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भारत सरकार अधिनियम 1935 और ' इंडिया '

भारत सरकार अधिनियम 1935 और ' इंडिया '

डॉ राकेश कुमार आर्य

'भारत सरकार अधिनियम - 1935' के अंतर्गत भारत के लिए ' इंडिया' लिखा गया तो उसी की नकल करते हुए हमारे संविधान में भी भारत को पहले 'इंडिया' लिखा गया। परिणाम यह निकला कि हम ब्रह्मावर्त , आर्यावर्त और भारतवर्ष से दूर निकलकर 'इंडिया' बसाने में लग गए अर्थात गुलामी की एक नई कहानी हमने लिखनी आरंभ कर दी। दुर्भाग्य से हम इसी कहानी को आज तक लिख रहे हैं।
वर्तमान संविधान ने कहा कि भारत " राज्यों का संघ होगा।" ऐसा लिखकर भी भारत की आत्मा के साथ खिलवाड़ किया गया। हमारी राष्ट्रीय चेतना का अपमान किया गया। हमें राष्ट्रवाद और राष्ट्रबोध से दूर किया गया।
भारत विभिन्न राज्यों की सहमति का परिणाम नहीं है। इसके विपरीत भारत एक सनातन राष्ट्र है, जो पुरानी दुनिया का घर है और वर्तमान में भी सारे संसार को बौद्धिक नेतृत्व देने की क्षमता रखता है। इसे संतरा की फाड़ियों की तरह भी नहीं माना जा सकता ,जहां पर संतरे की हर फाड़ी का अलग अस्तित्व होता है, परन्तु उसका ऊपरी छिलका अर्थात आवरण सबको एक छत के नीचे ढंक लेता है। इसे बेर की भांति भी नहीं माना जा सकता जो भीतर से कठोर होता है अर्थात जिसका केंद्र किसी क्रूर अत्याचारी शासक के हाथों में होता है। यह तो अंगूर है, जो ज्ञानरस से अर्थात अमृत रस अर्थात वेद के मधुरस से भरा हुआ है और सबको आनंदित करता है। इसलिए इसकी समरसता अंगूर की भांति ( बिना भीतरी दीवारों के) सब में एक जैसी रची बसी है। इसे राज्यों का संघ कहकर अपमानित नहीं किया जा सकता।

स्वामी दयानंद जी महाराज का भावार्थ


हमने मनुस्मृति के जिस श्लोक का ऊपर उल्लेख किया है, उसका अर्थ करते हुए स्वामी दयानंद जी महाराज ने लिखा है :-
"(देवनद्योः सरस्वती-दृषद्वत्योः) देवनदियों -
देव अर्थात् विद्वानों के संग से युक्त सरस्वती और दृषद्वती नदियों, उसमें सरस्वती नदी जो पश्चिम प्रान्त - में वर्तमान उत्तर देश से दक्षिण समुद्र में गिरती है, जिस सिन्धु नदी कहा जाता है और पूर्व में जो उत्तर से दक्षिण 1 देशीय समुद्र में गिरती है, जिसे ब्रह्मपुत्र के नाम से जानते हैं; इन दोनों नदियों के (यत् अन्तरम्) बीच || (देवनिर्मितम्) विद्वानों आर्यों द्वारा सुशोभित (देशम्) स्थान (आर्यावर्त्त प्रचक्षते) 'आर्यावर्त्त' कहलाता है"। ॥ (ऋ०दया०पत्र वि०, पृ० 99, हिन्दी में अनूदित)
स्वामी जी महाराज ने यह भी लिखा है कि :- 'उत्तर में हिमालय, दक्षिण में विंध्याचल, पूर्व और पश्चिम में समुद्र तथा सरस्वती, पश्चिम में अटक नदी, पूर्व में दृषद्वती जो नेपाल के पूर्व भाग पहाड़ से निकलके बंगाल के आसाम के पूर्व और ब्रह्मा के पश्चिम ओर होकर दक्षिण के समुद्र में मिली है, जिसको ब्रह्मपुत्रा कहते हैं और जो उत्तर के पहाड़ों से निकल के दक्षिण के समुद्र की खाडी में अटक मिली है। हिमालय की मध्यरेखा से दक्षिण और पहाड़ों के भीतर और रामेश्वर पर्यन्त विन्ध्याचल के भीतर जितने देश हैं, उन सबको आर्यावर्त्त इसलिए कहते हैं कि यह आर्यावर्त्त देव अर्थात् विद्वानों ने बसाया और आर्यजनों के निवास करने से आर्यावर्त्त कहाया है।' (समु० 8 )

