श्री ढकोशलानन्दजी की तन्त्र-साधना
कमलेश पुण्यार्क "गुरूजी"गाँववालों को विश्वस्त सूत्रों से पता चला है कि श्री ढकोशलानन्दजी आजकल तन्त्र-साधना में तल्लीन हैं। मारण, मोहन, उच्चाटन, विद्वेशन, सम्मोहन, वशीकरण सबकुछ साधने की कई विधियाँ हस्तगत हो गई हैं। यानी कि इनमें कुछ भी सिद्ध हो जाए तो पौ-बारह। प्रायः नवसिखुए तान्त्रिकों का पहला झुकाव या कहें खिंचाव वशीकरण—विशेषकर नारी सम्मोहन की ओर ही होता है, क्योंकि भोगवाद की परम और चरम सीमा यही मानते हैं लोग। कुछ लोग सीधे मारण-क्रिया से ही तन्त्र-साधना का श्रीगणेश करना करते हैं, क्योंकि उन्हें पूरी दुनिया शत्रु ही नज़र आती है। देखते हैं ढकोलानन्दजी क्या करते हैं।
“ गाँव-जेवार को दिखा देना है तन्त्र-मन्त्र का कमाल और लगे हाथ अपना भी काम साध लेना है। बीसियों चेलियाँ तो चुटकी बजाते बस में हो ही जायेंगी, किन्तु पहले अपनी विगड़ैल बीबी पर ही आज़माईश़ करनी है और इतना ही नहीं, इस बीबी से नहीं तो दूसरी बीबी से ही सही, मुखाग्नि देने वाला बेटा तो पैदा करके ही रहना है...। ”— कुछ ऐसा ही ख्याली पुलाव पकाने लगे थे ढकोशलानन्दजी महाराज।
पिछले ही साल प्याजी पत्तियों की पकौड़ी के साथ लहसुनिया चटनी न बनाने के चलते, माँ-भाभी से लड़-झगड़कर, बहुत गुस्से में झोरी-मोटरी उठाकर, घर-बार छोड़-छाड़कर कामरूप कामाख्या चले गए थे। बेचारी बीबी तीन साल पहले ही आए दिन की ऐसी ही हरकतों से ऊबकर, अपना गहना-गिट्ठो बाँध-बूँधकर, दुधमुँही बच्ची के साथ जो नैहर गई, सो आजतक वापस नहीं लौटी। छोटे-मोटे ताने-उलाहनों के साथ, उसपर अहम इलज़ाम था कि पहली दफ़ा ही वेटी जनी है, पता नहीं आगे क्या करेगी।
बेटा जनने-जनाने वाली जड़ी-बूटी. तन्त्र-मन्त्र की खोज में आसपास के बाबाओं का चक्कर लगाते रहे थे साल-डेढ़साल, किन्तु अन्त में निराश होकर, घर से पलायन करने का अच्छा मौका देख, खुद ही खोज में निकल पड़े ।
तुनुकमिज़ाज़ी, जिद्दी, माँ-वाप की दुलारी, श्रीमानजी की बीबी बीते तीन सालों में एकबार भी हाल-चाल न ली चिट्ठी-चिठिआँव करके और न इन्होंने ही कुछ खोज-खबर ली अपनी ओर से। मान-मनुहार की जरा भी कोशिश न हुई, न इधर से और न उधर से ही।
चार-छः महीनों के थोड़े-बहुत अभ्यास के बाद कामरूप सिद्ध गुरुजी ने पीठ ठोंकते हुए जब कहा कि तुम साधना की सही दिशा में जा रहे हो, तो चेले को भी अपने आप पर गुमान और मोह हो आया।
अतः आत्ममुग्ध ढकोशलानन्दजी आशा-पुरायी देखकर, मनमारकर, बीबी की ओर से मनुहार की फ़िकर छोड़कर, घर के वजाय, सीधे ससुराल पहुँचे बड़ी सी झोली में बन्दर की खोपड़ी, बिल्ली का ज़ेर, शेर के नाखून, सिंह के बाल, चीते की खाल, वनसूअर के दाँत, लोमड़ी का दुम और कुछ जंगली जड़ी-बूटियाँ भी साथ ले लिए।
जटा-जूट-दाढ़ी-मूँछ बढ़ाए, कछुए की पीठ का मुकुट पहने, पूरे देह राख-भभूत लपेटे, गले में मूंगा, मोती, रुद्राक्ष से लेकर सीप-घोंघे तक की माला लटकाए, महासिद्ध तान्त्रिक के बाने में ढलती शाम में ससुराल के दरवाजे पर पहुँचे तो साले-ससुर ने भी पहली नज़र में पहचानने से इन्कार कर दिया। किन्तु हाँ, गाँववालों द्वारा कोई सिद्ध बाबा समझ कर रामसलामी, आवभगत खूब हुई गाँव में घुसते ही।
सामान्य स्वागत-सत्कार के बाद देर रात तक बाहर दालान में ही बैठे पागुर करते रहे भुलाएल-भटकल साँढ़ की तरह। अगल-बगल के दो-चार मनचले साले टाइप युवक काफी देर तक बैठे, मनसायन करते रहे। एक बुज़ुर्ग भी दालान में पसरी पुआल की गद्दी पर चिलम सुड़कते, खाँय-खूँ करते रहे।
बहुत देर तक तन्त्र-मन्त्र, झाड़-फूँक, जादू-टोना, सिद्धि-साधना की ढींगे हाँकते रहे ढकोशलानन्दजी, किन्तु आधी रात से अधिक गुज़र जाने के बाद भी किसी साली-सरहज द्वारा भीतर से बुलावा न आया, तब चिन्ता होने लगी। दालान में घर का कोई सदस्य भी नहीं सोया था, पड़ोसी बुढ़ऊ के अलावे। साले टाइप युवक ‘सुबह फिर मिलेंगे’ का वायदा करके, अपने-अपने घर जा चुके थे।
