुए युवा हमारे पास होते , जो एक से एक बढ़कर अनुसंधान के कार्यों में लगे होते। राष्ट्र को महान बनाने की योजनाओं पर काम कर रहे होते । सड़कों को जाम करने वाले युवा भली प्रकार यह समझ पाते कि यदि तुम सड़कों को जाम कर रहे हो या सरकारी संपत्ति को क्षतिग्रस्त कर रहे हो तो इससे हमारे ही राष्ट्र की हानि हो रही है। तब राजनीति के घपले-घोटाले अपने आप समाप्त हो गए होते। राजनीति में जिस प्रकार बार-बार सेक्स कांड उछलते हैं, उस प्रकार की घटनाएं न हो रही होतीं। तब हमारे देश में वेदों पर अनुसंधान होता । वेदों पर डॉक्टरेट की उपाधियां प्रदान की जातीं।
हमारे उपनिषदों और दर्शन शास्त्रों पर और दूसरे ऐसे ही आर्ष ग्रन्थों पर अथवा वैद्यक शास्त्रों पर अनुसंधान हो रहे होते। सर्वत्र सात्विक भाव प्रकट होता। राजसिक और तामसिक भाव के वशीभूत होकर एक दूसरे के प्रति घृणा और द्वेष की सोच समाप्त हो गई होती। संविधान को बनाते समय और संविधान को लागू करते समय हमें अपने भारत को महान बनाने का एक स्वर्णिम अवसर मिला था, जिसे पश्चिम की नकल करने के प्रति समर्पित होकर हमने खो दिया।
हमने लोकतंत्र को " मूर्खों का मूर्खों के द्वारा मूर्खों के लिए शासन सिद्ध कर दिया है। " यहां पर एक बार नहीं, अनेक बार इस तथ्य की पुष्टि हुई है जब सत्ता की लड़ाई के लिए राजनीतिक दलों ने लोकतंत्र को तारतार किया है। जनादेश के साथ खिलवाड़ किया और जनभावना को खूंटी पर टांगकर मनमाना आचरण किया है। नेताओं के इस प्रकार के आचरण को देखकर एक बार नहीं अनेक बार यह सिद्ध हुआ है कि देश के नेताओं के लिए राष्ट्र प्रथम की भावना मर चुकी है और दल प्रथम हो गया है। प्रधानमंत्री को हमारे संविधान के अनुसार लोकसभा में बहुमत दल का नेता होना चाहिए। बहुमत को प्राप्त करने के लिए और अपने साथ बनाए रखने के लिए कई बार देश के नेता को अपना बहुमत सिद्ध करने के लिए या तो रिश्वत देकर सांसद तोड़ने का काम करना पड़ा है या फिर अपने सिद्धांतों से समझौता करना पड़ा है अथवा राष्ट्र हितों की बलि चढ़ानी पड़ी है। इससे लोकतंत्र को कई बार अपयश का पात्र बनना पड़ा है।
हमारे देश में एक मुगलिया काल भी आया है। जिसमें अकबर जैसे अनपढ़ लोग भी बादशाह बने और उन्होंने सांप्रदायिक अत्याचारों की झड़ी लगा दी। स्वतंत्र भारत के कर्णधारों को मुगल काल से कुछ सीखना चाहिए था। उन्हें यह समझना चाहिए था कि यदि अयोग्य लोगों को अपना जनप्रतिनिधि और नेता बनाया गया तो राष्ट्र को उसकी कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है ?
हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि सबसे बड़ा संकट चरित्र का संकट होता है। यदि अयोग्य लोगों को नेतृत्व दिया जाएगा तो
चरित्र के संकट से राष्ट्र को जूझना पड़ेगा। जिसका परिणाम सार्वत्रिक पतन के रूप में देखा जाएगा। चरित्र का यह संकट ही राष्ट्र के लिए सबसे अधिक घातक होता है। जब राजा भौतिक धन को धन समझ लेता है और उसी से अपने खजाने को भरने के लिए प्रजा को लूटने लगता है तो सारी प्रजा भी उसी का अनुकरण करते हुए परस्पर ही लूटपाट आरम्भ कर देती है। आज देश में यही सब कुछ तो हो रहा है।
महर्षि मनु ने इस प्रकार के लोगों को दस्यु कहा है। यदि राजा लुटेरा हो गया है तो उसे भी इसी नाम से पुकारा जाना चाहिए। यदि महर्षि मनु के कहे अनुसार देश के संविधान का निर्माण किया जाता तो इस प्रकार लुटेरी मानसिकता से मुक्ति मिल सकती थी।
म्लेच्छ देशों और दस्युओं के बारे में विचार
डॉ सुरेंद्र कुमार जी "राजर्षि मनु और उनकी मनुस्मृति" के पृष्ठ संख्या 133 पर नामक पुस्तक में लिखते हैं :-
"मालूम होता है कि दस्युओं के भीतर केवल वही दुराचारी लोग सम्मिलित नहीं थे जो अतिमूर्ख होने से 'आर्यवाचः' उस समय की आर्यभाषा अर्थात् संस्कृत के शब्दों को विस्पष्ट उच्चारण नहीं कर सकने के कारण म्लेच्छ भाषा बोलते हों, प्रत्युत दस्युओं के भीतर उन दुराचारियों की भी गणना थी जो आर्यभाषा भली-भाँति बोल भी सकते थे। महर्षि पाणिनि अपने धातुपाठ में लिखते हैं, "म्लेच्छ अव्यक्ते शब्दे" अर्थात् म्लेच्छ धातु का प्रयोग 'अविस्फुट भाषण' अर्थ में होता है जिससे पता लगता है कि जो लोग अतिमूर्ख रहने के कारण संस्कृत शब्दों का ठीक-ठीक उच्चारण नहीं कर सके और संस्कृत-शब्दों को बिगाड़-बिगाड़कर बोलने लगे, उन्हीं की भाषा म्लेच्छ (अविस्फुट) कहलाने लगी। क्योंकि आर्यावत तथा उसके आसपास के स्थानों से भिन्न देशों में संस्कृत का प्रचार वैसा नहीं रह सका जैसा कि आर्यावर्त में तथा इसके आस-पास रहा, इस कारण अन्यान्य देशों में म्लेच्छ-भाषा अधिकतर फैल गई और उसके भी अनेक भेद हो गए। क्योंकि जिस स्थल में जिस वस्तु की अधिकता होती है वह स्थान प्रायः उसी नाम से पुकारा जाता है, यथा जिस ग्राम में अधिक वणिक् हों और ब्राह्मण, क्षत्रिय और शूद्र कम हों तो उस ग्राम को प्रायः वणिकों का ग्राम कहते हैं, उसी प्रकार संस्कृतभाषियों के देश आर्यावर्त तथा उसके आस-पास के स्थानों से भिन्न-भिन्न देशों में म्लेच्छ भाषा (मूर्खों की भाषा) बोलनेवालों की अधिकता के कारण उन देशों का नाम भी म्लेच्छ देश पड़ गया और इसी कारण मनुस्मृति अध्याय 2 श्लोक 23 में लिखा है " म्लेच्छदेशस्ततः परः " अर्थात् आर्यभाषियों के देश से म्लेच्छ देश परे है। क्योंकि दस्युओं के भीतर आर्यभाषी कम और मलेच्छभाषी अधिक थे, इस कारण संभव है कि कालांतर में दस्युओं का नाम म्लेच्छ भी पड़ गया हो।"
डॉ राकेश कुमार आर्य
( लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं)
नोट : लेखक की यह पुस्तक डायमंड पॉकेट बुक्स से प्रकाशित हुई है।

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