भारत श्रेष्ठ पुरुषों की भूमि


स्वामी दयानंद जी महाराज की द्वारा की गई इस व्याख्या में भी भारत भूमि को श्रेष्ठ पुरुषों की भूमि कहा गया है। स्वामी दयानंद जी महाराज भारतवर्ष को नहीं , समस्त संसार को भी आर्य बनाने के लिए कार्य कर रहे थे। उन्होंने अपने जीवन को इसी संकल्प के प्रति समर्पित कर दिया था। वह चाहते थे कि भारत का वैदिक संदेश संसार के कोने- कोने में पहुंचना चाहिए कि परमेश्वर के साम्राज्य का विस्तार करना आर्यों का परम उद्देश्य है। इसके लिए वह संपूर्ण भूमंडलवासियों को आर्य बनाने के लिए कृतसंकल्प हैं।
इस प्रकार का कोई संकल्प भारत के संविधान के पहले अनुच्छेद में दिखाई नहीं देता। इसमें स्पष्ट होना चाहिए था कि भारत के मानवतावादी,समन्वयवादी और सारे संसार के वासियों को श्रेष्ठ मानव बनाने का संकल्प संसार के कोने कोने में फैलाने के प्रति हम सब संकल्पित होते हैं।
भारत के सदाचार के बारे में महर्षि मनु ने स्पष्ट किया कि :-

तस्मिन्देशे य आचारः पारम्पर्यक्रमागतः ।
वर्णानां सान्तरालानां स सदाचार उच्यते ॥ 137॥

अर्थात (तस्मिन् देशे) उस ब्रह्मावर्त्त देश में (वर्णानां
सान्तरालानां पारम्पर्यक्रमागतः यः आचारः) वर्णों और आश्रमों का जो परम्परागत अर्थात् वेदों के प्रारम्भ से लेकर उत्तरोत्तर क्रम से पालित जो वेद शास्त्रोक्त आचार है, (सः) वह (सदाचारः +उच्यते) 'सदाचार' कहलाता है ॥ 137 ॥

प्रचलित अर्थ-उस देश में ब्राह्मण आदि और अम्बष्ठ रथकार आदि वर्णसंकर जातियों का कुलपरम्परागत जो आचार है, वही 'सदाचार' कहा जाता है ॥ १३७॥

पश्चिम का दृष्टिकोण और मनु महाराज

जिस सदाचरण को लेकर हम बहुत अधिक चर्चा किया करते हैं कि प्रत्येक मनुष्य को सदाचरण वाला होना चाहिए। सदाचारी होना चाहिए। वह वास्तव में क्या है ? - इसे समझने के लिए हमें महर्षि मनु को समझना होगा। महर्षि मनु को समझते ही हम यह समझ जाएंगे कि पश्चिम के दृष्टिकोण से जो लोग हमें मूर्ख और अज्ञानी समझते रहे हैं, उन्होंने हमारे पूर्वजों के साथ अन्याय किया है क्योंकि हम वास्तव में वैसे नहीं थे, अपितु हम सदाचारी थे। सदाचरणशील थे और सारा संसार हमसे ही सदाचार सीखता था।
महर्षि मनु ने समस्त संसार के निवासियों के लिए एक विधि की व्यवस्था दी कि सारे संसार के लोग ब्रह्मावर्त के विद्वानों से चरित्र की शिक्षा ग्रहण करें। महर्षि मनु की यह व्यवस्था संसार में एक कानून के रूप में काम करती रही। जब संपूर्ण भूमंडल पर आर्यों का राज्य था, तब सारे संसार के लोग भारतवर्ष को ज्ञान और विद्या का केंद्र समझकर इसकी ओर दौड़े दौड़े आते थे और अपने चरित्र की शिक्षा लेकर यहां से दूर-दूर देशों के लिए लौट जाते थे। लौटने के उपरांत भी वह अपनी आजीविका के चक्र में नहीं फंसते थे , अपितु वहां रहकर संसार के अन्य लोगों का कल्याण करते थे और उन्हें वैदिक सत्य सनातन धर्म के सिद्धांतों से और मान्यताओं से अवगत कराते थे। इस प्रकार भारत के वैदिक ज्ञान की परंपरा सारे संसार में निर्बाध रूप से प्रचारित - प्रसारित होती रहती थी। एक केंद्र से शिक्षा की किरण निकलती थी और वह सारे संसार को आलोकित करती हुई सर्वत्र फैल जाती थी। यह था - आर्यों का वैश्विक चक्रवर्ती साम्राज्य के स्थायित्व का आधार।

महर्षि मनु ने लिखा :-

एतद्देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः ।
स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन्पृथिव्यां सर्वमानवाः [ 2.20]