दो दिन के रास्ते की थकान, भोर होते-होते शरीर और आँखों पर भारी पड़ने लगी। प्रिया-मिलन की आश लगाए आँखें कब बन्द हो गईं, बेचारे को पता भी न चला । घोड़ा बेंच कर पसर गए टुटही खटिया पर ही। थोडी ही देर में कर्कश खुर्राटे की आवाज से दालान ही नहीं, भीतर का आँगन भी गूँज उठा।
भीतर वालियों को तो इसी अवसर की तलाश थी। मौका देख, एक ने दबे पाँव आगे बढ़कर, ताक-झाँक कर मुआयना किया—झोला-झक्कड़ का, दूसरी ने लालटेन धीमी की, तीसरी ने हाथ में लिए किसी तरल पदार्थ का कायदे से भरपूर लेप लगाये ढकोशलानन्द की बाल-दाढ़ी में और चौथी ने सूई-धागे से टाँग दिये वदन पर पहने हुए झूल को खाट पर विछे गेंदड़े से। पाँचवी ने रही-सही कसर भी उतार दिए—मोटी रस्सी से शरीर सहित खाट को लपेट-चपेटकर...।
सुबह का नज़ारा एकदम देखने लायक था। निरे देहात के खुले दालान में भीतर से बाहर तक भरे ग्रामिणों की खुसुर-फुसुर से तान्त्रिक ढकोशलानन्दजी की अलसायी आँखें खुलीं तो कुछ देर तक समझ में ही नहीं आया कि माज़रा क्या है।
जानने-समझने की जरा कोशिश करने पर पता चला कि छाती तक शरीर तो खाट के साथ उड़ने को उतावला है, मानों यक्षिणी-साधना वाला ‘उड़नखटोला’ सिद्ध हो गया हो सपने में ही।
रात वाले ही दो युवक आगे आकर दोनों ओर से खाट उठाकर, बाहर सहबान में ले आए, जहाँ गाँववालों की जमघट लगी हुई थी उत्सुकता से आँखें पसारे। उन्हीं में एक, साधना-सामग्री वाली झोली को जमीन पर उझलकर, एक-एक चीजों से परिचय करा रहा था मश्ख़री अन्दाज़ में—
“ ये देखो कामरूप-कामाख्या के सिद्ध ढकोशलानन्दजी के आदिम गुरु की खोपड़ी है। इसमें खाँटी महुए वाली दारू भरते ही, ये खोपड़ी बोलने लगेगी...सारी बातों का जवाब देने लगेगी...दुनिया की सारी ख़्वाहिशें पूरी करने की ताकत है इस खोपड़ी में...और ये रही उस गुरु के भी गुरु की जाघों के भीतर वाले वाले बाल, जिसके बदौलत दुनियाँ की बिगड़ैल से बिगड़ैल, नाज़-नखरे वाली औरत भी चट चुटकी में आ जाए...और ये है वनैले सूअर का दाँत, जिसे ताबीज में भर कर मुँह में धरकर, एकदम अदृश्य होकर, रिजर्व बैंक के लॉकर तक भी पहुँचा जा सकता है... खूबसूरत-मज़ेदार चीते की सिद्ध खाल ओढ़ लेने पर ओला-बर्फ, आग-पानी, गोला-बारूद किसी तरह का असर नहीं होता शरीर पर...सयानी लोमड़ी की दुम जेब में रख लेने पर संसद-परिषद की कुर्सी बिना वोट-काउन्टिंग के ही हासिल हो जाती है...और ये देखो तरह-तरह की सिद्ध जड़ी-बूटियाँ भी हैं पुराने वाले च्यवनऋषि जैसी जवानी और खूबसूरती देने वाली, इनके सेवन से कम से कम पाँच सौ साल तक तो जवानी का लुफ़्त उठाया ही जा सकता है हण्डरेड परसेंट गारंटी के साथ...और रही बात बेटा जनमाने की, तो वो तो मर्दों से भी जनमा दे बिना गर्भाशय के ही एक ही फूँक में...।”
तमाशबीनों के बीच हाऽहाऽहीऽहीऽ-कानाफूसी चल रही थी। सिद्ध तान्त्रिक कहलाने के लिए आडम्बर-ढोंक-ढकोशला निहायत जरुरी शर्त है— ससुराल वालों को बखूबी पता था, क्योंकि ऐसे कई बाबाओं से उनका पाला पड़ चुका था।
तन्त्र-सामग्रियों पर ‘लाइव कमेन्ट्री’ चल ही रही थी कि इसी बीच किसी ने पानी से भरी बाल्टी ला उढेला वदन पर, किसीने नोच-चोंथ कर वदन का झूल उतारा, किसी ने सालियों द्वार ‘हेयर रिमूवर क्रीम’ लगाये दाढ़ी-बाल-जटाओं को नोंच कर नीचे फेंका, तो किसी ने खाट की रस्सियाँ खोली। रस्सियाँ खुलते ही नंग-घड़ंग, भेड़ की तरह मुड़े-मुड़ाए, आगबबूला ढकोशलानन्दजी भीड़ को ठेल-ठाल कर भागने लगे और पीछे से गाँव वाले ढोलक पर थाप देते हुए, तालियाँ बजाते हुए खदेड़ने लगे... जय हो बाबा ढकोशलानन्दजी की... जय हो बाबा ढकोशलानन्दजी की... जय हो बाबा ढकोशलानन्दजी की...।
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