“समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध, जो तटस्थ है, समय लिखेगा उनके भी अपराध”
रमेश कुमार चौबे
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की ये पंक्तियाँ केवल एक साहित्यिक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि समूचे राष्ट्र जीवन के लिए एक नैतिक उद्घोष हैं। ये पंक्तियाँ हमें उस गहन सत्य से परिचित कराती हैं कि अन्याय के समय मौन रहना भी उतना ही बड़ा अपराध है, जितना स्वयं अन्याय करना। आज जब हमारा समाज अनेक प्रकार के वैचारिक, राजनीतिक और सामाजिक द्वंद्वों से गुजर रहा है, तब यह आवश्यक हो जाता है कि हम इस संदेश को केवल पढ़ें ही नहीं, बल्कि उसे अपने जीवन में उतारें।
भारत जैसे प्राचीन और महान राष्ट्र में “समर” का अर्थ केवल युद्ध नहीं है। यह समर है—सत्य और असत्य के बीच, न्याय और अन्याय के बीच, नैतिकता और अनैतिकता के बीच। यह संघर्ष हर युग में रहा है और आगे भी रहेगा। महाभारत का युद्ध केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं था, बल्कि वह मनुष्य के अंतर्मन में चलने वाले द्वंद्व का प्रतीक था। जब अर्जुन मोह और संशय में पड़ गए थे, तब श्रीकृष्ण ने उन्हें कर्तव्य का बोध कराया था। उन्होंने यह स्पष्ट किया था कि धर्म की रक्षा के लिए संघर्ष आवश्यक है और उससे विमुख होना ही अधर्म को बढ़ावा देना है। यही संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है—क्योंकि परिस्थितियाँ बदलती हैं, लेकिन सत्य का स्वरूप नहीं बदलता।
आज समाज में एक बड़ी विडंबना यह है कि तटस्थता को बुद्धिमत्ता और निष्पक्षता समझ लिया गया है। लोग यह मानने लगे हैं कि किसी भी विवाद से दूर रहना ही समझदारी है। लेकिन क्या वास्तव में ऐसा है? यदि हमारे सामने कोई अन्याय हो रहा हो और हम केवल इसलिए मौन रहें कि हमें किसी पक्ष में नहीं पड़ना है, तो क्या यह सही है? दिनकर जी ने इसी तटस्थता को अपराध कहा है। क्योंकि तटस्थ व्यक्ति अपनी निष्क्रियता के कारण अन्याय को अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन देता है। निष्पक्षता का अर्थ यह नहीं कि हम चुप रहें, बल्कि इसका अर्थ है कि हम सत्य के साथ खड़े हों—चाहे वह कितना ही कठिन क्यों न हो।
लोकतंत्र में यह प्रश्न और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। हमारा लोकतंत्र केवल एक राजनीतिक व्यवस्था नहीं, बल्कि यह एक नैतिक अनुबंध है—जनता और शासन के बीच विश्वास का अनुबंध। यह विश्वास तभी बना रह सकता है जब शासन पारदर्शी हो, निर्णय न्यायसंगत हों और संस्थाएँ निष्पक्ष हों। यदि कहीं भी इस संतुलन में कमी आती है, तो लोकतंत्र की आत्मा आहत होती है। इसलिए समाज के प्रत्येक जागरूक नागरिक का यह कर्तव्य है कि वह केवल दर्शक बनकर न रहे, बल्कि सही और गलत के बीच अंतर करते हुए अपनी भूमिका निभाए।
आज का युग सूचना का युग है। पहले जहाँ जानकारी सीमित होती थी, वहीं आज हर व्यक्ति के हाथ में मोबाइल है और हर घटना कुछ ही क्षणों में पूरे देश और दुनिया तक पहुँच जाती है। यह स्थिति एक ओर हमें सशक्त बनाती है, वहीं दूसरी ओर एक नई चुनौती भी प्रस्तुत करती है—दुष्प्रचार की चुनौती। आज आधी-अधूरी जानकारी, अपुष्ट समाचार और भावनात्मक उकसावे बहुत तेजी से फैलते हैं। ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि हम किसी भी बात को स्वीकार करने से पहले उसकी सत्यता की जांच करें। बिना प्रमाण के किसी भी व्यक्ति, संस्था या विचार पर आरोप लगाना न केवल अनुचित है, बल्कि यह समाज में अविश्वास और अराजकता को भी जन्म देता है।
न्यायपालिका, लोकतंत्र की वह आधारशिला है जिस पर जनता का सबसे अधिक विश्वास टिका होता है। जब समाज के अन्य सभी रास्ते बंद हो जाते हैं, तब न्यायपालिका ही अंतिम आशा बनती है। इसलिए यह आवश्यक है कि न्यायपालिका पूर्णतः स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी बनी रहे। न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि वह होता हुआ दिखाई भी देना चाहिए। यही कारण है कि न्याय में विलंब को भी न्याय से वंचित करना माना गया है। यदि न्याय समय पर नहीं मिलता, तो उसका प्रभाव भी कम हो जाता है और जनता का विश्वास भी डगमगाने लगता है।