अर्थात (एतद् देशप्रसूतस्य) इसी ब्रह्मावर्त देश [ 136-137] में उत्पन्न हुए (अग्रजन्मनः सकाशात्) ब्राह्मण वर्णस्थ विद्वानों के सान्निध्य में रहकर (पृथिव्यां सर्व-मानवाः) पृथिवी पर रहने वाले सब मनुष्य अर्थात् बिना किसी देश वर्ण और लिंग आधारित भेदभाव के और प्रतिबन्ध के सभी स्त्री-पुरुष आचरण, (स्वं स्वम्) अपने-अपने (चरित्रं शिक्षेरन) कर्त्तव्यों और व्यवसायों की शिक्षा-दीक्षा ग्रहण करें और अभीष्ट विद्याभ्यास करें ॥ "( विशुद्ध मनुस्मृति - 139 )

ऋषि अर्थ - " महर्षि दयानन्द ने उसी आर्यावर्त के इसी आर्यावर्त में उत्पन्न हुए ब्राह्मणों अर्थात् विद्वानों से भूगोल के सब मनुष्य - ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, दस्यु, म्लेच्छ आदि अपने-अपने योग्य विद्या, चरित्रों की शिक्षा और विद्याभ्यास करें।"
जब हम इस प्रकार की शिक्षा और विद्या के केंद्रों को स्थापित कर रहे थे, तब हमारा उसमें कोई निहित स्वार्थ नहीं था । हम विश्व कल्याण की भावना से प्रेरित होकर ऐसा कर रहे थे। यदि सारे संसार में सुसभ्य, सुशिक्षित, सुसंस्कारी, सुसंस्कृत, विद्यावान लोग होंगे तो तभी सारे संसार में शांति स्थापित रह सकती है । लूटखसोट की परंपरा से एक वर्ग दूसरे वर्ग पर अत्याचार करता है। उसका आर्थिक, सामाजिक , राजनीतिक और मानसिक शोषण करता है और उसके विकास के सभी अवसरों को छीन लेता है। उसे अपने अधीन रखकर अपनी गुलामी करने के लिए विवश करता है। इससे संसार में अविद्या और अंधकार फैलता है। क्योंकि जो लोग किसी दूसरे वर्ग के अधीन हो जाते हैं, उसके गुलाम बन जाते हैं, वे शिक्षा से वंचित हो जाते हैं। शिक्षा और विद्या से वंचित लोग अज्ञानी और मूर्ख बनकर संसार में अराजकता फैलाने का काम करते हैं। जिससे सर्वत्र अशांति फैल जाती है।
भारत के ऋषि पूर्वजों ने मानव स्वभाव के इस सत्य को समझ लिया था। इसलिए उन्होंने सबको नि:शुल्क शिक्षा उपलब्ध कराने का काम किया। आज का संविधान तो नि:शुल्क शिक्षा की बात कहकर भी उसे बहुत महंगी शिक्षा में परिवर्तित होने से रोक नहीं पाया है, परंतु भारत का प्राचीन संविधान अर्थात मनुस्मृति ने ऐसा करके दिखाया कि सारे संसार के लोगों के लिए नि:शुल्क शिक्षा उपलब्ध कराई। वह शिक्षा शिक्षा से बढ़कर आत्म परिष्कार करने वाली विद्या थी। जिसमें किसी दूसरे के अधिकारों का हनन करने की या किसी दूसरे का शोषण करने की बात मनुष्य सोच भी नहीं पाता था।
महर्षि मनु ने भारत के मध्य देश की सीमाओं का उल्लेख करते हुए निम्नलिखित श्लोक लिखा है :-

हिमवद्विन्ध्ययोर्मध्यं यत्प्राग्विनशनादपि ।
प्रत्यगेव प्रयागाच्च मध्यदेशः प्रकीर्तितः ॥ वि0म0 140 ॥
[ 2.21] (75 )
अर्थात (हिमवद्-विन्ध्ययोः मध्यम्) [उत्तर में स्थित] हिमालय पर्वत [ और दक्षिण में स्थित] विन्ध्याचल के मध्यवर्ती (विनशनात्+अपि यत् प्राक्) विनशन प्रदेश-पश्चिम में सरस्वती नदी के समुद्र में मिलने के स्थान से लेकर जो प्रयाग तक पूर्वदिशा का प्रदेश है (च) और (प्रयागात् प्रत्यक्) प्रयाग-प्रदेश के पश्चिम में जो सरस्वती समुद्र संगम तक का प्रदेश है, वह (मध्यदेशः प्रकीर्तितः) 'मध्यदेश' कहा जाता है ॥140 ॥


आर्यावर्त्त देश की सीमा-


आसमुद्रात्तु वै पूर्वादासमुद्रात्तु पश्चिमात् ।
तयोरेवान्तरं गिर्योरार्यावर्तं विदुर्बुधाः ॥ 141।।[ 2.22 ] (76)


