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होलाष्टक: आस्था, अध्यात्म और विज्ञान का संगम

होलाष्टक: आस्था, अध्यात्म और विज्ञान का संगम

- सत्येन्द्र कुमार पाठक
भारतीय जनमानस में त्योहार केवल कैलेंडर की तिथियाँ नहीं, बल्कि वे प्रकृति, ज्योतिष और अध्यात्म के गहरे अंतर्संबंधों का उत्सव हैं। रंगों के महापर्व होली से ठीक आठ दिन पहले एक विशेष कालखंड प्रारंभ होता है, जिसे हम 'होलाष्टक' के नाम से जानते हैं। फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी से शुरू होकर पूर्णिमा (होलिका दहन) तक रहने वाली यह अवधि भारतीय संस्कृति में विशेष महत्व रखती है। 'होलाष्टक' का शाब्दिक अर्थ है— होली के आठ दिन। जहाँ एक ओर यह समय उत्सव की पदचाप सुनाता है, वहीं दूसरी ओर यह आत्म-संयम, साधना और वर्जनाओं का काल भी माना जाता है।
होलाष्टक का विधिवत आरंभ 'होली का डंडा' स्थापित करने के साथ होता है। गाँव की चौपाल हो या शहर का कोई चौराहा, होलिका दहन के निश्चित स्थान को गंगाजल से पवित्र किया जाता है। यहाँ दो प्रतीकात्मक डंडे रोपे जाते हैं—एक भक्त प्रह्लाद का प्रतीक और दूसरा होलिका का। यह केवल एक धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि सामुदायिक सहभागिता का अनूठा उदाहरण है। इसी दिन से लोग सूखी लकड़ियाँ, उपले और कृषि अवशेष एकत्र करना शुरू करते हैं। पुराने समय में यह स्वच्छता अभियान का हिस्सा भी था, जहाँ खेतों और घरों की सफाई से निकला कूड़ा-करकट एक जगह एकत्र कर जलाया जाता था, ताकि आने वाली गर्मी से पहले वातावरण शुद्ध हो सके।
अक्सर लोग पूछते हैं कि यदि होली खुशियों का त्योहार है, तो उससे पहले के आठ दिन 'अशुभ' क्यों माने जाते हैं? इसका उत्तर भारतीय ज्योतिष विज्ञान में छिपा है। शास्त्रों के अनुसार, होलाष्टक के दौरान सौरमंडल के आठ प्रमुख ग्रह अत्यंत 'उग्र' अवस्था में होते हैं। तिथि प्रभावी ग्रह मनोवैज्ञानिक प्रभाव अष्टमी चंद्रमा मन की अस्थिरता और भावुकता , नवमी सूर्य क्रोध और अहंकार की वृद्धि , दशमी शनि कार्यों में अवरोध और सुस्ती , एकादशी शुक्र भौतिक सुखों के प्रति आसक्तिद्वादशी गुरु निर्णय क्षमता में भ्रम त्रयोदशी बुध वाणी में कटुता और बौद्धिक तनाव ,चतुर्दशी मंगल उग्रता और दुर्घटना का भय , पूर्णिमा राहु नकारात्मक विचारों का प्रबल होना है।
ज्योतिषियों का मत है कि जब ग्रह उग्र होते हैं, तो मनुष्य की निर्णय लेने की क्षमता क्षीण हो जाती है। इसीलिए इन दिनों में विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश या नया व्यापार शुरू करना वर्जित माना गया है, ताकि ग्रहों के दुष्प्रभाव से बचा जा सके। भक्ति बनाम अहंकार का संघर्ष में होलाष्टक की जड़ें पुराणों की उन कथाओं में हैं जो हमें जीवन मूल्यों की सीख देती हैं। सबसे प्रमुख कथा भक्त प्रह्लाद की है। असुर राज हिरण्यकशिपु ने अपने पुत्र प्रह्लाद की विष्णु भक्ति से क्रुद्ध होकर उसे इन आठ दिनों में मृत्युतुल्य कष्ट दिए थे। उसे पहाड़ से गिराया गया, हाथियों से कुचलवाया गया और अंततः फाल्गुन पूर्णिमा को उसकी बुआ होलिका उसे लेकर अग्नि में बैठी थी। इन आठ दिनों को 'भक्त के कष्ट' का समय माना जाता है। इसीलिए हिंदू समाज में इन दिनों को शोक और साधना के रूप में मनाया जाता है, न कि आमोद-प्रमोद के रूप में। इसके अतिरिक्त, शिव पुराण में उल्लेख है कि इसी अष्टमी को महादेव ने कामदेव को भस्म किया था, जिसके बाद पूरी सृष्टि में शोक की लहर दौड़ गई थी। बाद में रति की प्रार्थना पर महादेव ने उन्हें पुनर्जीवन का वरदान दिया, जिसे हम धुलेंडी के रूप में मनाते हैं।