इसी प्रकार प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। वे केवल सत्ता के प्रतीक नहीं होते, बल्कि वे समाज के सेवक होते हैं। उनका दायित्व है कि वे जनता की समस्याओं को समझें, उनके समाधान के लिए कार्य करें और अपने पद का उपयोग जनहित में करें। यदि सत्ता सेवा का माध्यम न बनकर स्वार्थ का साधन बन जाए, तो लोकतंत्र कमजोर हो जाता है और समाज में असंतोष बढ़ता है। इसलिए यह आवश्यक है कि हर जनप्रतिनिधि और अधिकारी अपने कर्तव्यों को ईमानदारी और निष्ठा के साथ निभाए।
धर्म और राजनीति का संबंध भी इस संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत में धर्म केवल पूजा-पद्धति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन का एक व्यापक दर्शन है। ऐसे में जब धर्म और राजनीति का मेल होता है, तो उसका प्रभाव समाज के हर वर्ग पर पड़ता है। यदि यह मेल संतुलित और नैतिक हो, तो समाज में अनुशासन और सद्भाव बढ़ता है। लेकिन यदि यह असंतुलित हो जाए, तो धर्म का राजनीतिकरण होने लगता है और समाज में विभाजन की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। इसलिए यह आवश्यक है कि धर्म और राजनीति दोनों अपने-अपने दायरे में रहते हुए समाज के कल्याण के लिए कार्य करें।
मीडिया की भूमिका भी इस पूरे परिदृश्य में अत्यंत महत्वपूर्ण है। मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है, क्योंकि यह समाज और सत्ता के बीच एक सेतु का कार्य करता है। लेकिन यदि मीडिया अपनी जिम्मेदारी से विमुख हो जाए और केवल सनसनीखेज खबरों या पक्षपातपूर्ण रिपोर्टिंग पर ध्यान देने लगे, तो समाज का संतुलन बिगड़ सकता है। इसलिए मीडिया का यह दायित्व है कि वह सत्य, निष्पक्षता और जिम्मेदारी के साथ अपनी भूमिका निभाए।
अंततः यह प्रश्न समाज के प्रत्येक व्यक्ति के सामने खड़ा होता है—क्या हम तटस्थ हैं या सच के साथ खड़े हैं? यह प्रश्न केवल दूसरों के लिए नहीं, बल्कि हमारे अपने लिए भी है। हमें स्वयं से यह पूछना होगा कि जब हमारे सामने कोई अन्याय होता है, तो हम क्या करते हैं? क्या हम केवल चुप रहकर उसे नजरअंदाज कर देते हैं, या फिर उसके खिलाफ आवाज उठाने का साहस रखते हैं?
समय एक निष्पक्ष न्यायाधीश है। वह न किसी से प्रभावित होता है और न ही किसी के प्रति पक्षपाती होता है। इतिहास गवाह है कि जो सत्य है, वह अंततः सामने आता ही है और जो असत्य है, वह नष्ट हो जाता है। इसलिए यह आवश्यक है कि हम सत्य के साथ खड़े हों, चाहे वह कितना ही कठिन क्यों न हो। क्योंकि अंततः वही व्यक्ति सम्मानित होता है, जिसने कठिन परिस्थितियों में भी अपने सिद्धांतों का साथ नहीं छोड़ा।
1. खुद से खुद के मुकदमा समाप्त कर देने के आदेश से श्री योगी आदित्यनाथ उर्फ़ श्री अजय सिंह बिष्ट की आपराधिक इतिहास की सच्चाई छुप नहीं सकती I एक राजनीतिक व्यक्ति भगवा वस्त्र धारण कर लेने से संत और योगी नहीं हो जाता I उनके फाईल्स भी आम जनता के सामने आएगा और उसके सत्ता च्युत होने के बाद उनके कार्यकाल की गैरकानूनी आदेशों की समीक्षा करके उनके समस्त अपराधों की फाईल्स खुलेंगे और उन्हें भी न्यायालय के ट्रायल का सामना करना होगा I
2. शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद महाराज के खिलाफ F.I.R करवाने वाला आशुतोष पर 21 F.I.R दर्ज हैं I अविमुक्तेश्वरानंद के खिलाफ राजनितिक षड़यंत्र करके एक हिस्ट्रीशीटर से शंकराचार्य के चरित्र का चीरहरण करवाने वाले सत्ताधीश के चरित्र भी कितना कलंकित है देश का आम आवाम एक दिन जानेगा I
3.शंकराचार्य के शिष्य योगीराज ने अपने सोशल मिडिया के जरिये कुछ अखबारों की कतरनें साझा कीं है जो देश के आम आवाम के पास विभिन्न सोशल मिडिया माध्यम से वाईरल हुआ है ,जिससे जानकारी हुआ है कि आशुतोष के खिलाफ कई आपराधिक मुकदमें दर्ज हैं I उन्होंने एक पुलिस दस्तावेज भी पोस्ट किया, जो शामली के कांधला थाने का बताया गया I