(आ-समुद्रात्तु वै पूर्वात्) पूर्व समुद्र से लेकर (आ-समुद्रात्तु पश्चिमात्) पश्चिम समुद्रपर्यन्त विद्यमान (तयोः एव गिर्योः अन्तरम्) उत्तर में स्थित हिमालय और दक्षिण में स्थित विध्याचल पर्वतों सहित | जो मध्यवर्ती देश है, उसे (बुधाः आर्यावर्तं विदुः) विद्वान् 'आर्यावर्त' कहते हैं ॥ 141 ॥


डॉ सुरेंद्र कुमार जी लिखते हैं :-


(क) आर्यावर्त की सीमाएँ-


" पूर्व में पूर्व समुद्र तक, पश्चिम में पश्चिम समुद्र तक। उत्तर में हिमवान् (हिमालय) पर्वत (पश्चिम में हिन्दूकुश से लेकर पूर्व की सम्पूर्ण उत्तरी सीमा पर फैली हुई पूरी पर्वत श्रेणी को हिमवान् पर्वत कहा जाता रहा है। कैलाश पर्वत आदि इसी के अंग हैं)। दक्षिण में, विन्ध्य पर्वत (आधुनिक भूगोल-वेत्ताओं के अनुसार विन्ध्य पर्वत पश्चिम में महाराष्ट्र. गुजरात से लेकर पूर्व में बिहार तक लगभग 700 मील तक फैला हुआ है सतपुड़ा आदि इसी के भाग हैं। वाल्मीकीय रामायण में समुद्र तट पर स्थित तमिलनाडु और केरल के पर्वतों को विंध्यपर्वत का भाग माना है। जैसे उत्तर में हिमालय का विस्तार है उसी प्रकार दक्षिण में विन्ध्यपर्वत का विस्तार है (किष्किन्धाकाण्ड 60.7)। परवर्ती काल में लोगों ने विन्ध्यपर्वत के भागों के पृथक् पृथक् नाम रख लिये) इन दोनों पर्वत प्रदेशों और उनके मध्यवर्ती भूभाग को आर्यावर्त कहा गया है [ मनु० 1.141 (2.22)]।
मनुस्मृति में संक्षेप में आर्यावर्त का विस्तार प्रदर्शित किया गया है। इसमें परिगणित चारों दिशाओं के अंतिम प्रदेशों से आर्यावर्त की सीमा सुनिश्चित हो जाती है और अन्य सभी प्रदेशों का उन्हीं में अन्तर्भाव हो जाता है। १०.४३-४४ श्लोकों के अनुसार, उत्तर में शक और चीन देशों से लेकर दक्षिण में द्रविड (तमिलनाडु) तक, पश्चिम में पहलव (ईरान) प्रदेश से लेकर पूर्व में किरात प्रदेश (ब्रह्मपुत्र का पूर्व भाग) तक इसका विस्तार था। पश्चिम से पूर्व समुद्र भी इतना ही फैला है।"
भारत के वर्तमान संविधान के अनुच्छेद 01 की विषय वस्तु पर 15 और 17 नवंबर 1948 तथा 17 और 18 सितंबर 1949 को संविधान सभा में बड़ी व्यापक बहस हुई थी । इस बहस के पश्चात ही पूरी संविधान सभा इस निष्कर्ष पर पहुंची थी कि भारत को ' राज्यों का संघ ' घोषित किया जाए। तब संविधान सभा के द्वारा भारत के भूभाग को परिभाषित किया गया। संविधान सभा में हुई इस बहस में एक सदस्य ने तो भारत का नाम परिवर्तित कर इंडिया कर देने की बात भी कही थी। India that is Bharat के प्रस्ताव को जब पारित किया जा रहा था तो इस पर भी केवल एक सदस्य ने ही अपनी असहमति व्यक्त की थी शेष ने इसको यथावत स्वीकार कर लिया था।

क्या शूद्र हैं अनुसूचित जातियां

यदि महर्षि मनु की व्यवस्था पर विचार किया जाए तो पता चलता है कि आज की अनुसूचित जातियां , अनुसूचित जनजातियां और पिछड़ी जातियां किसी भी दृष्टिकोण से शूद्र वर्ण की नहीं मानी जा सकती। महर्षि मनु ने जिस प्रकार शूद्र की परिभाषा की है , उसके अनुसार जिनका विद्या रूपी ब्रह्म जन्म नहीं होता वह एकजाति रहने वाला व्यक्ति है। मनुस्मृति के अध्याय 2 का 172 वां श्लोक है " जब तक व्यक्ति का वेद अध्ययन रूप जन्म नहीं होता, तब तक वह शुद्ध के समान ही होता है।"

( लेखक डॉ राकेश कुमार आर्य सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं)

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