काशी का कालजयी उत्सव: 'बुढ़वा मंगल'
सत्येन्द्र कुमार पाठक
: उत्सवधर्मिता का चरमोत्कर्ष का वाराणसी, जिसे दुनिया 'मोक्ष की नगरी' कहती है, वहाँ के निवासियों के लिए यह 'मौज की नगरी' भी है। काशी के बारे में एक लोकोक्ति प्रसिद्ध है— "आठ वार और नौ त्योहार", यानी यहाँ हफ़्ते के सात दिनों में नौ त्योहार मना लिए जाते हैं। इन्हीं त्योहारों की लंबी फेहरिस्त में एक ऐसा पर्व है जो फाल्गुन की विदाई और चैत्र के आगमन की संधि पर खड़ा है— 'बुढ़वा मंगल'। यह केवल एक धार्मिक तिथि नहीं है, बल्कि यह बनारस के उस अक्खड़पन, फक्कड़पन और रूहानियत का निचोड़ है, जो इसे दुनिया के अन्य शहरों से अलग करता है। जब पूरी दुनिया में होली के रंग उतर चुके होते हैं, तब काशी अपनी 'बुढ़वा होली' के जरिए प्रेम और सौहार्द का आखिरी गुलाल उड़ाती है।
.: हनुमान की विनम्रता बनाम भीम का दर्प बुढ़वा मंगल का आध्यात्मिक ताना-बना द्वापर युग की एक अत्यंत मार्मिक और शिक्षाप्रद घटना से बुना गया है। महाभारत काल में पांडु पुत्र भीम अपनी असीम शारीरिक शक्ति के मद में चूर हो गए थे। उन्हें लगा कि उनके 'गदा' प्रहार और भुजाओं के बल के आगे संसार नतमस्तक है। उनके इस अहंकार को नष्ट करने के लिए पवनपुत्र हनुमान ने एक लीला रची। वे एक वृद्ध, दुर्बल और जर्जर वानर का रूप धरकर उस वन मार्ग में लेट गए जहाँ से भीम गुजरने वाले थे। जब भीम वहाँ पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि एक बूढ़ा वानर अपनी लंबी पूँछ फैलाकर लेटा है। भीम ने उसे मार्ग से हटने को कहा, लेकिन हनुमान जी (वृद्ध रूप में) ने कहा— "हे वीर! मैं वृद्ध हूँ, मुझमें हिलने की शक्ति नहीं है। आप स्वयं ही मेरी पूँछ हटाकर निकल जाएँ।"
भीम ने अहंकार में भरकर अपनी पूरी शक्ति लगा दी, लेकिन उस 'वृद्ध वानर' की पूँछ टस से मस न हुई। अंततः भीम का मस्तक झुक गया और उन्हें अपनी भूल का अहसास हुआ। हनुमान जी ने अपने वास्तविक चतुर्भुज स्वरूप में दर्शन देकर भीम को समझाया कि सच्ची शक्ति शरीर में नहीं, बल्कि भक्ति और विनम्रता में निहित है। चूँकि यह घटना मंगलवार के दिन हुई थी और हनुमान जी ने 'बुद्ध' (वृद्ध) रूप लिया था, इसलिए यह 'बुढ़वा मंगल' कहलाया।
: नवाबों के संरक्षण से जन-गण का पर्व बुढ़वा मंगल का इतिहास केवल पौराणिक नहीं, बल्कि अत्यंत रोचक और ऐतिहासिक भी है। यह पर्व भारत की 'साझा विरासत' का प्रतीक है। नवाबों का दौर: 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में, जब अवध के नवाब वजीर अली बनारस में निर्वासित थे, उन्होंने इस पर्व की भव्यता को देखा और इसे राजकीय संरक्षण प्रदान किया। उस काल में नवाबों और काशी के रईसों के बीच इस बात की होड़ लगती थी कि किसका 'बजड़ा' (नाव) सबसे सुंदर सजेगा। गंगा-जमुनी तहजीब: यह वह दौर था जब मुसलमान मल्लाह नावें सजाते थे, हिंदू भक्त हनुमान जी की पूजा करते थे और पूरा शहर मिलकर उत्सव मनाता था। नवाबों के बाद काशी नरेशों ने इसे संरक्षण दिया, जिससे यह पर्व एक लोक-उत्सव से ऊपर उठकर काशी की पहचान बन गया। . संगीत की मन्दाकिनी: गंगा की लहरों पर सुरों का साम्राज्य बुढ़वा मंगल का सबसे गौरवशाली पक्ष इसकी 'जल-संगीत' परंपरा रही है। प्राचीन काल में, बुढ़वा मंगल के दिन अस्सी घाट से लेकर राजघाट तक पूरी गंगा एक सांस्कृतिक रंगमंच में तब्दील हो जाती थी।
सजी हुई नावें (बजड़े): ये साधारण नावें नहीं होती थीं। इन्हें लकड़ी के महलों की तरह सजाया जाता था। गद्दे, मसनद, झाड़-फानूस और इत्र की महक से महकते इन बजड़ों पर बनारस घराने के दिग्गजों की महफिल जमती थी।
उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ की शहनाई जब आधी रात को गंगा की लहरों से टकराती थी, तो पूरी काशी मौन होकर सुनती थी। गिरिजा देवी की 'चैती', पंडित किशन महाराज का 'तबला' और सितार की झंकार रात भर चलती थी। संगीत के इन साधकों के लिए यह कोई मनोरंजन नहीं, बल्कि मां गंगा और हनुमान जी के चरणों में दी जाने वाली 'हाजिr है। जहाँ एक तरफ शास्त्रीय गायन होता था, वहीं दूसरी तरफ स्थानीय गायक 'बिरहा' और 'कजरी' के जरिए लोक जीवन की खुशबू बिखेरते थे। : बुजुर्गों के सम्मान की अनूठी रीत 'बुढ़वा मंगल' नाम अपने आप में समाज के एक बहुत बड़े वर्ग—वृद्धजनों—को समर्पित है। काशी की परंपरा में यह दिन 'सम्मान' का दिन है। अंतिम गुलाल में : होली के दिन जो हुड़दंग और चपलता होती है, बुढ़वा मंगल के दिन वह शांति और आशीर्वाद में बदल जाती है। इस दिन बनारस के युवा अपने परिवार और मोहल्ले के बुजुर्गों के चरणों में अबीर अर्पित करते हैं। यह इस बात का प्रतीक है कि हमारी संस्कृति की जड़ें हमारे बुजुर्गों के अनुभव में हैं।
आपसी मनमुटाव का होली के दौरान यदि कोई अनबन हुई हो, तो बुढ़वा मंगल के दिन उसे भूलकर गले मिलना अनिवार्य माना जाता है। इसे 'रिश्तों की मरम्मत' का दिन भी कहा जाता है। काशी का 'अक्खड़पन' और 'फक्कड़पन'का बनारस की अपनी एक भाषा है, अपना एक मिजाज है। बुढ़वा मंगल इस मिजाज का आईना है। यहाँ लोग दुनियादारी की फिक्र छोड़कर अपनी मौज में रहते हैं। खान-पान की परंपरा: इस दिन बनारस की प्रसिद्ध 'ठंडई' का विशेष महत्व है। केसर, बादाम और भांग के साथ तैयार ठंडई, मलइयो और बनारसी कचौड़ी-जलेबी का आनंद लेते हुए लोग गलियों में निकलते हैं।
संकट मोचन की शरण: काशी का हर त्योहार 'बाबा' (विश्वनाथ) और 'हनुमान जी' के बिना अधूरा है। बुढ़वा मंगल के दिन संकट मोचन मंदिर में भक्तों का ऐसा रेला उमड़ता है कि पूरी काशी 'बजरंग बली' के रंग में रंगी
समय बदला, गंगा का प्रवाह बदला और मनोरंजन के साधन भी बदले। आज गंगा में वे विशाल बजड़े और नवाबों जैसी महफिलें कम हो गई हैं, लेकिन बुढ़वा मंगल की आत्मा आज भी नहीं मरी।: अब बड़े बजड़ों की जगह छोटे स्टीमर और नावों ने ले ली है, लेकिन संगीत का जुनून आज भी वैसा ही है। संकट मोचन संगीत समारोह और गंगा के घाटों पर होने वाले विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम इस परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुँचा रहे हैं। होली के बाद पड़ने वाला प्रथम मंगलवार।मुख्य कथा हनुमान जी द्वारा भीम के अहंकार का दमन।ऐतिहासिक काल लगभग 300 वर्ष पुराना संगठित स्वरूप।मुख्य वाद्य शहनाई, सारंगी, तबला।प्रतीक विनम्रता, बुजुर्गों का सम्मान और सांप्रदायिक एकता। काशी की कभी न बूढ़ी होने वाली संस्कृति है।
बुढ़वा मंगल का संदेश शाश्वत है। यह हमें सिखाता है कि शक्ति और सफलता तब तक अधूरी है जब तक उसमें विनम्रता न हो। हनुमान जी का वृद्ध स्वरूप हमें याद दिलाता है कि समय के साथ शरीर शिथिल हो सकता है, लेकिन भक्ति और ज्ञान हमेशा चिर-युवा रहते हैं। काशी का यह पर्व एक जीवंत उदाहरण है कि कैसे एक समाज अपने इतिहास, अपनी पौराणिक कथाओं और अपनी कला को एक साथ पिरोकर हजारों वर्षों तक जीवित रख सकता है। जब तक गंगा की लहरें वाराणसी के घाटों को चूमती रहेंगी, जब तक शहनाई की तान गूंजती रहेगी, 'बुढ़वा मंगल' का यह पावन पर्व अपनी पूरी भव्यता के साथ मानवता को प्रेम और विनम्रता का पाठ पढ़ाता रहेगा।"बुढ़वा मंगल केवल बनारस का त्योहार नहीं है, बल्कि यह भारतीय उपमहाद्वीप की उस संस्कृति का प्रतिनिधि है जहाँ लोक-कला और आध्यात्मिकता एक दूसरे के पूरक हैं। यह हमें अपनी जड़ों की ओर लौटने और अपने बड़ों के अनुभव को सहेजने की प्रेरणा देता है।"
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