उसमें लिखा था — आशुतोष पांडेय, हिस्ट्रीशीट अपराधी है I उनके द्वारा जारी अभिलेखों में आशुतोष पांडेय पर अलग-अलग 21 मामले दर्शाए गए हैं I आशुतोष पांडेय के विरुद्ध उत्तर प्रदेश गोवध अधिनियम, एंटी करप्शन एक्ट, गैंगस्टर एक्ट तथा आईटी एक्ट के तहत प्रकरण दर्ज किए गए हैं I उनके खिलाफ धोखाधड़ी, मारपीट, रेप और धमकी देने जैसे मामले भी दर्ज बताए गए हैं I इनमें से अधिकांश में चार्जशीट दाखिल होने की बात कही गई है I
4. एक गौ तस्कर और बलात्कारी को भाजपा की उप्र सरकार ने शंकराचार्य के विरुद्ध खड़ा किया है यह सब देश का समाज और देश की एक सौ चालीस करोड़ की आबादी देख रहा है I
5.प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तथाकथित मित्र और सरकारी संत “रामभद्राचार्य” का यह शिष्य है उत्तरप्रदेश की योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार का मोहरा है I
6.शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी के विरुद्ध इसी को आगे करके शंकराचार्य जी का चारित्रिक चीरहरण कराया जा रहा है I यह चारित्रिक चीरहरण बिना सत्ताधीश के संरक्षण में हो हीं नहीं सकता है I
7.आदरणीय शंकराचार्य जी का चीरहरण करने वाले हिस्ट्रीशीटर अपराधी का फोटो किस किस भाजपाई व्यक्तित्व के साथ है आप सब देख लीजिए I भाजपा के शीर्ष नेताओं का पोसुआ हिस्ट्रीशीटर भाजपाई नेताओं का कितना प्रिय है आप खुद देख सकते हैं और समझ सकते हैं I
8.संत समाज के बीच संघी-भाजपाइयों ने ऐसे अनेक 'सुपारी किलर' खड़े कर रखे हैं, ताकि धर्म क्षेत्र पर पूरा कंट्रोल वे खुद कर सकें I कैसे दुष्चरित्र लोगों का उपयोग भाजपा की उत्तरप्रदेश की योगी सरकार सनातन धर्म के सबसे बड़े पीठ शंकराचार्य को बदनाम करने और उन्हें जेल में डालने के लिए कर रही है देश का आम जन मानस इसको देखे और समझे I
9.उत्तर प्रदेश का कुख्यात अपराधी किसके शासनकाल में संरक्षित है यह आम जनता अपने विवेक से समझे I
10.गंभीर आपराधिक आरोपों में नामजद एक हिस्ट्रीशीटर अपराधी को मोहरा बनाकर आदरणीय शंकराचार्य का चीरहरण इसलिए कराया जा रहा है कि योगी आदित्यनाथ के आगे वे नतमस्तक क्यों नहीं हुए ? अकेले उत्तरप्रदेश से देश के कुल चालीस प्रतिशत बीफ विदेशों में निर्यात होता है और योगी आदित्यनाथ के कार्यकाल में यह हो रहा है क्या यह सनातन के विरुद्ध उनका चरित्र नहीं है ?
11.योगी आदित्यनाथ खुद वो दिन भूल गए जब संसद में गला फाड़ -फाड़ कर आंसू बहा रहे थे और बोल रहे थे कि मुलायम सिंह उन्हें इनकाउंटर करवाना चाहते हैं जबकि यह सरासर उनकी मनगढ़ंत बात उनकी अपनी सस्ती लोकप्रियता के लिए और सहानुभूति के लिए थी जो सिद्ध हो चूका है I योगी आदित्यनाथ जातिवादी सोंच के हैं जो कदापि सन्यासी नहीं बल्कि सत्ताधीश बनकर सत्ता का भोग खुद कर रहे हैं I गोरखपीठ का पीठाधीश्वर और एक साथ मुख्यमंत्री का पद यह त्याग और सन्यास नहीं अपितु सत्ता सुख और ऐश्वर्य सुख प्राप्ति की मीमांसा है I क्या कोई दलित महादलित या पिछड़ा वर्ग का व्यक्ति गोरखपीठ का पीठाधीश्वर नहीं बन सकता ? फिर बटोगे तो कटोगे का नारा देने वाले गोरखपीठ का पीठाधीश्वर पद दलित महादलित या पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षित नहीं कर सकते हैं ?
आज का समय हमें पुकार रहा है—मौन तोड़ने के लिए, जागरूक होने के लिए, और सत्य के पक्ष में खड़े होने के लिए। यह केवल एक नैतिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि यह हमारा राष्ट्रधर्म है। यदि हम इस दायित्व को समझेंगे और निभाएंगे, तो न केवल हमारा समाज सशक्त होगा, बल्कि हमारा राष्ट्र भी एक नई ऊँचाई प्राप्त करेगा।
इसलिए आइए, हम सब मिलकर यह संकल्प लें कि हम तटस्थ नहीं रहेंगे, बल्कि सत्य और न्याय के साथ खड़े होंगे। क्योंकि जैसा कि दिनकर जी ने कहा है—
“समर शेष है…”—और इस समर में हमारी भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी किसी और की।
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