सतयुग से कलियुग तक में होलाष्टक का महत्व कालखंडों के साथ विकसित हुआ है: सतयुग: यह तपस्या और वैराग्य का काल था, जहाँ शिव ने काम (इच्छाओं) पर विजय प्राप्त की।त्रेतायुग: यह असुर शक्तियों के विरुद्ध दैवीय शक्तियों के एकजुट होने का समय बना।द्वापरयुग: भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रज में इन्हीं आठ दिनों में 'होली' को एक उत्सव का रूप दिया, जहाँ भक्ति और प्रेम का मिलन हुआ। कलियुग: वर्तमान में यह समय 'धैर्य और विजय' का संदेश देता है। यह हमें सिखाता है कि बुराई चाहे कितनी ही शक्तिशाली क्यों न हो, अंततः जीत सत्य की ही होती है। आधुनिक विज्ञान और मनोविज्ञान का नजरिया में वैज्ञानिक युग में भी होलाष्टक की प्रासंगिकता कम नहीं हुई है। ऋतु संधि समय वसंत के समापन और ग्रीष्म के आगमन का है। वातावरण में तापमान बढ़ता है, जिससे सूक्ष्म जीवाणु सक्रिय हो जाते हैं। होलिका दहन की सामूहिक अग्नि वातावरण के शुद्धिकरण के लिए एक 'थर्मल ट्रीटमेंट' की तरह काम करती है।मनोविज्ञान कहता है कि ऋतु परिवर्तन के समय मानव मस्तिष्क में रासायनिक असंतुलन हो सकता है। होलाष्टक के दौरान बताए गए 'संयम और ध्यान' के नियम वास्तव में व्यक्ति को मानसिक तनाव से बचाने का एक तरीका है। इतिहास गवाह है कि होलाष्टक की अवधि हमेशा से सामुदायिक मेलजोल की रही है। मध्यकाल में, मुगल बादशाहों के दौर में भी 'आब-ए-पाशी' की तैयारी इसी समय से शुरू होती थी। गाँवों में लोग एक-दूसरे के द्वेष भुलाकर लकड़ियाँ इकट्ठा करते थे। यह समय 'प्रतीक्षा' का है—एक ऐसी प्रतीक्षा जो हमें एक बड़े उत्सव के लिए तैयार करती है।
होलाष्टक हमें 'आत्म-मंथन' की प्रेरणा देता है। भगवान विष्णु या अपने ईष्ट देव की आराधना करें। 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' जैसे मंत्रों का जाप मानसिक शांति प्रदान करता है। जरूरतमंदों को दान दें और अपने भीतर की बुराइयों को त्यागने का संकल्प लें। शुभ और मांगलिक कार्यों से बचें। घर में कलह न करें और न ही किसी का अपमान करें। यह समय तामसिक भोजन त्यागकर सात्विक जीवन जीने का है।
होलाष्टक केवल वर्जनाओं की सूची नहीं है, बल्कि यह एक 'शुद्धिकरण' की प्रक्रिया है। जैसे सोना अग्नि में तपकर कुंदन बनता है, वैसे ही इन आठ दिनों का संयम हमें होली के रंगों के योग्य बनाता है। यह हमें संदेश देता है कि उत्सव का असली आनंद तभी है, जब हमारा मन और वातावरण दोनों शुद्ध हों। होलिका दहन के साथ ही हमारे संतापों का अंत होता है और धुलेंडी की सुबह एक नए, रंगीन और सकारात्मक भविष्य का स्वागत करती है।होलाष्टक में आपकी राशि और शुभ उपाय में ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, होलाष्टक के आठ दिनों में ग्रहों की उग्रता का प्रभाव सभी 12 राशियों पर अलग-अलग पड़ता है। अपनी राशि के अनुसार छोटे-छोटे उपाय कर आप इन दिनों की नकारात्मकता को शुभ ऊर्जा में बदल सकते हैं:। होलाष्टक के दौरान 'महामृत्युंजय मंत्र' का मानसिक जाप करना सभी राशियों के लिए रक्षा कवच का कार्य करता है। यह समय नई योजनाओं के क्रियान्वयन (Execution) का नहीं, बल्कि उनकी योजना बनाने (Planning) और आत्म-शुद्धि का है।
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