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धूलिवंदन और होली का शास्त्रीय महत्त्व !

धूलिवंदन और होली का शास्त्रीय महत्त्व !

होली केवल रंगों और उत्साह का पर्व नहीं, बल्कि गहन आध्यात्मिक और शास्त्रीय आधार वाला उत्सव है। होलिका दहन के समय अग्निदेवता का तत्त्व वहाँ सक्रिय रहता है और यह तत्त्व दूसरे दिन भी कार्यरत रहता है। इसी दिव्य तत्त्व का लाभ प्राप्त करने तथा अग्निदेवता के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने हेतु फाल्गुन कृष्ण प्रतिपदा को प्रातःकाल होली की राख का पूजन किया जाता है, जिसे धूलिवंदन कहा जाता है।


धूलिवंदन की विधि और आध्यात्मिक लाभ
होलिका दहन के दूसरे दिन सूर्योदय के समय होली स्थल पर जाकर पहले दूध और जल से अग्नि को शांत किया जाता है। तत्पश्चात होली की विभूति को वंदन कर प्रार्थना की जाती है—

“वन्दितासि सुरेन्द्रेण ब्रह्मणा शङ्करेण च।
अतस्त्वं पाहि नो देवि भूते भूतिप्रदा भव॥”

इसका भावार्थ है — हे पवित्र धूलि! तुम ब्रह्मा, विष्णु और महेश द्वारा वंदित हो; अतः हमें ऐश्वर्य प्रदान करो और हमारी रक्षा करो। इसके बाद विभूति को अंगूठे और मध्यमा की चुटकी से लेकर आज्ञाचक्र पर लगाया जाता है तथा पूरे शरीर पर धारण किया जाता है। ऐसा करने से सूक्ष्म स्तर पर देह की शुद्धि होती है और ईश्वरीय शक्ति का संरक्षण प्राप्त होता है।

होली की कृतियों का शास्त्रीय आधार :

कुछ प्रदेशों में होली के दिन उल्टा हाथ मुख पर रखकर चिल्लाने की परंपरा है। शास्त्रानुसार यह क्रिया व्यक्ति के चारों ओर विद्यमान नकारात्मक आवरण और कष्टदायक ऊर्जा को बाहर निकालने में सहायक होती है। हालांकि आज कुछ स्थानों पर इसका स्वरूप विकृत हो गया है, किंतु मूल उद्देश्य आध्यात्मिक शुद्धि ही है।

होली की रचना शंकु (कोन) आकार में करने का भी शास्त्रीय आधार है। शंकुकार संरचना में अग्नितत्त्व घनीभूत होकर भूमंडल की रक्षा करता है तथा कष्टदायक स्पंदनों को रोकता है। इससे स्थानदेवता, वास्तुदेवता और ग्रामदेवता के तत्त्व जागृत होते हैं। शंकु आकार इच्छा शक्ति का प्रतीक है; अतः इसके संपर्क से मनःशक्ति जागृत होती है और मनोकामनाओं की पूर्ति में सहायता मिलती है।

होली में विशिष्ट वृक्षों की लकड़ी, गोबर के उपले और मीठी रोटी अर्पित करने की परंपरा भी पंचतत्त्वों की संतुलित सक्रियता से जुड़ी है। यह सब मिलकर यज्ञ का स्वरूप धारण करते हैं, जिससे वातावरण सात्त्विक बनता है।

होली का व्यापक महत्त्व :

होली का संबंध केवल सामाजिक जीवन से नहीं, बल्कि नैसर्गिक, मानसिक और आध्यात्मिक उन्नति से भी है। यह बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। अनिष्ट शक्तियों का नाश कर ईश्वरीय चैतन्य प्राप्त करने का यह श्रेष्ठ अवसर है। वसंत ऋतु के स्वागत, अग्निदेवता के प्रति कृतज्ञता तथा साधना में प्रगति हेतु बल प्राप्त करने का यह दिव्य पर्व है।

भावपूर्वक होली मनाने से यज्ञरूप अग्नि के माध्यम से देवतत्त्व की तरंगें वातावरण में कार्यरत होती हैं। मंत्रों द्वारा उनका आवाहन कर वायुमंडल को शुद्ध एवं सात्त्विक बनाया जाता है। पंचतत्त्वों की सहायता से देवतत्त्व की तरंगें वातावरण में प्रवेश करती हैं, जिससे साधक को ईश्वरीय अनुभूति प्राप्त होती है।

इस प्रकार धूलिवंदन और होली, दोनों ही केवल परंपरा नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, वातावरण की पवित्रता और आध्यात्मिक उन्नति के दिव्य माध्यम हैं।

होली में होने वाले प्रमुख अनाचार :

· पर्यावरण और संपत्ति की हानि: होली जलाने के लिए हरे-भरे पेड़ काटना या लकड़ी/गोबर के उपले चुराना और सार्वजनिक स्थानों पर कचरा फेंकना।
· अनैतिक कृत्य: होली और रंगपंचमी के नाम पर शराब पीकर हंगामा करना जुआ खेलना और अश्लील संगीत बजाना।
· महिलाओं के प्रति अपराध: महिलाओं को छेड़ना और अश्लील इशारे करना।
· स्वास्थ्य के लिए हानिकारक: शरीर पर हानिकारक रंग/रसायन लगाना गंदे पानी से भरे गुब्बारे फेंकना।
· जबरन वसूली: होली के लिए जनता से जबरदस्ती धन इकट्ठा करना।
· धार्मिक आस्था पर चोट: 'होली के लिए कचरे का इस्तेमाल करें और खाद्य पदार्थ दान करें' जैसे अभियान चलाकर परंपराओं को नष्ट करने का प्रयास करना।

सनातन संस्था का दृष्टिकोण और अभियान: सनातन संस्था इन कुप्रथाओं को रोकने के लिए पिछले कई वर्षों से पुलिस में शिकायत करने और जनजागरूकता अभियान चलाने का आह्वान करती है व पर्यावरण के अनुकूल और धार्मिक परंपरा के अनुसार होली मनाने का संदेश देती है।

सुझाव:

· लकड़ी की जगह गोबर के उपलों का ही उपयोग करें।
· रासायनिक रंगों की जगह प्राकृतिक रंगों (गुलाल) का उपयोग करें।
· पानी की बर्बादी न करें।
· होलिका दहन के बाद पवित्र राख (धुलिवंदन) का शास्त्रानुसार उपयोग करें न कि कीचड़ फेंकें।

संदर्भ: त्यौहार, धार्मिक उत्सव एवं व्रत

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